मुख्यपृष्ठसमाचारवित्तीय संस्थाओं का अनियमित कारोबार बदनाम होते बैंक!

वित्तीय संस्थाओं का अनियमित कारोबार बदनाम होते बैंक!

-चुनावी बॉन्ड मामले में एसबीआई की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में

-पिछले एक साल में दर्जनों बैकों पर आरबीआई लगा चुका है जुर्माना

-आरबीआई में बैंकों के खिलाफ शिकायत करनेवालों की संख्या बढ़ी

पिछले एक साल में कमोबेश देश के सभी बड़े बैंकों पर आरबीआई ने जुर्माना ठोका है। आरबीआई को जुर्माना इसलिए लगाना पड़ा क्योंकि ये सभी बैंक नियम-कानून की धज्जियां उड़ाकर एक तरीके से कदाचार में लिप्त थे।’
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से चुनावी बॉन्ड मामले में एसबीआई के खिलाफ कड़ी टिप्पणी की है, असने सोचने को मजबूर कर दिया है कि क्या देश के बैंक अनियमिता बरतने में लिप्त हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो क्या वे कदाचार में लिप्त हैं? ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है कि पिछले एक साल में कमोबेश देश के सभी बड़े बैंकों पर आरबीआई ने जुर्माना ठोका है। आरबीआई को जुर्माना इसलिए लगाना पड़ा क्योंकि ये सभी बैंक नियम-कानून की धज्जियां उड़ाकर एक तरीके से कदाचार में लिप्त थे। इस बात को हल्के में नहीं लेना चाहिए क्योंकि बैकों में आम जनता के खून पसीने की गाढ़ी कमाई जमा रहती है। किसी बैंक की वित्तीय दशा केखराब होने पर ग्राहकों पर इसका बुरा असर पड़ता है। यही नहीं आरबीआई में बैकों के कामकाज के खिलाफ शिकायत करनेवाले ग्राहकों की संख्या बढ़ी है।
बता दें कि पिछले छह महीनों में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा की गई कार्रवाइयों की एक श्रृंखला ने वित्तीय क्षेत्र को हैरान कर दिया है। आरबीआई ने कई बैंकों के खिलाफ अनियमितता बरतने के लिए कार्रवाई की है। इसमें असुरक्षित ऋणों पर जोखिम के खिलाफ चेतावनी देना शामिल है। आईसीआईसीआई, बैंक ऑफ बड़ौदा, पेटीएम पेमेंट बैंक, आईआईएफएल और जेएम फाइनेंस समेत दर्जनों को-ऑपरेटिव बैंक के खिलाफ कड़े एक्शन ने इसके शेयरहोल्डरों को आश्चर्यचकित कर दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन कार्रवाइयों का उद्देश्य विनियमित संस्थाओं में व्यवहारिक परिवर्तन लाना और अनुपालन पर आरबीआई का ध्यान दिखाना है। आरबीआई के पूर्व डिप्टी गर्वनर आर गांधी कहते हैं, ‘संदेश स्पष्ट है। यदि आप सही व्यवहार नहीं करेंगे, तो सजा गंभीर हो सकती है, जिसमें (लाइसेंस रद्द करना) भी शामिल है। यही संदेश नियामक भेज रहा है। हम बंद करने में संकोच नहीं करेंगे, भले ही आप बड़े हों।’ जानकार बताते हैं कि ये कार्रवाइयां आरबीआई के प्रवर्तन दृष्टिकोण में बदलाव को दर्शाती हैं। आरबीआई का दृष्टिकोण पिछले आठ-नौ वर्षों में धीरे-धीरे बदल गया है। पहले आरबीआई किसी के खिलाफ कार्रवाई करने में उसके पुराने रिकॉर्ड देखता था। २०१३ में वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग की सिफारिशों के बाद यह दृष्टिकोण बदल गया। सिफारिशों में से एक यह थी कि किसी इकाई के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर निर्णय लेने के लिए सभी नियामकों के पास एक अलग प्रवर्तन कार्यक्षेत्र होना चाहिए। गांधी कहते हैं, ‘कुछ लाख या करोड़ का जुर्माना लगाने से इकाई के व्यवहार पर सीमित प्रभाव पड़ रहा था। इसलिए नियामक ने निष्कर्ष निकाला कि जुर्माने की गंभीरता को बढ़ाने की जरूरत है।’ अब कार्रवाईयों में संस्थाओं को नई शाखाएं खोलने से रोकना, व्यापार प्रतिबंध लगाना, एक विशिष्ट कार्यक्षेत्र को बंद करने के लिए कहना आदि शामिल है।
आरबीआई को मिलीं ७ लाख शिकायतें
जहां तक आम बैंकों का सवाल है तो ग्राहकों में उनके कामकाज के प्रति नाराजगी बढ़ती जा रही है। आरबीआई के मुताबिक, देश में बैंकों के खिलाफ शिकायतें तेजी से बढ़ रही हैं। रिजर्व बैंक ओमबड्समैन स्कीम के तहत दर्ज शिकायतों की संख्या ७ लाख के आंकड़े को पार कर गई हैं। वित्त वर्ष २०२२-२३ में यह आंकड़ा ६८ फीसदी से ज्यादा बढ़ा है। ये शिकायतें मोबाइल एवं इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग, लोन एवं एडवांस, एटीएम एवं डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, पेंशन पेमेंट, पैसा ट्रांसफर और पैरा बैंकिंग जैसे मसलों पर आधारित थीं। इसमें सबसे ज्यादा लगभग १.९६ लाख शिकायतें बैंकों के खिलाफ आई हैं। आरबीआई ओमबड्समैन स्कीम (लोकपाल योजना) पर जारी एक रिपोर्ट से इन आंकड़ों का खुलासा हुआ। रिजर्व बैंक की इंटीग्रेटेड ओमबड्समैन स्कीम, २०२१ के तहत यह पहली रिपोर्ट आई है। इसमें सभी २२ ऑफिस, प्रोसेसिंग सेंटर और कॉन्टेक्ट सेंटर से मिली जानकारी शामिल है। रिपोर्ट के अनुसार, आरबी-आईओएस, २०२१ के तहत मिली शिकायतों का नंबर तेजी से बढ़ा है। वित्त वर्ष २०२२-२३ में ओआरबीआईओ और सीआरपीसी में कुल ७,०३,५४४ शिकायतें मिली हैं। यह नंबर जन जागरूकता पहल के चलते ऊपर गया है।

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