मुख्यपृष्ठस्तंभदेश का मूड : सबसे मजबूत गठबंधन ईवीएम!

देश का मूड : सबसे मजबूत गठबंधन ईवीएम!

अनिल तिवारी
लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, ४०० पार का दावा करनेवाली भाजपा को नए-नए गठबंधन करने की जरूरत महसूस हो रही है। जरूरत भी ऐसी कि उसे ऐसे-ऐसे दलों को ढूंढ़ना पड़ रहा है, जो अर्सा पहले ही कहीं ‘बिनाका गीत माला’ की भूले-बिसरों वाली सूची में शामिल हो चुके थे। खैर, यह उनका-उनका, अपना-अपना विषय है, जो जिससे चाहे उससे गठबंधन करे पर वो ऐसा करके देश के मूड को प्रभावित कर सकेगा, इसमें संदेह ही है। इसीलिए शायद विपक्ष के लिए ये गठबंधन उतना बड़ा विषय नहीं है, जितना कि ईवीएम से संभावित छेड़छाड़ का डर। विपक्ष भाजपा के लिए हमेशा ईवीएम को मजबूत गठबंधन करार देता रहा है और उसका दावा भी रहा है कि उसे चिंता एनडीए के लुप्तप्राय गठबंधन साथियों से नहीं है, बल्कि ईवीएम के मशीनी गठबंधन से है। इस बार २०२४ में उसे यानी कि `इंडिया’ गठबंधन अपनी स्थिति एनडीए से काफी मजबूत नजर आ रही है, बशर्ते ईवीएम पर ईमानदारी से वोट पड़ें।
इन दिनों विपक्षी `इंडिया’ गठबंधन का तकरीबन हर एक सदस्य लगातार ईवीएम के प्रति वोटरों को सतर्क कर रहा है। बताया जा रहा है कि बैलेट यूनिट पर बटन दबाते समय उससे जुड़ी वीवीपैट मशीन पर निकली पर्ची का ठीक से मिलान कर लिया जाए और वोट डालते समय सतर्क रहकर मतदान किया जाए। वगैरह… वगैरह! ऐसा नहीं है कि विपक्ष की ये हिदायतें कोरा अंधविश्वास हैं। तमाम ऐसे उदाहरण मिले हैं, जहां ईवीएम मशीन की भयंकर गड़बड़ी पाई गई है। अब ये गड़बड़ियां तकनीकी कमजोरी का नतीजा थीं या मानवीय चतुरता का प्रमाण, इस पर तो कभी कोई जांच ही नहीं हो सकी है तो उसका आकलन करना कठिन ही है। परंतु, इतना तो तय है कि सूचना-तकनीकी विज्ञान के इस अत्याधुनिक युग में ऐसी शायद ही कोई इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस होगी, जिससे मौजूदा वक्त में छेड़छाड़ संभव न हो। फिर चाहे वह ईवीएम जैसी अति सुरक्षित मानी जानेवाली मशीन ही क्यों न हो, जब नीयत में खोट हो तो फिर किसी में भी सेंध लगाई जा सकती है। राजनीति के वर्तमान दौर में ‘खोटी नीयत’ का खुलेआम प्रदर्शन देखकर इससे इनकार भी नहीं किया जा सकता है। विपक्ष के डर का कारण ही यही है। यदि देश में सुचिता की राजनीति हो रही होती। नैतिक आचरण का अनुसरण हो रहा होता तो शायद ईवीएम हैकिंग का मुद्दा चुनावी न बना होता। इसलिए जब राहुल गांधी कहते हैं कि राजा कि आत्मा ईवीएम और ईडी में है तो जनता को ताजा राजनैतिक हालात देखकर उनकी बातों पर विश्वास भी पुख्ता हो जाता है। तब विपक्ष को चुनाव प्रचार में भरोसा दिलाना पड़ता है कि यदि वे चुनकर आए तो ईवीएम की व्यवस्था को हटाकर फिर से मतपत्रों से मतदान कराया जाएगा, ताकि मतदाताओं को यह न लगे कि उनका मतदान व्यर्थ हो गया। चुनावी नतीजे देश के मूड के आधार पर ही आएंगे।
चुनाव आयोग चाहे कितना ही जोर देकर क्यों न कहे कि देश की संवैधानिक अदालतों ने ४० बार ईवीएम से जुड़ी चुनौतियों को देखा है। यह पूरी तरह सेफ और टेस्टेड चुनावी प्रक्रिया का हिस्सा है, फिर भी जनता को उस पर विश्वास नहीं होता। हो सकता है चुनाव आयोग का दावा सच हो पर सच तो यह भी है कि यह वही चुनाव आयोग है, जो चंडीगढ़ मेयर चुनाव की धांधली पर चुनाव आयोग की चुप्पी भी देख चुका है। देश ने शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से उनका नाम और चिह्न छीनने का आयोगी षड्यंत्र भी देखा है और उस पर चुनाव आयोग की समय-समय पर सत्ताप्रेमी चतुराई भी देखी है। इतना ही नहीं, देश ने मुख्य चुनाव आयुक्त के एकतरफा फैसले भी देखे हैं और टीएन शेषन की मेहनत और लगन से बनी विश्वसनीयता को मिट्टी में मिलते भी देखा है। ऐसे में यदि शक की सुई ईवीएम पर आकर टिके तो इसमें अनपेक्षित क्या है? बैलेट यूनिट, कंट्रोल यूनिट और वीपीपैट पर शंका के बादल गहराए तो इसमें ‘आपेक्षाई’ ही क्या है? सत्ता का ईवीएम से सबसे मजबूत गठबंधन तो दिखा ही रहा है। ऐसे में सवाल उठें तो इसमें गलत क्या है?

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