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कभी-कभी : मेहनत की हुई कद्र

यू.एस. मिश्रा

अगर इंसान मेहनत और लगन से काम करे तो जिंदगी में क्या कुछ हासिल नहीं कर सकता। बचपन से ही फिल्मों में रुचि रखनेवाले मशहूर संगीतकार को शुरुआती दौर में काफी पापड़ बेलने पड़े थे। लेकिन काफी मशक्कत के बाद जब उन्हें काम मिला तो शर्त रख दी गई कि बिना काम सीखे तनख्वाह नहीं दी जाएगी। लेकिन इसे भाग्य का खेल कहें या संयोग तनख्वाह वाले दिन बी.आर. चोपड़ा की नजर उन पर पड़ गई और…
बचपन से ही फिल्मों का शौक रखनेवाले संगीतकार खय्याम का मन पढ़ाई में बिल्कुल भी नहीं लगता था। उनके घर में सभी उच्च शिक्षित होने के बावजूद खय्याम फिल्मों के शौक के चलते पढ़ाई नहीं कर सके। पांचवीं क्लास में पढ़ रहे खय्याम ने एक दिन अपने घर में रखी अल्लामा इकबाल की किताब में लिखे दो शेरों को पढ़ा- ‘ऐ तायरे लाहुति उस रिज्क से मौत अच्छी, जिस रिज्क से आती हो परवाज में कोताही’ और ‘खुद ही को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है।’ इन शेरों को पढ़ने और उनका मतलब समझने के बाद खय्याम ने ठान लिया कि जिंदगी में मैं चाहे जो कुछ भी करूंगा उसमें मुझे ऊंची उड़ान भरने के साथ ही हर काम बेहद संजीदगी से करना है। खैर, पढ़ाई में रुचि न लेने के कारण जब घरवालों ने उन्हें घर से निकाल दिया तो खय्याम अपने चाचा के पास दिल्ली पहुंच गए। दिल्ली में भी जब उनका मन पढ़ाई में नहीं लगा तो चाचा ने उनसे पूछ ही लिया, ‘बेटा, आखिर तुम करना क्या चाहते हो?’ खय्याम ने कहा, ‘आप मुझे सिनेमा में भर्ती करा दीजिए। मुझे के.एल. सहगल बनना है।’ अब चाचा उन्हें लेकर हुस्नलाल-भगतराम के पास पहुंचे जो पंडित अमरनाथ के भाई थे। उन्होंने उनसे कहा, ‘पंडित जी ये फिल्मों में काम करना चाहते हैं। मेरी कुछ मदद कीजिए।’ अब हुस्नलाल-भगतराम ने कहा, ‘अगर बच्चा एक्टर बनना चाहता है तो इसे पहले संगीत सीखना होगा।’ क्योंकि उन दिनों आर्टिस्ट अपने गाने खुद गाया करते थे। उन्होंने खय्याम से पूछा, ‘संगीत सीखोगे।’ खय्याम ने हामी भर दी। इसके बाद पांच सालों तक दिल्ली में हुस्नलाल-भगतराम और उनके बड़े भाई पंडित अमरनाथ जी से उन्होंने संगीत सीखा। राग-रागिनिया सीख लेने के बाद पंडित जी ने उनसे कहा, ‘बेटा अब तुम अपनी किस्मत आजमाने के लिए लाहौर या मुंबई जाओ क्योंकि वहां फिल्मों का निर्माण होता है।’ अब १५-१६ वर्षीय खय्याम किस्मत आजमाने मुंबई पहुंच गए। मुंबई में काफी धक्के खाने के बाद खय्याम लाहौर चले गए। लाहौर में खय्याम के एक परिचित उन्हें मशहूर संगीतकार जी.ए. चिश्ती के म्यूजिक रूम में लेकर पहुंच गए। वहां चिश्ती बाबा एक पियानो पर धुन बजा रहे थे। कुछ देर बाद उन्होंने अपने साजिंदों से पूछा, ‘अरे भाई, एक म्यूजिकल टुकड़ा गया था, वो क्या था मेरे जेहन से निकल गया।’ अब साजिंदे सारे चुप। साजिंदों को चुप देखकर खय्याम के मुंह से बेसाख्ता निकल गया, ‘जनाब मुझे याद है।’ अब चिश्ती बाबा आवाज की ओर पलटे और किसी अनजान शख्स को इस तरह अपने म्यूजिक रूम में देखकर उन्होंने डांटते हुए पूछा, ‘कौन हो तुम और किसकी इजाजत से अंदर आए।’ खय्याम ने कहा, ‘हम आपसे मिलने आए थे लेकिन आप काम में मशगूल थे इसलिए पूछा नहीं, हमसे ये गलती हो गई।’ चिश्ती बाबा बोले, ‘ठीक है, टुकड़ा याद है तुमको।’ खय्याम ने कहा, ‘हां, सुनाऊं।’ चिश्ती बाबा के हां कहते ही खय्याम ने ऊपरवाले के साथ ही अपने गुरुओं को याद करते हुए वो म्यूजिकल टुकड़ा उन्हें सुना दिया। अब चिश्ती बाबा ने खुश होते हुए खय्याम से कहा, ‘तुम इसी पल से मेरे साथ काम करोगे लेकिन शर्त ये है कि जब तक तुम काम सीख नहीं लोगे तुम्हें तनख्वाह नहीं मिलेगी।’ खैर, बी.आर. चोपड़ा की एक फिल्म शुरू हुई। फिल्म शुरू होने के बाद सेट पर लोगों को तनख्वाह दी गई। सेट पर चिश्ती बाबा के साथ बी.आर. चोपड़ा भी बैठे हुए थे। तनख्वाह बंट जाने के बाद चोपड़ा साहब ने कहा, ‘अरे, इस लड़के को तनख्वाह नहीं मिली।’ चोपड़ा साहब की बात सुनकर चिश्ती बाबा मुस्कुराते हुए बोले, ‘जनाब, अभी ये काम सीख रहा है। जब ये काम सीख जाएगा तब आप इसको भी तनख्वाह दीजिएगा।’ अब बी.आर. चोपड़ा बोले, ‘ये तो बहुत काम करता है। इसको तनख्वाह मिलनी चाहिए।’ चिश्ती बाबा मुस्कुराकर बोले, ‘आप मालिक हैं। अगर आप देना चाहें तो बिल्कुल दीजिए मुझे क्या एतराज हो सकता है।’ अब चोपड़ा साहब ने अपने अर्दली को बुलाया और उसके कान में कुछ बोले। दस-पंद्रह मिनट बाद एक लिफाफा और एक लेटर उसने खय्याम के हाथों में थमा दिया। खय्याम को १२५ रुपए महीना पहली तनख्वाह मिली। उस जमाने में १२५ रुपया हाथों में आने के बाद खय्याम साहब ने महसूस किया कि अपनी लगन और मेहनत के बलबूते एक दिन वो अपना मकाम जरूर हासिल कर लेंगे।

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