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संपादकीय : बोगस चुनाव आयोग!

भारत का चुनाव आयोग हो या राज्य, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लोकतंत्र के रक्षक के रूप में चुनाव तंत्र में नौकरशाहों का नाम जरूर दर्ज किया जाएगा। हमारा चुनाव आयोग उन संवैधानिक संस्थाओं की सूची में सबसे ऊपर है, जो बिना रीढ के काम कर रही हैं। वे आंखें बंद करके लोकतंत्र का चीरहरण देख रहे हैं। भाजपा के एक मंत्री बावनकुले ने कल कहा कि स्थानीय निकाय चुनावों में हमारे महागठबंधन को ५१ प्रतिशत वोट मिलेंगे ही मिलेंगे! चुनावों की तारीखों की घोषणा अभी तक नहीं हुई है। उनके ‘गठबंधन’ की घोषणा नहीं हुई है तो आखिर इन्हें ५१ प्रतिशत वोट पाने का इतना बड़ा विश्वास कहां से मिलता है? क्या चुनाव आयोग कभी इस बारे में सोचेगा? पैठण के एक विधायक भूमरे ने बेखौफ (बेशर्मी से) यह कह दिया कि मैंने बाहर से २० हजार वोट लाकर वोटिंग करवाई इसलिए जीता हूं। अब अगर विधायक बाहर से लाए गए इन भाड़े के मतदाताओं की वजह से जीते हैं तो चुनाव आयोग को इसकी जांच करनी ही चाहिए। इसका मतलब यह उन्होंने २०,००० वोटर्स मतदाता सूची में घुसाए या उन्होंने वोटिंग मशीन पर कब्जा कर वोटिंग की? लेकिन हमारा चुनाव आयोग इन घटनाओं को आंखें मूंद देख रहा है। शेषन ने चुनाव आयोग का डर पैदा कर दिया। इन लोगों ने उसे बिल्ली बना दिया है। मुलायम सिंह यादव ने चुनाव प्रचार के दौरान एक हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल किया था और शेषन ने यादव की नींद हराम कर दी थी। अब, भले ही चुनाव के दौरान मंत्रियों और नेताओं द्वारा हेलिकॉप्टर से पैसों के बैग उतारने का
वीडियो वायरल हो भी जाए तो
चुनाव आयोग कुछ भी करने को तैयार नहीं है। महाराष्ट्र में लोकसभा और विधानसभा चुनावों के बीच ४५ लाख वोट बढ़े और ये सभी वोट अकेले भाजपा को गए। इस चमत्कार की जांच जरूरी थी। अब, स्थानीय निकाय चुनावों में लाखों डुप्लिकेट मतदाता हैं। उनके नामों में थोड़े बदलाव के साथ उन्हें मतदाता सूची में अलग-अलग जगहों पर लाया गया है। नाम अलग हैं, लेकिन फोटो एक ही है। २०१८ से चुनाव आयोग ऐसे डुप्लिकेट नामों को खोजने और उन्हें डिलीट करने का काम कर रहा है। यह उसका एक कार्यक्रम है, लेकिन इस बाबत महाराष्ट्र में कोई काम हुआ ही नहीं है। महाराष्ट्र में २९ महानगर पालिकाओं के चुनाव ‘पैनल’ पद्धति से हो रहे हैं। मुंबई एकमात्र अपवाद है। मुंबई में आमने-सामने का मुकाबला होगा। सभी स्तरों पर मुंबई चुनाव को भ्रष्ट तरीके से निगलने की पुरजोर कोशिशें हो रही हैं। महाराष्ट्र के चुनाव अधिकारियों ने मुंबई चुनाव में इस्तेमाल होनेवाली ‘ईवीएम’ में ‘वीवीपैट’ की मांग किस आधार पर ठुकरा दी? सरकार ने ईवीएम और वीवीपैट सिस्टम खरीदने पर २० हजार करोड़ रुपए खर्च किए। इन ईवीएम के रख-रखाव का खर्च अलग है। फिर मुंबई चुनाव में ‘वीवीपैट’ की योजना क्यों नहीं होनी चाहिए? इस पर राज्य चुनाव आयोग कहता है, ‘हम क्या करें साहब, केंद्र सरकार हमें वीवीपैट वाली ईवीएम देने को तैयार नहीं है।’ इसे गोलमाल ही कहना चाहिए। केंद्र सरकार मुंबई चुनाव में वीवीपैट क्यों नहीं दे रही है? जब आप चुनाव चिह्न वाला बटन दबाते हैं तो एक पर्ची नीचे गिरती है। उस पर्ची पर आपके द्वारा दबाए गए चुनाव चिह्न पर मुहर दिखाई देती है। केंद्र सरकार द्वारा मुंबई में यह सुविधा देने से इनकार करना साफ तौर पर घोटाले के जरिए चुनाव व्यवस्था पर कब्जा करने की उसकी योजना को दर्शाता है। अगर
वीवीपैट नहीं है तो
मुंबई के चुनाव बैलेट पेपर पर ही लीजिए। शक की कोई गुंजाइश नहीं रहेगी, लेकिन चुनाव आयोग भाजपा के दबाव में काम करनेवाली एक बेजान कठपुतली बन गया है। मृतकों के नाम मतदाता सूची में बढ़ रहे हैं और जीवित लोगों के नाम हटाए जा रहे हैं। इसके लिए गुजरात में बना एक ‘सॉफ्टवेयर’ महाराष्ट्र में इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रवासियों के नाम मतदाता सूची में हैं और हर घर में ५०-१०० नाम दर्ज किए जा रहे हैं। ऑनलाइन मतदाता पंजीकरण एक स्कैम है। इसके जरिए बोगस मतदाताओं को सूची में डालने का खेल फिलहाल चल रहा है। भाजपा और अमित शाह की ‘शिंदे व अन्य’ पार्टियों ने चुनाव मशीनरी खरीदकर विधानसभा में भी यही खेल खेला और इसी खेल के अगले हिस्से के तौर पर वे जिला परिषद और महानगरपालिकाओं के चुनाव भी लड़ने को तैयार हैं। नासिक शहर के तीन और शहर ग्रामीण इलाके के देवलाली मिलाकर ४ निर्वाचन क्षेत्रों में कुल ३,५३,९४९ मतदाताओं के डुप्लिकेट, फर्जी और प्रवासी होने का सबूतों के साथ पता लगाने और उसे चुनाव आयोग को सौंपने के बावजूद, यह भाजपाई नवाब हाथ पर हाथ धरे बैठा है। मतदाता सूची से लेकर चुनावों तक पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए जो काम चुनाव आयोग को करना चाहिए था, वह काम इस समय राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता पूरी शिद्दत से कर रहे हैं। यह मतदाता सूची के भ्रष्टाचार को खत्म करने का एक आंदोलन है, ताकि सभी लोग संविधान प्रदत्त अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें और चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी बन सकें, लेकिन अगर चुनाव आयोग ने इसकी अनदेखी की तो क्या होगा? भविष्य में इससे भी बड़ी महाभारत हो सकती है। यह चेतावनी देने के लिए सभी दल और चुनाव आयोग में गुप्त चर्चा जारी है। उन्हें सफलता मिले!

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