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रोखठोक : इतने सालों बाद भी मुंबई किसकी? …महाराष्ट्र दिवस की पुरानी व्यथा

संजय राऊत – कार्यकारी संपादक ।

महाराष्ट्र की स्थापना को ६२ साल हो गए हैं, फिर भी ‘मुंबई किसकी है?’ यह सवाल हमेशा चर्चा में रहता है। क्योंकि देश के इस प्रमुख आर्थिक और औद्योगिक केंद्र को महाराष्ट्र से अलग किया जाए इसके लिए अमीरों का संघर्ष आज भी जारी है! जो लोग अखंड हिंदुस्थान का सिर्फ सपना दिखाते हैं वही महाराष्ट्र के दुश्मन बन गए हैं।

 महाराष्ट्र निश्चित तौर पर किस दिशा में आगे बढ़ रहा है? महाराष्ट्र को अस्तित्व में आए ६२ साल हो गए हैं और राज्य के निर्माण का उत्सव नियमित तौर पर मनाया जाता रहा है। लेकिन आज महाराष्ट्र पहले से कहीं अधिक अशांत और अस्थिर हो गया है। आदर्शों की अवहेलना, आज के महाराष्ट्र में इस एक नई प्रथा का प्रयास हो रहा है। ऐसा अब रोज ही हो रहा है। केंद्र सरकार आजादी का अमृत महोत्सव मना रही है। उस स्वतंत्रता संग्राम में महाराष्ट्र सबसे आगे था, यह वर्तमान केंद्रीय नेतृत्व भूल गया है। छत्रपति शिवाजी महाराज, अटक-कंधार तक तलवार चलानेवाले पेशवा, औरंगजेब को महाराष्ट्र में दफनाने वाले मराठा, तात्या टोपे, झांसी की रानी, क्रांतिवीर फड़के, लोकमान्य तिलक न होते तो क्या स्वतंत्रता संग्राम की चिंगारी भड़की होती? महाराष्ट्र ने एक आदर्श निर्माण किया, उन आदर्शों की अवहेलना करनेवाले लोग इसी राज्य में पैदा हुए। महाराष्ट्र में समाज के कई लोग बहुआयामी विकास के छोटे-बड़े सपनों को सामने रखकर उन सपनों को साकार करने के लिए अपना जीवन समर्पित करते नजर आए। आदर्श, ध्येय इन शब्दों पर महाराष्ट्र का समाज विश्वास करता था। क्योंकि इन शब्दों के पीछे असंख्य ध्येय वीरों की फौज महाराष्ट्र ने खड़ी की। दिनांक २४ अप्रैल को लता मंगेशकर के नाम पर दिया जानेवाला पुरस्कार लेने के लिए देश के प्रधानमंत्री मोदी मुंबई आए थे। प्रधानमंत्री मुंबई में, लेकिन उस निमंत्रण पत्र पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री का नाम ही नहीं था। यह महाराष्ट्र का ही अपमान है। लता मंगेशकर महाराष्ट्र की थीं, उनके निधन को चार महीने भी नहीं हुए हैं। उनके परिवार ने उनके नाम पर यह पुरस्कार प्रदान किया, जो कि मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में। उनका यह भी कर्तव्य था कि वे आयोजकों से पूछें कि ‘क्या महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री को आमंत्रित नहीं किया गया है?’ लेकिन ऐसा नहीं हुआ। क्योंकि देश की राजनीति महाराष्ट्र के बगैर शुरू हो गई है और मराठी नेता कांग्रेस के दौर में नहीं थे उससे ज्यादा दिल्ली के गुलाम बन गए हैं। आज महाराष्ट्र दिवस पर इस अवस्था को लेकर कोई व्यथित होगा क्या?
राज्य निर्माण करनेवाले नेता!
