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छात्र आंदोलन से उठे सवाल

-भोजन, एफआईआर और राजनीतिक बयानबाजी के बीच असली मुद्दे पीछे

सामना संवाददाता / मुंबई
जंतर-मंतर पर प्रतियोगी परीक्षाओं में सुधार की मांग को लेकर हुए छात्र आंदोलन के बाद राजनीतिक टकराव लगातार तेज होता जा रहा है। आंदोलन से जुड़े अलग-अलग घटनाक्रमों ने अब भोजन के लिए जुटाए गए धन, प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी, पुलिस कार्रवाई और परीक्षा सुधार समिति के सदस्यों की योग्यता तक को विवाद के केंद्र में ला दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या विद्यार्थियों की मूल मांगें राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के शोर में पीछे छूट रही हैं? आंदोलन के दौरान विद्यार्थियों को खाना खिलाने वाले जुनैद को लेकर बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष अमील शम्सी ने गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि पुलिस ने जब भोजन की व्यवस्था पर खर्च हुए धन का स्रोत पूछा तो जुनैद ने स्पष्ट जवाब देने के बजाय अपने धर्म और सांप्रदायिक सौहार्द का मुद्दा उठाना शुरू कर दिया। शम्सी ने जुनैद के भावुक होने को ‘नाटक’ बताते हुए कहा कि धन वैध स्रोत से आया है तो उसका हिसाब सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
बीजेपी नेता ने छात्र आंदोलन की तुलना शाहीन बाग, किसान आंदोलन, पहलवानों के प्रदर्शन और वक्फ संशोधन के विरोध से भी की। उन्होंने आरोप लगाया कि विरोध प्रदर्शनों में एक समान राजनीतिक पैटर्न दिखाई देता है।
इसी बीच आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल ने छात्र आंदोलन से जुड़े युवाओं के खिलाफ दर्ज मुकदमों को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला बोला। उन्होंने चीन की वैज्ञानिक उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए तंज किया कि एक ओर चीन ‘कृत्रिम सूरज’ जैसी परियोजनाओं पर काम कर रहा है, जबकि भारत में सोशल मीडिया पर प्रधानमंत्री का मजाक उड़ाने वाले बच्चों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जा रही है। जंतर-मंतर पर प्रधानमंत्री के खिलाफ कथित अभद्र टिप्पणी करने वाली युवती के विरुद्ध नोएडा में जीरो एफआईआर दर्ज की गई। चूंकि कथित घटना दिल्ली में हुई थी इसलिए मामला संबंधित पुलिस थाने को भेजा जा सकता है। इस कार्रवाई ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आपराधिक कार्रवाई की सीमा पर बहस छेड़ दी है। पुलिस को यह स्पष्ट करना होगा कि शिकायत किन शब्दों, धाराओं और साक्ष्यों के आधार पर दर्ज की गई तथा कार्रवाई आलोचना के कारण हुई या कथित आपत्तिजनक भाषा के कारण। छात्र आंदोलन से जुड़ी राजनीतिक गर्मी संसद तक भी पहुंच गई।
कौन देगा छात्रों के सवालों का जवाब
सत्ता पक्ष आंदोलन के पीछे राजनीतिक नेटवर्क और संदिग्ध फंडिंग देख रहा है, जबकि विपक्ष पुलिस कार्रवाई को असहमति दबाने की कोशिश बता रहा है। असली कसौटी यह है कि परीक्षा व्यवस्था में क्या सुधार हुआ, पेपर लीक के लिए कौन जवाबदेह ठहराया गया, विद्यार्थियों की शिकायतें किस मंच पर सुनी गईं और भविष्य में ऐसी गड़बड़ियों को रोकने के लिए क्या व्यवस्था बनी। जब तक इन सवालों का ठोस उत्तर नहीं मिलता, राजनीतिक घमासान बढ़ता रहेगा और जिन विद्यार्थियों के नाम पर यह पूरी लड़ाई लड़ी जा रही है, उनकी आवाज सबसे पीछे छूटती जाएगी।

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