अरुण कुमार गुप्ता
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार कितने शातिर तरीके से लोगों का ध्यान भटका रही है। सभी लोग कह रहे हैं कि ई-२० पेट्रोल के लिए गडकरी जिम्मेदार हैं। राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के लिए चंपत राय जिम्मेदार हैं। नीट पेपर लीक के लिए धर्मेंद्र प्रधान जिम्मेदार हैं, लेकिन सभी के ऊपर बैठे हैं नरेंद्र मोदी। जो किसी बात के लिए जिम्मेदार ही नहीं है? अब आप अपने विवेक से सोचिए, पूरी बीजेपी में ऊपर से नीचे तक किसी की हिम्मत है कि नरेंद्र मोदी की मर्जी के बिना शौच तक करने चला जाए। २०२४ में भी नीट पेपर लीक हुआ था। उस समय भी शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान थे। पेपर लीक के बाद हंगामा हुआ तो सरकार ने लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए एटीए के डायरेक्टर जनरल सुबोध कुमार सिंह को पद से हटा दिया था। २२ जून २०२४ को डीजी पद से हटाया गया और उसके ठीक ४ माह बाद यानी २६ अक्टूबर २०२४ को मिनिस्ट्री ऑफ स्टील में एडिशनल सेक्रेटरी नियुक्त किया गया। इसके बाद और प्रमोशन देते हुए २० दिसंबर २०२४ को सुबोध कुमार को ही छत्तीसगढ़ सरकार में प्रिंसिपल सेक्रेटरी नियुक्त कर दिया गया। प्रिंसिपल सेक्रेटरी के साथ-साथ ऊर्जा विभाग में चीफ सेक्रेटरी, छत्तीसगढ़ स्टेट पावर कंपनी और ट्रांसमिशन जेनरेशन का अध्यक्ष भी बना दिया गया। एनटीए से हटाने के बाद यह प्रमोशन क्या धर्मेंद्र प्रधान या छत्तीसगढ़ के सीएम ने किया था? ऐसे ही जब सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर ट्रस्ट बनाने के लिए आदेश दिया तो ट्रस्ट में नियुक्तियां योगी या राजनाथ सिंह ने नहीं की। ट्रस्ट के सभी १५ सदस्य खुद नरेंद्र मोदी ने चुना होगा। चंपत राय मोदी के खास आदमी हैं। ट्रस्ट के संविधान में यह भी लिखवा दिया गया कि एक बार जो सदस्य बना तो उसे आजीवन हटाया नहीं जा सकता। यदि आपको लगता है कि गडकरी पेट्रोल में गन्ने का जूस मिलाकर बेच रहे हैं तो बहुत बड़ी गलतफहमी है। गडकरी, चंपत और प्रधान तो प्यादे हैं। जो बादशाह को बचाने के लिए कुर्बान किए जा रहे हैं। ‘बादशाह’ को देश का विकास करने के लिए प्रधानमंत्री बनाया गया था या ८,००० करोड़ के जहाज में बैठकर दुनिया की परिक्रमा करने के लिए। इस पर एक शेर याद आता है।
ये कुर्सी है तेरा जनाजा तो नहीं है, जब कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते!
देश के लोग किसी लायक आदमी को प्रधानमंत्री बना लेंगे।
दवा कंपनियों पर कैसे करें भरोसा!
अंग्रेजी दवा कंपनियों की बेशुमार मुनाफाखोरी से तो लगभग सभी लोग वाकिफ होंगे, लेकिन इन दवा कंपनियों की दवाइयां लोग जिस विश्वास के साथ खाते हैं कि इसे खाने से उनका रोग दूर होगा, पर केमिकल इंजीनियर दिनेश ठाकुर ने जो खुलासा किया उससे पूरी दुनिया चौंक गई। केमिकल इंजीनियर दिनेश ठाकुर अमेरिका में कई साल काम करने के बाद २००३ में भारत की नामचीन अंग्रेजी दवा कंपनी रैनबैक्सी में नियुक्ति के बाद डायरेक्टर ऑफ रिसर्च इनफॉरमेशन एंड प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के रूप में काम शुरू किया। रैनबैक्सी की जेनेरिक दवाएं पूरी दुनिया में बिकती थी और अमेरिका में भी। नियुक्ति के थोड़े दिन बाद दवाओं की क्वालिटी चेक करने का काम जब दिनेश ठाकुर ने शुरू किया तो उनके होश उड़ गए। उन्होंने देखा कि कंपनी प्रॉपर टेस्टिंग के बिना ही दवाइयां धड़ल्ले से बेच रही थी। कंपनी यह अभी नहीं देख रही थी कि दवाइयां काम करेंगी या नहीं या फिर उल्टा असर करेंगी। कंपनी दवाइयों की नकली रिपोर्ट बनाकर ड्रग रेगुलेटर को भी बेवकूफ बना रही थी। दिनेश ठाकुर ने यह बात अपने बॉस यानी मैनेजमेंट को बताई, लेकिन इस पर ध्यान नहीं दिया गया। उल्टे कंपनी ने दिनेश ठाकुर पर ही दबाव बनाया। इसके बाद उन्होंने २००५ में नौकरी से इस्तीफा दे दिया। नौकरी छोड़ने के बाद दिनेश ठाकुर ने अमेरिका के फूड एंड ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफडीए को मेल कर सारी जानकारी प्रूफ सहित साझा की। लंबे संघर्ष के बाद २०१३ में रैनबेक्सी ने अमेरिका की कोर्ट में अपना अपराध कबूला और बताया कि कंपनी ने दवाओं की नकली टेस्ट रिपोर्ट तैयार कर धोखा किया है। इसके बाद अमेरिका की कोर्ट ने २०१३ में रैनबैक्सी पर सबसे बड़ा जुर्माना ५०० करोड़ डॉलर का लगाया। कोर्ट ने इस ५०० करोड़ डॉलर के जुर्माने में से ४८ करोड़ डॉलर दिनेश ठाकुर को इनाम के तौर पर दिया। अब आप सोचिए एक साधारण से आदमी ने अपनी नौकरी और जीवन की परवाह किए बिना इतना बड़ा काम किया। ऐसे आदमियों की देश को जरूरत है। नहीं तो यह दवा कंपनियां इसी तरह लूट मचाती रहेंगी। लोग मरते हैं तो मरते रहें।