श्री शरद पवार, महाराष्ट्र के राष्ट्रीय स्तर के बड़े नेता हैं। महाराष्ट्र के निर्माण में उनका बड़ा योगदान रहा है। बालासाहेब ठाकरे ने महाराष्ट्र के निर्माण में अलग तरह का योगदान दिया। संयुक्त महाराष्ट्र आंदोलन में वे एक व्यंग्य चित्रकार के रूप में फटकार लगाते थे। बाद में महाराष्ट्र की अस्मिता के लिए और भूमिपुत्रों के अधिकारों के लिए वे प्रत्यक्ष रण में उतर गए। बाद में उनके द्वारा गठित शिवसेना और उससे खड़ा हुआ स्वाभिमानी महाराष्ट्र, ये एक आदर्श कार्य है। मुंबई में शिवसेना नहीं होती, तो आज उसे केंद्र शासित बनने में देर नहीं लगी होती। बालासाहेब ठाकरे ने तोल-मोल कर राजनीति की, लेकिन वे मुख्यमंत्री आदि नहीं बने। उन्होंने कई लोगों को उस ‘पद’ पर बैठाया और विकास कार्यों को अंजाम दिया। शरद पवार कई बार मुख्यमंत्री और केंद्र में मंत्री बने। महाराष्ट्र के औद्योगिक और सामाजिक विकास में उन्होंने काम किया। यशवंतराव ने यह कार्य शुरू किया था। शरद पवार ने इसे शिखर पर पहुंचाया। औद्योगिक महाराष्ट्र ने देश के समक्ष एक आदर्श पेश किया। महाराष्ट्र की औद्योगिक प्रगति का मूल मुंबई की आर्थिक शक्ति में है। अब केंद्र ने इस शक्ति पर प्रहार करना शुरू किया है और महाराष्ट्र की महानता के ताज को नीचे उतार दिया। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से वैश्विक स्तर के नेता मुंबई नहीं आए हैं। उन्हें पहले गुजरात और फिर दिल्ली ले जाया जाता है। श्री शरद पवार ने सप्ताह भर पहले यही दुख व्यक्त किया था। हिंदुस्थान में आनेवाले विश्व के नेताओं को प्रधानमंत्री मोदी गुजरात ले जाकर अपने राज्य का विकास करते हैं, ऐसा श्री पवार जब कहते हैं तो मामले को गंभीरता से लेना ही चाहिए। गुजरात से झगड़ने की कोई वजह नहीं है, परंतु मुंबई-महाराष्ट्र को नीचा दिखाने के लिए ऐसा किया जाता है। देश में अन्य राज्य और शहर भी हैं। प्रधानमंत्री पूरे देश के होते हैं, उस पर मुंबई देश की आर्थिक राजधानी है। इस ‘आर्थिक’ महत्व को कम करने के लिए, मुंबई से अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय केंद्र को गुजरात में स्थानांतरित कर दिया गया था। भविष्य में मुंबई के हाथ-पैर भी इसी तरह छांटे जाएंगे!
मुंबई किसकी?
