-आईएलओ के ऐतिहासिक समझौते पर मतदान से दूर रहा भारत; शशि थरूर बोले, यह राष्ट्रीय शर्म
ऐप के जरिए भोजन पहुंचाने, टैक्सी चलाने और अन्य सेवाएं देने वाले करोड़ों गिग वर्कर्स के अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय समझौते पर भारत सरकार के मतदान से दूर रहने को लेकर कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने मोदी सरकार पर तीखा हमला किया है। थरूर ने सरकार के फैसले को ‘राष्ट्रीय शर्म’ बताते हुए सवाल उठाया कि जब भारत के कामगार और नियोक्ता प्रतिनिधि प्रस्ताव के समर्थन में थे, तब सरकारी प्रतिनिधि ने मतदान से परहेज क्यों किया?
जिनेवा में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय श्रम सम्मेलन के ११४वें सत्र में जून २०२६ में ‘डिसेंट वर्क इन द प्लेटफॉर्म इकोनॉमी कन्वेंशन’ को स्वीकार किया गया। यह प्लेटफॉर्म और गिग अर्थव्यवस्था में काम करने वाले श्रमिकों के लिए दुनिया का पहला बाध्यकारी अंतर्राष्ट्रीय श्रम मानक है। इसके पक्ष में ४०६ प्रतिनिधियों ने मतदान किया, आठ ने विरोध किया, जबकि भारत और ब्रिटेन सहित ३६ प्रतिनिधियों ने मतदान में हिस्सा नहीं लिया।
थरूर ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर लिखा कि यह कन्वेंशन गिग वर्कर्स के लिए न्यूनतम श्रम मानक स्थापित करता है। उन्होंने दावा किया कि भारतीय नियोक्ता और कामगार प्रतिनिधियों ने इसके समर्थन में मतदान किया, लेकिन भारत सरकार का प्रतिनिधि मतदान से अनुपस्थित रहा। उपलब्ध मतदान विश्लेषण भी बताता है कि भारत के श्रमिक और नियोक्ता प्रतिनिधियों ने समर्थन किया था, जबकि सरकारी प्रतिनिधि ने मतदान से दूरी बनाई।
डिलिवरी बॉय से कैब ड्राइवर तक के अधिकारों का सवाल
नए घ्थ्ध् कन्वेंशन में प्लेटफॉर्म कर्मचारियों के लिए उचित पारिश्रमिक, सामाजिक सुरक्षा, सुरक्षित कार्य परिस्थितियां और अनुचित तरीके से नौकरी समाप्त करने या ऐप से निष्क्रिय किए जाने के खिलाफ संरक्षण जैसे प्रावधान शामिल हैं। इसमें यह भी कहा गया है कि कंपनियों को यह बताना होगा कि एल्गोरिदम के जरिए काम, भुगतान, रेटिंग और कर्मचारियों की उपलब्धता से जुड़े पैâसले वैâसे लिए जाते हैं। यह समझौता कर्मचारी और स्वतंत्र ठेकेदार के कानूनी वर्गीकरण से अलग कुछ न्यूनतम अधिकार देने का वैश्विक ढांचा तैयार करता है। हालांकि, इसे किसी देश में लागू करने के लिए उस देश की सरकार को इसका अनुमोदन करके राष्ट्रीय कानूनों में आवश्यक बदलाव करने होंगे। भारत में लाखों युवा फूड डिलिवरी, वैâब सेवा, ई-कॉमर्स, घरेलू सेवाओं और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर काम करते हैं। इनमें से बड़ी संख्या को नियमित वेतन, निश्चित काम के घंटे, दुर्घटना बीमा, सवेतन अवकाश और नौकरी की स्थिरता जैसी सुविधाएं नहीं मिलतीं। ऐसे में अंतर्राष्ट्रीय मानक पर भारत की चुप्पी ने केंद्र सरकार की श्रमिक नीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
कामगार भी पक्ष में, नियोक्ता भी पक्ष में, सरकार पीछे क्यों?
ILO की व्यवस्था त्रिपक्षीय है, जिसमें किसी देश की सरकार के साथ श्रमिक और नियोक्ता प्रतिनिधि भी भाग लेते हैं। भारत के दोनों सामाजिक साझेदारों के समर्थन के बावजूद सरकारी प्रतिनिधि के मतदान से दूर रहने के कारण यह विवाद अधिक गंभीर हो गया है।
कांग्रेस का सवाल है कि जब न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल की सुरक्षा जैसे बुनियादी अधिकारों पर व्यापक सहमति थी, तो मोदी सरकार ने समर्थन देने के बजाय तटस्थ रहने का रास्ता क्यों चुना? क्या सरकार को आशंका थी कि कन्वेंशन का समर्थन करने से डिजिटल कंपनियों पर अधिक जिम्मेदारियां और वित्तीय बोझ पड़ेगा?
सरकार की ओर से मतदान से दूर रहने के विस्तृत कारण सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किए गए हैं। इसलिए यह कहना अभी संभव नहीं है कि भारत ने कन्वेंशन के किसी विशेष प्रावधान, कानूनी वर्गीकरण या घरेलू कानूनों से संभावित टकराव के कारण मतदान से दूरी बनाई।
डिजिटल इंडिया का बोझ ढोने वालों से बेरुखी?
सरकार डिजिटल अर्थव्यवस्था, स्टार्टअप और ऑनलाइन सेवाओं को रोजगार सृजन का बड़ा माध्यम बताती रही है। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि इसी अर्थव्यवस्था को अपने श्रम से चलाने वाले गिग वर्कर्स के वेतन, बीमा और सामाजिक सुरक्षा के प्रश्न पर सरकार कंपनियों के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है। थरूर का हमला केवल एक अंतर्राष्ट्रीय मतदान तक सीमित नहीं है। इसने बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा किया है। क्या भारत की तेजी से बढ़ती प्लेटफॉर्म अर्थव्यवस्था का लाभ केवल ऐप कंपनियों और निवेशकों को मिलेगा या उसे चलाने वाले डिलिवरीकर्मियों, वैâब चालकों और दूसरे श्रमिकों को भी सम्मानजनक काम और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार मिलेगा? सरकार को अब स्पष्ट करना होगा कि उसने मतदान से दूरी क्यों बनाई और क्या वह घ्थ्ध् कन्वेंशन संख्या १९३ के अनुमोदन पर भविष्य में विचार करेगी। जब भारत के नियोक्ता और श्रमिक प्रतिनिधि एक मंच पर सहमत थे, तब सरकारी चुप्पी को केवल कूटनीतिक तटस्थता बताकर टालना आसान नहीं होगा।
