सना खान
कुछ बच्चे हारने से नहीं टूटते, वो तब टूटते हैं जब उन्हें हर बार किसी और से कम महसूस कराया जाता है। ‘देखो वो कितना अच्छा है’ ‘उसके जैसे बनो’ ‘तुम उससे पीछे क्यों हो?’ ये बातें शायद कुछ लोगों को सामान्य लगती हों, लेकिन बच्चों के मन में ये धीरे-धीरे एक कमी का एहसास भर देती हैं। फिर वो अपनी अच्छाइयां देखना छोड़ देते हैं। उन्हें हर जगह बस अपनी कमियां दिखाई देने लगती हैं। कुछ बच्चे तुलना सुन-सुनकर खुद से नाराज रहने लगते हैं। उन्हें लगने लगता है कि वो जैसे हैं वैसे कभी काफी नहीं होंगे। धीरे-धीरे
वो अपनी पसंद छुपाने लगते हैं, गलती करने से डरने लगते हैं और हर काम सिर्फ दूसरों को खुश करने के लिए करने लगते हैं। कुछ बच्चे अच्छे अंक लाने के बाद भी खुश नहीं हो पाते क्योंकि उन्हें हमेशा किसी और से बेहतर बनने का दबाव महसूस होता है।
और सबसे खामोश दर्द ये होता है कि तुलना सिर्फ बच्चों की आदतें नहीं बदलती वो उनका आत्मविश्वास बदल देती है। फिर वही बच्चे बड़े होकर भी हर जगह खुद को दूसरों से मापते रहते हैं। किसी की सफलता देखकर खुद को छोटा समझते हैं, किसी की तारीफ सुनकर अपने अंदर कमी महसूस करते हैं और धीरे-धीरे अपनी पहचान खोने लगते हैं। क्योंकि बचपन में उन्हें ये एहसास ही नहीं मिला होता कि वो जैसे हैं वैसे भी कीमती हैं। हर बच्चा अलग होता है। किसी की गति तेज होती है, किसी की सोच गहरी होती है, किसी में हुनर जल्दी दिखता है और किसी को खिलने में थोड़ा समय लगता है। लेकिन जब हर वक्त उन्हें किसी और जैसा बनने को कहा जाए तो वो खुद जैसा होना भूल जाते हैं।
धीरे-धीरे वो अपनी तुलना हर इंसान से करने लगते हैं। किसी का चेहरा, किसी की नौकरी, किसी की सफलता, किसी की जिंदगी, उन्हें हर जगह खुद में कमी दिखाई देने लगती है। और सबसे दर्दनाक बात ये है कि कई बच्चे अपनी असली पहचान बनाने से पहले ही खुद को गलत मान बैठते हैं। फिर वो बड़े होकर भी अपनी उपलब्धियों से खुश नहीं हो पाते क्योंकि उनके अंदर हमेशा एक आवाज चलती रहती है- ‘कोई तुमसे बेहतर है’, कुछ लोग पूरी जिंदगी दूसरों जैसा बनने की कोशिश में बिताते हैं सिर्फ इसलिए क्योंकि बचपन में उन्हें कभी ये महसूस ही नहीं कराया गया कि वो जैसे हैं वैसे भी काफी हैं। बच्चों को प्रेरित कीजिए, लेकिन उन्हें ये मत सिखाइए कि उनकी कीमत किसी और से बेहतर होने पर तय होगी। क्योंकि तुलना सिर्फ एक आदत नहीं, वो धीरे-धीरे बच्चों के आत्मविश्वास, पहचान और अंदर की शांति को तोड़ देती है।
(अगर बचपन में उनकी मानसिक स्थिति को नजरअंदाज किया जाए, तो वही दर्द बड़े होकर बेचैनी, असुरक्षा और खामोशी बन जाता है। इसलिए बच्चों को सिर्फ सफल बनाना जरूरी नहीं, उन्हें भावनात्मक रूप से मजबूत और स्वस्थ बनाना भी उतना ही जरूरी है।)
