विमल मिश्र
नीदरलैंड्स जैसी तगड़ी टीम से वर्ल्ड कप फुटबॉल का मैच ड्रॉ कर जापान की टीम ने करोड़ों दर्शकों की वाहवाही तो कमाई ही थी, खेल देखने आए जापानी दर्शकों ने तो दुनिया का दिल जीत लिया। मैच खत्म होते ही ये दर्शक मैदान और स्टेडियम की सफाई करने लगे और उनकी देखा-देखी अन्य देशों के दर्शक भी कचरा हटाने में हाथ बंटाने लगे। फीफा ने सोशल मीडिया पर इसका विडियो पोस्ट किया तो हर्षित प्रतिक्रियाओं का तांता लग गया।
जापान में कहावत है, ‘तात्सु तोरी अतो वो निगोसाजु’, यानी ‘एक पक्षी जब उड़ता है तो अपने पीछे कुछ नहीं छोड़ता।’ जापान के बच्चों को बचपन से ही यह सीख दी जाती है कि जहां जाओ, अपने पीछे कोई गंदगी न छोड़ो। जापानी दर्शकों ने बस वही काम किया, जो वे अपने देश में करते हैं।
अपनी जापान यात्रा भर हम जुनून की हद तक उनकी यह सफाई पसंदगी देखते रहे। इसकी शुरुआत हमारे जापान की धरती पर पांव रखते पहले ही दिन हो गई थी, जहां कॉफी खत्म करने के बाद अपना खाली कप फेंकने के लिए कोई डस्टबिन ढूंढते हमें चार किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ा। आखिरकार, उसे अपनी जेब में ठूंसे हमें होटल के अपने कमरे के डस्टबिन के हवाले करना पड़ा। वजह, क्योंकि जापान में सार्वजनिक स्थानों पर डस्टबिन होते ही नहीं। यहां की मेट्रो ट्रेनों में और घूमते-फिरते खाना अशिष्टता मानी जाती है, उसी तरह जिस तरह बातें करना।
जापान के लोग सफाई को पूजा से कम नहीं मानते। वे अपने घर, स्कूल, ऑफिस और पैâक्टरी को अपना मंदिर या घर समझते हैं इसलिए निर्मल वातावरण देने के लिए उन्हें बाहर के प्रदूषण से बचाते हैं। वे अपने घरों की, मुहल्लों की और अपने आस-पास की जगह खुद ही साफ करते हैं। स्कूलों में सफाई के लिए कर्मचारी नहीं होते, बच्चे और अध्यापक मिलकर स्वयं सफाई करते हैं। स्कूल से घर लौटकर अपना खाना खाकर, बर्तन धोकर, आस-पास के स्थान को साफ करना बच्चों की दिनचर्या में शामिल होता है। हर बच्चा इसके लिए घर से खास कपड़ा लाता है। अगर आपको जापान के किसी भी घर में जाना पड़े तो पहले जूते उतारिए और फिर बाहर रखे स्लिपर पहनकर प्रवेश कीजिए। जापानी लोग अपने घर में, स्कूल हो या कोई और जगह, बाहर के जूते नहीं लाते। इसका मतलब होता है बाहर की गंदगी अंदर लाना। कक्षा में घुसने से पहले बच्चों को भी बाहर पहनने वाले अपने जूते उतारकर अंदर के लिए अलग से जूते पहनने पड़ते हैं।
ट्रेन में और घूमते खाना मना
