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लो जी! जिस कोयला घोटाले की आग में सालों से कई दिग्गजों की साख झुलस रही थी, उस पर दिल्ली की विशेष अदालत ने पानी फेर दिया है। केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जो इतने समय से आरोपियों को सलाखों के पीछे भेजने का ताना-बाना बुन रही थी, उसके मंसूबों पर पानी फिर गया है और जांच एजेंसी को एक बार फिर मुंह की खानी पड़ी है।
मामला था छत्तीसगढ़ के ‘विजय सेंट्रल कोल ब्लॉक’ आवंटन का। सीबीआई ने पूरे लाव-लश्कर के साथ दावा किया था कि एसकेएस इस्पात एंड पावर लिमिटेड और उसके कर्ता-धर्ताओं ने आसमान के तारे तोड़कर लाने जैसे झूठे वादे किए थे। एजेंसी का आरोप था कि नेटवर्थ, जमीन और निवेश के झूठे आंकड़े दिखाकर आंखों में धूल झोंकी गई और कोल ब्लॉक हथिया लिया गया। लेकिन जब अदालत की कसौटी पर परखने की बारी आई, तो सीबीआई के सारे दावे ‘रेत का महल’ साबित हुए। विशेष न्यायाधीश सुनेना शर्मा ने २७१ पन्नों के फैसले में साफ कह दिया कि सीबीआई के पास सबूतों के नाम पर ‘नौ नकद न तेरह उधार’ वाला हाल था। अदालत ने कहा कि धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश तो दूर, जांच एजेंसी कोई बेईमान इरादा तक साबित नहीं कर पाई।
इस पैâसले के बाद पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोध कांत सहाय के भाई सुधीर कुमार सहाय समेत कंपनी के बड़े अधिकारियों की तो जैसे लॉटरी लग गई है। सालों की कानूनी माथापच्ची के बाद आखिरकार उनके दिल को ठंडक मिली है। सीबीआई जो इस केस में दाल गलने की उम्मीद लगाए बैठी थी, उसे अब खाली हाथ ही संतोष करना पड़ेगा। वहीं दूसरी तरफ, सभी आरोपी कोर्ट से साफ-पाक मतलब बाइज्जत बरी होकर घी के दीए जला रहे हैं।