इतने वर्षों के बाद भी मुंबई किसकी है, ऐसा सवाल पूछा जाता है। मुंबई महाराष्ट्र की ही है। यह मुंबई में रहनेवाले सभी लोगों की है। क्योंकि वह हिंदुस्थान की है। लेकिन वह पहले महाराष्ट्र की है, इसलिए हिंदुस्थान की है। मुंबई को महाराष्ट्र से अलग करने की साजिश आज भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। पहले मुंबई के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय महत्व को कम करना और एक गफलत का मौका देखकर मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश बनाना। श्री देवेंद्र फडणवीस और महाराष्ट्र की उनकी भाजपा को इसकी पूरी जानकारी है। फडणवीस ने मुंबई में जो अमराठी पंचक तैयार किया है, उससे मुंबई को महाराष्ट्र से वैâसे अलग किया जा सकता है, इसका एक ‘प्रजेंटेशन’ तैयार करके उसे गृह मंत्रालय में पेश किया। ‘विक्रांत’ घोटाले के आरोपी और उनके अमराठी बिल्डर साथियों के हाथ में अभियान की कमान है। एक तरफ हम महाराष्ट्र दिवस मनाते हैं व उसी समय महाराष्ट्र के भूगर्भ में मुंबई को तोड़ने की साजिशों को बल मिले, ये अच्छा नहीं है।
अशांत महाराष्ट्र
प्रगतिशील और औद्योगिक रूप से आगे रहा महाराष्ट्र आज अशांत हो गया है। क्या महाराष्ट्र को जातियों और उपजातियों में बांटा गया है? और क्या वह धर्मांधता के राजनीतिक खेल में फंस रहा है? ऐसी स्थिति आज साफ दिख रही है। अज्ञानी और पिछड़ा कहकर उपेक्षित किए गए बहुजन समाज को शाहू महाराज ने चलने और बोलनेवाला बनाया।
समय के साथ संस्थान भूतकाल में चला गया, लेकिन शाहू महाराज का नाम हर घर में हमेशा बरकरार रहा है। अब शाहू महाराज का नाम ये अक्सर क्यों लेते हैं, ऐसा सवाल महाराष्ट्र के नवनिर्माण वालों के मन में उठे और फिर उनके सिर पर फिर से हिंदुत्व का साफा चढ़े तो इस पर हैरानी होती है। यशवंतराव चव्हाण से लेकर बालासाहेब ठाकरे और शरद पवार तक कई नेताओं ने बहुजन समाज को प्रतिष्ठा दिलाने की ही राजनीति की। उसी बहुजन समाज ने महाराष्ट्र के स्वाभिमान की हर लड़ाई में खुद को झोंक दिया। वह बहुजन समाज भी अब सिद्धांतविहीन होकर भटक गया है, ऐसी अवस्था है। यह महाराष्ट्र को कमजोर करने का प्रयास है। स्वतंत्रता संग्राम और मुंबई की लड़ाई में त्याग करने के लिए मुंबई का मेहनतकश अर्थात बहुजन समाज ही उतरा था। मुंबई के मेहनतकश लोग आज कमजोर हो गए और मुंबई की कमान अमीरों के हाथ में चली गई है। अंबानी को पछाड़कर आज अमीरी का ताज गौतम अडानी के सिर पर पहुंच गया है। आज वह दुनिया के पांचवे सबसे अमीर आदमी बन गए हैं। उनके मुकुट में लगे कई पंख मुंबई-महाराष्ट्र के ही हैं। लेकिन इन सबसे महाराष्ट्र को क्या मिला? स्वतंत्रता संग्राम में नेहरू को ‘बंदी’ के रूप में नगर के किले में रखा गया था। नेहरू का एक अलग कमरा था। इस छोटे से कमरे में बैठकर नेहरू ने पूरे हिंदुस्थान की खोज की। ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ नामक ग्रंथ का जन्म इसी कमरे में हुआ था। १५ साल की इंदिरा को नेहरू द्वारा १२ सितंबर, १९३२ को जेल से एक पत्र लिखा गया था। वे कहते हैं, ‘शिवाजी राजा सचमुच मराठों का वैभव बढ़ानेवाले और मुगल साम्राज्य के लिए काल थे।’ लाल किले से बोलते हुए, प्रधानमंत्री मोदी ने औरंगजेब द्वारा किए गए उत्पीड़न का मुद्दा उठाया। नेहरू ने १९३२ में शिवाजी राजा का उल्लेख मुगल साम्राज्य के कर्दनकाल के रूप में संदर्भित किया था, इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। शिवाजी राजे यानी महाराष्ट्र! इसलिए महाराष्ट्र को इसका इतिहास मिला। उस इतिहास पर प्रहार करने का काम शुरू हो गया है। आज के महाराष्ट्र दिवस पर एक मराठी व्यक्ति को कौन-सा संकल्प लेना चाहिए, इसका एक वाक्य में उत्तर देना होगा तो, मुंबई सहित महाराष्ट्र को अखंड रखना चाहिए!

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