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संपादकीय : पुलवामा और राज

पुलवामा हमले से पहले बैंकॉक में अजीत डोभाल और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के बीच गुप्त बैठक क्यों हुई? ऐसा सवाल श्री राज ठाकरे को काफी समय से कचोट रहा था और जिसके चलते उनका मन अशांत था। पुलवामा में ४० जवानों के नरसंहार के पीछे कुछ काला था और २०१९ के चुनाव से पहले भी उनके मन में कई सवाल उठते रहे कि यह नरसंहार वैâसे हुआ। पिछले मंगलवार को दिल्ली में गृहमंत्री अमित शाह से हुई मुलाकात के बाद पुलवामा हत्याकांड के बाबत राज ठाकरे के मन में बवंडर पैदा करनेवाले सभी सवालों के जवाब मिल गए होंगे और हर्षवर्धन पाटील की तरह उन्हें भी गहरी नींद आ गई होगी, इसमें किसी के मन में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। पुलवामा में ४० जवानों की हत्या कर दी गई। उस हत्याकांड के लिए लोकसभा चुनाव का मौसम चुना गया। सत्यपाल मलिक उस समय जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल थे। केंद्र सरकार की लापरवाही के कारण ४० जवानों को अपनी जान गंवानी पड़ी। मलिक ने इस बारे में कई विस्फोटक खुलासे किए। सैनिकों को बहुत खतरनाक और संवेदनशील रास्तों से यात्रा नहीं करनी चाहिए, उन पर हमला हो सकता है। इसलिए राज्यपाल ने मांग की कि केंद्र को जवानों के लिए हवाई जहाज की व्यवस्था करनी चाहिए। यह मांग अस्वीकार कर दी गई और अगली यात्रा में आरडीएक्स विस्फोट में हमारे ४० सैनिक मारे गए। ४०० किलोग्राम आरडीएक्स से लदी एक गाड़ी इतनी सारी चौकियां वैâसे पार कर सकती है और जवानों की बस से वैâसे टकरा सकती है? ये पहला सवाल और आरडीएक्स भरी कार का रजिस्ट्रेशन किस राज्य का था? यह दूसरा सवाल है। गाड़ी का रजिस्ट्रेशन गुजरात राज्य का था यह बात सामने आई। तो फिर ये गाड़ी पुलवामा तक आसानी से वैâसे पहुंच गई? यह तीसरा अहम सवाल है। पुलवामा हमले के मामले की गहन जांच चाहनेवाले देश के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बिपिन रावत की भी बाद में एक संदिग्ध दुर्घटना में मौत हो गई। वह एक बेहद सुरक्षित सैन्य हेलिकॉप्टर में यात्रा कर रहे थे और वह हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो गया। क्या पुलवामा हत्याकांड से जुड़े कई रहस्यों को रावत के साथ ही खत्म कर दिया गया? ऐसा सवाल तब देशवासियों के साथ-साथ राज ठाकरे के मन में भी आया होगा। निश्चित रूप से उन्हें पुलवामा नरसंहार में जान गंवाने वाले ४० जवानों के प्रति सहानुभूति थी। अन्यथा वे भरी सभा में पुलवामा नरसंहार के पीछे के नए रहस्य की घोषणा नहीं करते। पुलवामा हमले से पहले बैंकॉक में अजीत डोभाल और पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की मुलाकात क्यों हुई? राज का ये सवाल चौंकाने वाला था और है। अगर उस सवाल का जवाब कल के दिल्ली की ग्रेट भेंट के दौरान गृहमंत्री अमित शाह से मिल गया हो तो राज को वह जानकारी सार्वजनिक करनी चाहिए। यह राष्ट्रहित के लिए महत्वपूर्ण है। इसे संयोग कहें या कुछ और लेकिन पुलवामा हमले के बाद यह बात सामने आई है कि पाकिस्तान से जुड़ी एक कंपनी ने भारी-भरकम चुनावी बॉन्ड खरीदे और उन्हें भाजपा को दान कर दिया। नरसंहार में बलिदान हुए जवानों की मौत पर मलाई खाना अमानवीय है। १४ फरवरी, २०१९ को जम्मू-श्रीनगर राष्ट्रीय राज्य राजमार्ग पर हमारे सशस्त्र कर्मियों को ले जा रहे ७८ वाहनों के काफिले पर हमला हुआ। उस वक्त प्रधानमंत्री मोदी उत्तराखंड के ‘जिम कॉर्बेट’ जंगल में शूटिंग में तल्लीन थे। पहले तो उन्होंने कोई कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी। ‘सैनिकों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाने दिया जाएगा’ आदि श्रद्धांजलि दी गई, लेकिन तुरंत लोकसभा चुनाव के दौरान पुलवामा नरसंहार और जवानों के बलिदान का राजनीतिक प्रचार कर उन्होंने लोगों से भाजपा को वोट देने की भावनात्मक अपील की। मोदी इसमें सबसे आगे थे। प्रचार के दौरान जवानों को श्रद्धांजलि देने के लिए कार्यक्रम आयोजित किए गए और उन्हीं ४० जवानों के बलिदान पर चुनाव जीते गए। २०१९ में मोदी और भाजपा की हालत अच्छी नहीं थी। ऐसा माहौल था कि भाजपा बमुश्किल २०० सीटें जीत पाएगी, लेकिन अचानक पुलवामा में भारतीय सशस्त्र बलों का नरसंहार हुआ और भाजपा ने इसका राजनीतिक फायदा उठाया और वोट मांगे। क्या पुलवामा नरसंहार एक अंतर्राष्ट्रीय साजिश थी या यह भारत में राजनीतिक व्यापारिक दलों द्वारा चुनाव जीतने की एक अमानवीय स्ट्रेटेजी थी? जो सरकार अपनी ही धरती पर अपने ही सैनिकों की रक्षा नहीं कर सकती, वह सरकार युद्ध के समय देश की रक्षा क्या करेगी? मोदी २०१९ की प्रचार सभाओं में पुलवामा नरसंहार में शहीद हुए जवानों के लिए नकली आंसू बहा रहे थे, लेकिन चुनाव जीतते ही मोदी और उनकी सरकार पुलवामा नरसंहार, बलिदान को भूल गए लेकिन पुलवामा ब्लास्ट के पीछे का असली ‘धमाका’ सत्यपाल मलिक ने किया और दुनिया में सनसनी पैâला दी। जिसके चलते मलिक के घर पर ईडी-सीबीआई की छापेमारी हुई, लेकिन मलिक घबराए नहीं। मोदी सरकार के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल को जेम्स बॉन्ड के नाम से जाना जाता है। पुलवामा हमले से पहले पाकिस्तान के उनके समकक्ष और भारत के ‘जेम्स बॉन्ड’ के बीच हुई गुप्त बैठक का राज क्या है? राज ठाकरे ने राष्ट्रहित और राष्ट्रीय सुरक्षा का ऐसा सवाल पूछा था। इस तीखे सवाल का असली जवाब शायद उन्हें अमित शाह से मुलाकात के दौरान मिल गया होगा। राज ने इस बात पर भी अफसोस जताया था कि भारतीय गणतंत्र, आजादी को मोदी-शाह फांसी पर लटका रहे हैं। हो सकता है कि राज ने शाह के दफ्तर से फंदे की रस्सी जब्त कर ली हो और उसे महाराष्ट्र ले आए हों। कुल मिलाकर, भयभीत मोदी-शाह अपनी तानाशाही की पकड़ को मजबूत करना चाह रहे हैं।

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