सारी सड़कें, गलियां और सार्वजनिक स्थान क्लीनिंग मशीन से ही नहीं, पानी से धोकर भी बिलकुल साफ। सड़कों पर पुराना दोपहिया हो या कार और ट्रक बिलकुल नए -नकोर से दिखते हैं, जैसे अभी सीधे पैâक्टरी से निकलकर बाहर आए हों। कचरा प्रबंधन में इस देश का सानी नहीं। कचरा हो तभी न उसका प्रबंध हो, सो इस देश में सार्वजनिक जगह पर कचरा दिखता ही नहीं। हम पूरे जापान में कहीं कचरे का एक कतरा भी ढूंढ़ते थक गए। रात के धुंधलके में घूमते सड़क पर एक जगह कागज का एक टुकड़ा पड़ा होने का अहसास हुआ था, पर उसे उठाने झुके तो लगा कि वह तो फर्श पर चिपका एक स्टिकर था। घर की अंदरूनी सफाई तो दूर, आपको यहां अच्छे-खासे सूटेड-बूटेड लोग हाथ में झाड़ू-पोंछा, बाल्टी, स्क्रब ब्रश, स्पंज और डस्टपैन लिए घर के बाहर की नाली की सफाई करते दिख जाएंगे। यहां गटर के ढक्कनों तक पर कलाकृतियां बनी हुई हैं, जिन पर उस शहर का नाम अंकित है। मुर्गियां गंदगी न करें इसलिए आप यहां उन्हें भी डाइपर पहने देख लेंगे।
कम जगह और पहाड़ी इलाके अधिक होने के कारण जापान में लैंडफिल का उपयोग बहुत कम करने की मजबूरी है। हर जगह कचरे को बारीकी से अलग करना होता है, जैसे जलने योग्य, न जलने योग्य, प्लास्टिक, कांच और खतरनाक कचरा। हर श्रेणी के कचरे को फेंकने के लिए सप्ताह के दिन और समय तय होते हैं। गलत तरीके से कचरा फेंकने पर भारी जुर्माना लगता है। फर्नीचर या इलेक्ट्रानिक उपकरण जैसे बड़े सामान फेंकने के लिए तो पहले से कूपन खरीदने होते हैं।
यहां की मेट्रो और शिनकानसेन (बुलेट) ट्रेनें शायद दुनिया की सबसे स्वच्छ ट्रेनें हैं। वे जब अपने आखिरी मुकाम पर पहुंचती हैं तो खाली हुई नहीं कि सफाई कर्मचारियों का दल भीतर घुसकर उन्हें सिर्फ सात मिनट में पुन: अगले सफर के लिए तैयार कर देता है। इस रफ्तार और अनुशासन को दुनिया ‘सात मिनट का चमत्कार’ कहती है।
जापान में घुसते ही सबसे पहले साबका पड़ा वह यहां के टॉयलेट सिस्टम ‘वॉशलेट’ (इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल पैनल वाला ईको-प्रâेंडली टॉयलेट सिस्टम) का। अगर आपको कभी जापान आना हो तो टॉयलेट ट्रेनिंग के लिए तैयार होकर आइए। ‘वॉशलेट’ को विशेष बनाने वाला है इसका ऑटोमैटिक स्मार्ट फ्लश, ड्रायर, हीटेड सीट, ऑटोमैटिक सेंसर वाला ढक्कन और गंध नाशक। इसमें अनचाही आवाजों को नकली आवाजों को छिपाने की व्यवस्था ही नहीं है, इसके गुनगुने पानी वाले स्प्रे का प्रेशर और तापमान भी आप बदल सकते हैं। टॉयलेट के टैंक के ऊपर एक छोटा-सा सिंक (नॉन) लगा होता है। धोने पर वही पानी टैंक में जमा हो जाएगा, अगले फ्लश में इस्तेमाल होने के लिए। यह सिस्टम आपको रेलवे स्टेशन, मॉल्स और पार्क व दूसरी जगहों पर बने सार्वजनिक टॉयलेट-हर जगह मिलेगा- पूरी तरह मुफ्त। कुछ जगहों पर बेबी चेयर और कपड़े बदलने या पैर साफ रखने के लिए चेंजिंग बोर्ड की भी व्यवस्था है। कुछ जगह परंपरागत टॉयलेट भी दिखते हैं, जो भारत की याद दिला देते हैं।
(लेखक ‘नवभारत टाइम्स’ के पूर्व नगर संपादक, वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं।)
