मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का : `सेवक अहंकार न करे'

तड़का : `सेवक अहंकार न करे’

कविता श्रीवास्तव

परिवार पर कटाक्ष करते-करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश में ऐसा हल्ला मचाया कि प्रतिक्रिया में उन पर ही टिप्पणियां शुरू हो गईं, तब बचाव में उतरे लोग `मोदी का परिवार’ बताते हुए सक्रिय हुए। विज्ञापनों में, स्टेटस पर और जगह-जगह एकाएक `मोदी का परिवार’ प्रचारित हुआ। चुनाव हुए। परिणाम आए। भाजपा को अपेक्षित सफलता नहीं मिली। सहयोगी दलों की बैसाखी पर सत्ता मिली। अब अकेले का बहुमत नहीं रहा तो सबसे पहले बोलने का अंदाज बदलना पड़ा। `मोदी सरकार’ की जगह `एनडीए की सरकार’ कहने की मजबूरी आई। पहले देश में लोकतंत्र के बहुमत की या किसी पार्टी की सरकार कही जाती थी। लेकिन भाजपा शासन में `मोदी की सरकार’ कहने पर बहुत ज्यादा जोर दिया गया, फिर एक तरह से नाम की ब्रांडिंग की गई। हर चीज को ऐसा बताया गया कि बस वह मोदी ने ही दिया है। किसी सरकारी फंड ने नहीं। किसी योजना ने नहीं। किसी राजकोष ने नहीं। हर चीज मोदी ने दी, फिर हर चीज को मोदी के नाम से बताने पर प्रचार तंत्र पूरी ताकत से लगा रहा। खैर, सत्ता के शीर्ष पर विराजमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए ऐसा करना राजनीतिक उद्देश्य से कोई गलती नहीं है। प्रधानमंत्री बनने पर नरेंद्र मोदी का एक प्रभावी आभामंडल बना है, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। तभी तो हमने सुना `अबकी बार, मोदी सरकार,’ `मोदी है तो मुमकिन है’ फिर आई `मोदी की गारंटी।’ अपने संबोधनों में स्वयं मोदी ने भी अपनी ही आत्मस्तुति का जबर्दस्त अभियान चलाया। हमने पहली बार देश में किसी प्रधानमंत्री को खुद अपने नाम का प्रचार करते, आत्मस्तुति करते और अपने नाम से नारे लगवाते देखा तो सोचने लगी कि भारत के सर्वशक्तिमान व्यक्ति को इतनी आत्मस्तुति क्यों करनी पड़ रही है? फिर ऐसा भी लगा कि कहीं यह लोकप्रियता की व्याकुलता का चरम तो नहीं? कभी प्रश्न उठता था कि जब ऐसा माहौल नहीं रहेगा तो क्या होगा? अब वही दिखने भी लगा है। चुनावी नतीजे आए। भाजपा को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला। वह गठबंधन के सहारे पर मजबूर है। उसने फौरन अपने पैंतरे बदल दिए। `मोदी सरकार’ की जगह `एनडीए सरकार’ बोला जाने लगा है। `मोदी का परिवार’ वाला स्टेटस हटाने की खुद मोदी ने ही अपील कर दी है। अपने आस-पास किसी को न फटकने देने वाले नरेंद्र मोदी ने सबको गले लगाना, पुचकारना शुरू कर दिया। उन्होंने मंचों पर सबके हाथ पकड़ कर अपनापन दिखाने शुरुआत कर दी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आरएसएस ने भी अहंकार पर आपत्ति जताई है। आरएसएस की ओर से विपक्ष को भी मान सम्मान देने की बात कही गई है। विपक्ष को विपक्ष नहीं, बल्कि प्रतिपक्ष कहने को कहा गया है। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी कहा है कि जो मर्यादा का पालन करते हुए काम करता है, गर्व करता है, लेकिन लिप्त नहीं होता, अहंकार नहीं करता है, वही सही अर्थों में सेवक कहलाने का अधिकारी है।

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