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जब दे मेट!… राशाद के ‘राज’! -भाग २२

 

मनमोहन सिंह

राशाद को अस्पताल से वैन में बिठाकर ले जाया जा रहा था। वैन के शीशों पर परदे लगे हुए थे इसलिए वह अंदाजा नहीं लगा पा रहा था कि उसे कहां ले जाया जा रहा है। उसे बताया गया था कि वे लोग, जो उसे अस्पताल से, कहीं ले जा रहे थे, सीरियन स्पेशल मिशन फोर्सेज के लोग थे, लेकिन भला वे लोग सिर्फ उसके लिए सीरिया से टर्की क्यों आएंगे? गाड़ी के ब्रेक के साथ ही उसकी सोच में भी ब्रेक लग गई।
राशाद की आंखों पर पट्टी बांध दी गई। दरवाजा खुला। उसे हाथ देकर उतारा गया। एक लिफ्ट से ऊपर की ओर जा रहे थे, उसे इस बात का अंदाजा हो रहा था। लिफ्ट रुकी। सभी बाहर निकले। तीन लोगों में से एक व्यक्ति ने उसका हाथ पकड़ कर रखा था। चलते-चलते सभी एक कमरे में आए। कमरे में खामोशी छाई हुई थी। उसे कुर्सी में बिठाया गया। किसी के मुंह से एक लफ्ज नहीं निकला था। अब यह खामोशी राशाद को ना काबिले बर्दाश्त होने लगी थी। उसने कुछ बोलने के लिए गले को खकार कर ठीक ही किया था कि आवाज गूंजी ‘खामोश।’
वह चुप हो गया। ‘अब तुम अपनी जुबान तभी खोलोगे जब तुमसे कोई सवाल किया जाए समझे?’ फिर से आवाज गूंजी। इस वक्त राशाद को एन्ना की बड़ी याद आ रही थी। अस्पताल में एजेल की बात से उसे लगने लगा था कि अब उसकी मुलाकात एन्ना से हो जाएगी, लेकिन किस्मत उसे कहां ले आई थी। उसे पता था कि अगर उसे तुर्की से वापस सीरिया ले जाया गया तो शायद उसकी जिंदगी जेल में ही बीतेगी और एन्ना से उसकी मुलाकात एक ख्वाब बनकर रह जाएगी।
उसके दिल में एक हूक सी उठी। उसने महसूस किया कि उसके कानों में ईयर फोन लगा दिए गए हैं ताकि उसको दिए गए इंस्ट्रक्शन किसी और को सुनाई न दें। अब ईयर फोन पर आवाज सुनाई दे रही थी। ‘राशाद हमें अफसोस है कि हमें आपको इस तरह लाना पड़ा लेकिन एक बात याद रखें आप पर जो आरोप हैं, उनसे हम मुतमइन हैं। खुदा के वास्ते झूठ बोलकर अपनी और अपने चाहने वालों की जिंदगी जहन्नम मत बनाइए।’
‘अल्लाह तुम्हारी हिफाजत करें तुम जहां रहो सलामत रहो एन्ना…सइदती’ बेसाख्ता राशाद के मुंह से निकला।
‘एन्ना सइदती’ उसके कानों में आवाज गूंजी। ‘कौन है तुम्हारी हमदम? हमकदम? हमराह? तुम्हारी साजिश में तुम्हारी भागीदार?’
‘नहीं…एन्ना…’ उसने कहा।
‘एन्ना…के बारे में…आप बताएंगे या फिर हम ‘उन्हें भी…’
‘उन्हें भी क्या…?’ उसने पूछा
‘कुछ नहीं हमें ज्यादा वक्त नहीं लगेगा उन्हें लाकर उनसे पूछताछ करने में…’
लेकिन क्यों?… उनका इस बात से क्या संबंध? उसने कहा।
यानी इस बात से नहीं… तो किस बात से है? सामने से सवाल पूछा गया जिसमें ‘इस’ और ‘किस’ पर जोर दिया गया था।
‘राशाद हम जानते हैं कि तुमने उसे जो डायरी दी थी उसमें बहुत सारे तुम्हारे राज छिपे हुए थे। तुमने बहुत सारे मैसेज जो तुमने ‘कोड लैंग्वेज’ में लिखे थे उसके जरिए यूक्रेन सरकार तक पहुंचा दिए। तुम जानते हो रशिया और यूक्रेन के बीच इस वक्त खूनी जंग चल रही है। रशिया और सीरिया के ताल्लुकात दोस्ताना रहे हैं। क्या तुम इस बात से वाकिफ नहीं हो? तुम्हारी डायरी हमारे हाथ लग चुकी है!
‘बैईशक’ ‘तुबूरनी’ ‘या रूहे’ इनका सीधा-सीधा मतलब है कि सीरिया आजादी से तुम्हारी मोहब्बत हमेशा बनी हुई है और तुम आजादी के बिना नहीं रह सकते वह तुम्हारी रूह है सीरिया की आजादी।’ यानी तुमने सीरिया की आजादी के लिए रूस के जानी दुश्मन यूक्रेन से मदद मांगी है! वहां की जासूस है जो तुम्हें मदद करती है!
तुमने एक कविता लिखकर उसे भेजी थी जो तुमने उसे सुनाई भी थी इसका मतलब भी यही है।
मेरी रूह, मैं तुम्हारे दूसरे आशिकों जैसा नहीं हूं।
आशिक मतलब अल्थूवरु द रेबल
मैं तुम्हें देता हूं बारिश। तुम उसे बारिश दोगे बारिश यानी इनफॉरमेशन। यदि वह दे तुम्हें एक लालटेन, मैं दूंगा तुम्हें चांद।
लालटेन का मतलब आग और अगर दूसरा तुम्हें देता है एक जहाज
मैं दूंगा तुम्हें सफर…’
‘सफर यानी जंग जारी रखने की योजना
यही है न तुम्हारी कविता का मतलब
इतने सारे कोड वर्ड में तुम सीरिया में चल रहे सिविल वार को मदद कर रहे हो, विदेशी मदद, यूक्रेन की मदद’, उसके कानों में वह आवाज बोल रही थी। ‘राशाद अब तुम्हें सब कुछ बताना होगा वरना तुम्हारी और एन्ना की मुलाकात के लिए हम ऐसी जगह मुकर्रर करेंगे जो तुमने कभी सोचा भी नहीं होगा।’
(क्रमश:)

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