-संजय राऊत
दिवाली त्योहार के पीछे असली संस्कार क्या है? वनवास समाप्त करके राम अयोध्या पहुंचे। दीये जलाकर उनका स्वागत हुआ, लेकिन राम अयोध्या पहुंचे थे ईर्ष्या, अहंकार, मन के भीतर का संघर्ष और द्वेष समाप्त करके। मन के भीतर का वह अंधकार नष्ट किया, इसलिए अयोध्या जगमगा उठी!
धनत्रयोदशी बीत गई, आज लक्ष्मी पूजन का उत्सव है, साथ में नरक चतुर्दशी भी है, इस तरह दिवाली का त्योहार मनाया जा रहा है। महाराष्ट्र में भीषण सूखा है और मुख्यमंत्री ने ७८ लाख किसानों के खाते में ५,००० रुपए जमा करके किसानों से दिवाली मनाने को कहा है। दिवाली सिर्फ एक त्योहार नहीं है। वह एक संस्कार है। जिसे कोई दीपोत्सव कहता है, जगमगाहट कहता है। उसके बारे में ओशो कहते हैं, ‘‘इस बार दिवाली के दिन तुम कितने दीयों की जगमगाहट करोगे, यह महत्वपूर्ण नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि तुम्हारे अंतरंग में वह एक दीया जलेगा क्या, जिससे तुम्हारे जीवन का सारा अंधकार दूर हो जाए। क्योंकि दुनिया में करोड़ों लोग दिवाली मनाते हैं, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि दिवाली आखिर किस बात का उत्सव है? क्या किसी ने कभी सोचा है कि जिस दिवाली में हम इतने दीये जलाते हैं, आकाश कंदील रोशन करते हैं, लेकिन दिवाली खत्म होते ही हमारे जीवन में फिर वही चिंताएं, वही बेचैनी, वही क्रोध, वही अहंकार, वही ईर्ष्या, वही दुख फिर क्यों लौट आता है? दीयों के साथ ही वे जल क्यों नहीं जाते? अगर प्रकाश का उत्सव मनाया तो फिर अंधकार वापस कैसे आ गया और अगर अंधकार वापस आ गया तो क्या हम सच में दिवाली मनाते हैं? यही वह रहस्य है, जिसे समझे बिना मनुष्य जीवनभर दिवाली मनाता रहता है, लेकिन वह दिखावा होता है। उसके मन का अंधेरा कभी दूर नहीं होता। मनुष्य को लगता रहता है कि हम जो दीये जलाते हैं वही प्रकाश है, वही दिवाली है, वही आनंद है। उस आनंद के लिए पुराणों की दंतकथाएं जोड़ दी गर्इं। हमारे मन पर बचपन से ही यह बिठा दिया गया कि भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास समाप्त करके अयोध्या लौटे, तब उनके स्वागत के लिए दीये जलाए गए, इसलिए दिवाली मनाई जाती है। पूरी अयोध्या में प्रकाशदीप जलाए गए। हर हृदय में आनंद भर गया। सारी गंदगी दूर हो गई। यह कथा अत्यंत सुंदर है। लोगों ने इसे स्वीकार किया है, लेकिन इस कथा को सिर्फ एक धार्मिक घटना समझकर देखा तो उसके पीछे छिपे एक अद्भुत रहस्य से वंचित रह जाओगे। क्योंकि श्रीराम का अयोध्या लौटना सिर्फ एक राजा का लौटना नहीं है। एक वनवासी राजा का स्वागत नहीं है। श्रीराम का अयोध्या लौटना, मनुष्य की ‘चेतना’ का अपने असली घर में लौट आने जैसा है। श्रीराम हम में से हर एक के भीतर की उस ‘चेतना’ के प्रतीक हैं, जो मर्यादा और सत्य के दायरे में जीती है। जो अहंकार की जगह मानवता को स्वीकार करती है। अयोध्या तुम्हारे जीवन की वह अवस्था है, जहां वनवास और संघर्ष समाप्त हो जाता है। जहां मनुष्य स्वयं से ही संघर्ष करना बंद कर देता है। बदले और द्वेष के विचार को खत्म कर देता है और वनवास उस भटकाव का प्रतीक है जहां मनुष्य अपना वास्तविक रूप भूलकर मोह-माया के पीछे, मृगतृष्णा के पीछे दौड़ता रहता है। इसलिए वनवास सिर्फ श्रीराम का नहीं होता, बल्कि हर मानव मन का होता है। वह वनवास अयोध्या की सीमा पार करते ही समाप्त हो जाता है और नई प्रकाश किरणें हमारे शरीर में प्रवेश करती हैं। यही दिवाली है।
दिखावा ही ज्यादा
आज की दिवाली कैसी है? अब लोग दिवाली मनाते हैं तो क्या करते हैं? दिवाली मनाते हैं उससे ज्यादा लोग दिखाने के लिए प्रदर्शन ज्यादा करते हैं। घर की सजावट की तस्वीरें, महंगे कपड़े, बड़े-बड़े कॉर्पोरेट गिफ्ट, मिठाई के डिब्बे। धीरे-धीरे त्योहार-उत्सव आनंद से ज्यादा ‘प्रदर्शन’ बनते जा रहे हैं। दूसरों को दिखाने और चिढ़ाने के चक्कर में हम अपने उत्सवों का आनंद लेना भूलते जा रहे हैं। हिंदुओं के त्योहारों-उत्सवों में अन्य धर्मों के लोगों को भाग नहीं लेना चाहिए, ऐसा फरमान राज्य के मंत्री निकालते हैं। मुसलमानों को अपने घरों पर रोशनी नहीं करनी चाहिए, ऐसा भाजपा के नेता कहते हैं। यह श्रीराम का अपमान है। अभिनेत्री दीया मिर्जा ने प्रदूषणमुक्त दिवाली का संदेश देने वाला ‘वीडियो’ सोशल मीडिया पर डाला, तब मुंबई की भाजपा को गलत जगह मिर्ची लगी। दीया मिर्जा मुसलमान है, इसका उन्हें एहसास हुआ। उन सबको आखिर में मुंबई हाई कोर्ट ने फटकारा। इन लोगों ने अपने त्योहार और उत्सव संकुचित कर दिए हैं। सऊदी अरब के शेख ने दिवाली मनाई तो हमें चलता है। प्रे. ट्रंप ‘व्हाइट हाउस’ में दिवाली मनाते हैं तब वह मोदी का गौरव बन जाता है, लेकिन भारत के मुसलमान समाज ने दिवाली मनाई तो यहां के भाजपाइयों को तकलीफ होती है। त्योहारों का विकृतिकरण और धर्मांधकरण करने का काम मोदी-शाह के काल में हुआ। उससे दिवाली भी नहीं बच पाई। इस साल की दिवाली तो भीषण सूखे के संकट में ही आई है। इसलिए किसानों की दिवाली अंधेरे में है। बेरोजगारों की दिवाली हताश है। कॉर्पोरेट क्षेत्र, बिल्डरों की ओर से बड़े-बड़े ‘गिफ्ट’ का आदान-प्रदान होगा। पांच-पचास लाख के एक-एक गिफ्ट दिए जाएंगे, लेकिन सूखाग्रस्त किसान को दिवाली मनाने के लिए सरकारी खजाने से महज ५,००० रुपए ही दिए गए हैं। दिवाली के दीये मुंबई-पुणे में जले, लेकिन किसानों के खेत की मेड़ पर और घर में अंधेरा है। दिवाली मनाते समय उस अंधेरे का सिर्फ स्मरण रखा तो भी उपकार होगा!
