मुख्यपृष्ठस्तंभइस्लाम की बात : यूएन दरबार में पहुंचा एसआईआर का मुद्दा

इस्लाम की बात : यूएन दरबार में पहुंचा एसआईआर का मुद्दा

सैयद सलमान, मुंबई

किसी भी मुसलमान के लिए वोट देने का अधिकार सिर्फ चुनाव में डाला गया एक मत नहीं होता, बल्कि इस बात का भरोसा भी होता है कि वह इस देश का उतना ही बराबर का नागरिक है, जितना कोई और। यही वजह है कि जब मतदाता सूची से नाम कटने, विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) और चुनावी अधिकारों को लेकर सवाल उठते हैं तो इसे प्रशासनिक कमी कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। यह उस भरोसे का सवाल है जिस पर भारतीय लोकतंत्र खड़ा है।
अपने ही देश में बेगाने!
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञों ने जब इस मुद्दे पर चिंता जताई, तो भारत में रहने वाले अनेक मुसलमानों ने इसे अपनी उस बेचैनी की प्रतिध्वनि के रूप में देखा, जिसे वे लंबे समय से महसूस कर रहे हैं। सरकार इसे भारत का आंतरिक मामला मान सकती है, लेकिन एक आम मुसलमान के लिए असल सवाल यह है कि क्या उसकी आवाज अपने ही देश में पूरी गंभीरता से सुनी जा रही है।
पिछले कुछ वर्षों में मुस्लिम समाज के भीतर एक भावना लगातार गहरी हुई है कि उसे बार-बार अपनी नागरिकता, अपनी निष्ठा और अपने वजूद को साबित करना पड़ रहा है। कभी किसी बयान के कारण, कभी किसी राजनीतिक बहस के कारण और कभी प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण। ऐसे माहौल में यदि मतदाता सूची से मुस्लिम समाज के नाम हटने की शिकायतें सामने आती हैं तो वे सिर्फ तकनीकी त्रुटि नहीं लगतीं, बल्कि पहले से मौजूद आशंकाओं को और मजबूत कर देती हैं।
चुनाव आयोग का कहना है कि एसआईआर का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक शुद्ध और अद्यतन बनाना है। इस उद्देश्य पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। हर लोकतंत्र में मतदाता सूची का सही होना आवश्यक है, लेकिन सवाल प्रक्रिया का है। यदि किसी समुदाय में अपेक्षाकृत अधिक शिकायतें सामने आती हैं, यदि वर्षों से मतदान करने वाले लोगों को अचानक पता चलता है कि उनका नाम सूची में नहीं है तो स्वाभाविक है कि उनके मन में सवाल उठेंगे। लोकतंत्र में केवल निष्पक्ष होना पर्याप्त नहीं होता, निष्पक्ष दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक है।
लोकतंत्र के लिए चेतावनी!
एक बुजुर्ग, जिसने चार दशक तक हर चुनाव में मतदान किया हो, यदि मतदान केंद्र पहुंचकर ये जाने कि उसका नाम सूची में नहीं है तो वह ठगा हुआ महसूस करता है। वह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि क्या व्यवस्था अब भी उसे उतना ही अपना मानती है जितना पहले मानती थी। पहली बार मतदान करनेवाला एक युवा भी इसी चिंता में रहता है कि कहीं उसका नाम भी सूची से गायब न हो। यह डर केवल वोट खोने का नहीं होता, बल्कि बराबरी के एहसास के कमजोर पड़ने का होता है।
इस चिंता को राजनीतिक भाषा और गहरा कर देती है। चुनावी मंचों से जब देश के प्रधानमंत्री तक की जुबान से ‘वोट जिहाद’ जैसे शब्द सुनाई देते हैं, तो उसका असर चुनावी भाषण तक सीमित नहीं रहता। ऐसे शब्द लाखों सामान्य मुसलमानों को यह एहसास कराते हैं कि उनकी लोकतांत्रिक भागीदारी को भी संदेह की निगाह से देखा जा रहा है। जबकि मतदान किसी भी नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, उसे किसी धार्मिक पहचान के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।
भारत का मुसलमान इस देश के इतिहास, संस्कृति, स्वतंत्रता संग्राम और लोकतांत्रिक यात्रा का बराबर का सहभागी है। उसने इस देश में शिक्षा, साहित्य, सेना, न्यायपालिका, विज्ञान, खेल, कला और राजनीति जैसे हर क्षेत्र में अपना योगदान दिया है। इसलिए जब उसके भीतर यह भावना जन्म लेने लगे कि उसकी लोकतांत्रिक भागीदारी भी संदेह के घेरे में है तो यह महज एक समाज की समस्या न होकर पूरे लोकतंत्र के लिए चेतावनी बन जाती है।
यह भी उतना ही सच है कि लोकतंत्र में किसी भी संस्था पर भरोसा बनाए रखना जरूरी है। इसलिए चुनाव आयोग की जिम्मेदारी सिर्फ मतदाता सूची को अद्यतन करना नहीं है। हर नागरिक के मन में यह विश्वास भी बनाए रखना उसकी जिम्मेदारी है कि उसके साथ किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा। यही लोकतांत्रिक न्याय का मूल सिद्धांत है। भारत की ताकत उसकी विविधता है। यह विविधता तभी सार्थक है, जब हर नागरिक बिना किसी भय, संदेह या असुरक्षा के अपने अधिकारों का उपयोग कर सके। किसी भी समुदाय के मन में यह भावना पैदा होना कि उसकी आवाज कमजोर पड़ रही है, लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। ऐसे समय में सरकार, चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि वे भय नहीं, भरोसा पैदा करें।
भरोसा सबका!
लोकतंत्र की रक्षा संविधान की किताब से ही नहीं होती, यह रक्षा उस विश्वास से भी होती है जिसके साथ एक साधारण नागरिक मतदान केंद्र तक जाता है। भारत का मुसलमान भी उसी विश्वास के साथ वोट देना चाहता है; बिना किसी संदेह के, बिना किसी भय के और इस यकीन के साथ कि इस देश के भविष्य को तय करने में उसकी आवाज भी उतनी ही अहम है, जितनी किसी और भारतीय की।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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