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देश का मूड : अगला टारगेट भी सेट … अब भाइयों पर निशाना!

अनिल तिवारी

साम, दाम, दंड, भेद की नीति अब बुरी नहीं मानी जाती है। बल्कि, इन दिनों तो यह राजनीतिक शिष्टाचार है। किसी दौर में इसे वैचारिक भ्रष्टाचार माना जाता रहा होगा, पर अब `फूट डालो और राज करो’ को संगठन कौशल की श्रेणी में रखा जाता है, इसे चाणक्य नीति की उपमा दी जाती है, राजनीति का चातुर्य माना जाता है और इस श्रेणी में नए दौर की भाजपा नित नए रिकॉर्ड कायम कर लेना चाहती है। इसी का नतीजा है कि हाल के वर्षों में देश के तकरीबन सभी प्रमुख दलों में या तो फूट डाली गई है, डाली जा रही है या उनसे जुड़े राजनीतिक परिवारों में कलह करवाई जा रही है। दूसरी पार्टियों के प्रमुख नेताओं को साम, दाम, दंड, भेद से उनकी पार्टियों से दूर किया जा रहा है। नए दौर में इसी को कथित तौर पर राजनीति कहा जाता है और इस नई राजनीति का ताजा शिकार हुई है झारखंड की सत्ताधारी पार्टी झारखंड मुक्ति मोर्चा यानी जेएमएम।
मंगलवार को देश की राजनीति में दो महत्वपूर्ण घटनाएं घटीं। एक ओर तो जेएमएम प्रमुख शिबू सोरेन की बड़ी बहू सीता सोरेन ने अचानक से अपनी पार्टी का दामन छोड़कर भाजपा का पल्लू पकड़ लिया तो दूसरी ओर भाजपा सरकार में शामिल बिहार की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष पशुपति नाथ पारस ने एक झटके में भाजपा सरकार से अपना नाता तोड़ दिया। इन दोनों ही घटनाओं में जो समान तथ्य है वो यह कि दोनों ही पार्टियों को तोड़ने और उनके परिवारों में कलह करवाने वाला `बिग बॉस’ कॉमन ही है। यह टीवी के बिग बॉस की तरह ही सभी को आपसी कलह का एक सुगम वातावरण मुहैया कराता है। लिहाजा, जब यह वातावरण समाजवादी पार्टी के लिए बनता है तो पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की छोटी बहू अर्पणा यादव अपनी ही पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो जाती हैं और जब यह झामुमो के लिए बनता है तो सोरेन की बड़ी बहू सीता सोरेन भाजपाई हो जाती हैं। पिछले दशक भर के इतिहास को पलट कर देखा जाए तो हर किसी राज्य में हर एक दल के लिए ऐसा ही वातावरण बन चुका है। इस नाते विगत ५ वर्षों के दौर को क्षेत्रीय दलों के विघटन काल के रूप में दर्ज किया जाएगा। उत्तर से दक्षिण तक तमाम क्षेत्रीय दलों को तोड़ने के विघटन कथाकार यही बिग बॉस हैं। सियासत की उपरोक्त दोनों कद्दावर बहुओं के साथ ही साथ इनकी नजर सियासत के चाचा भतीजों पर भी थी। पशुपतिनाथ पारस और चिराग पासवान पर थी और महाराष्ट्र में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष शरद पवार और उनके भतीजे अजीत पवार पर थी। नतीजे में उन्होंने, न केवल दोनों राजनीतिक परिवारों में सफलतापूर्वक कलह करवाई, बल्कि दोनों ही पार्टियों में सुनियोजित फूट डालकर उन्हें तहस-नहस करने का सफल प्रयास भी किया। डोरे तो चाचा शिवपाल यादव पर भी डाले गए थे, पर उन्होंने समय रहते बिग बॉस की चाल को समझ लिया और भतीजे अखिलेश यादव से सियासी जंग करने का इरादा त्याग दिया। राजनीति के यह बिग बॉस समय-समय पर ऐसे तमाम प्रयोग करते ही रहते हैं। बहू-बेटियों और चाचा- भतीजों की उनके पास लंबी फेहरिस्त है। इस फेहरिस्त के अलग-अलग पन्नों पर परिवार के अलग-अलग रिश्ते दर्ज हैं। किसी पन्ने पर सगे भाइयों के भी नाम लिखे हैं। उनमें बिहार की प्रमुख विपक्षी पार्टी का नाम भी शामिल हो सकता है। जहां पारिवारिक रिश्ते नहीं होंगे तो वहां पार्टी के आत्मीय जनों के रिश्तों को भी निशाना बनाया जा सकता है नीतिश बाबू की पार्टी भी निशाने पर आ सकती है। महाराष्ट्र में शिवसेना और तमिलनाडु में एआईएडीएमके इसका शिकार हो ही चुके हैं। कुछ अन्य दलों पर भी प्रयोग जारी ही हैं, जिसकी क्रोनोलॉजी अब जनता को समझ आने लगी है। हो न हो इस क्रोनोलॉजी का कहर आगामी लोकसभा चुनाव पर भी नजर आए, पांसा सीधे की बजाय उल्टा न पड़ जाए। बिग बॉस को इसका ख्याल भी रखना ही चाहिए।

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