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इस्लाम की बात : अध्यात्म का महीना है रमजान

सैयद सलमान
मुंबई

अगले सप्ताह से पवित्र रमजान माह की आमद है। चंद्रमा के हिसाब से २९ या ३० दिनों तक मुस्लिम समाज रोजा यानी उपवास रखेगा। एकेश्वर पर ईमान, नमाज, जकात, हज के साथ पांच फर्ज में से रोजा रखना एक महत्वपूर्ण फर्ज है। रोजा भोर में सूर्योदय से पहले यानी फजर की नमाज से भी पहले शुरू होकर सूर्यास्त यानी मगरिब की नमाज पर समाप्त होता है। इस दौरान कुछ भी खाना-पीना नहीं होता है। रमजान के महीने के दौरान, रोजेदार खूब इबादत करते हैं, पवित्र कुरआन का पाठ करते हैं, जकात देते हैं और ऐसे काम करने की कोशिश करते हैं, जिनसे सवाब यानी पुण्य हासिल हो। कुरआन में कई बार उल्लेख आया है कि रमजान में हर वयस्क पुरुष और महिला के लिए रोजा रखना अनिवार्य है, लेकिन जो लोग बीमार हैं, बहुत बूढ़े हैं, शारीरिक रूप से उपवास करने में असमर्थ हैं, मानसिक रूप से बीमार हैं, बहुत छोटे बच्चे हैं और गर्भवती महिलाएं हैं, उन्हें रोजा न रखने की छूट दी गई है। महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान उपवास न करने की भी अनुमति है। रमजान का सार उपवास, प्रार्थना और व्यक्तिगत विकास के बीच संतुलन बनाने में निहित है। इन प्रथाओं को अपनाकर, मुसलमान परिवर्तन की उस यात्रा पर निकलते हैं, जिससे न केवल उनके स्वयं के जीवन को लाभ होता है, बल्कि उनके आसपास के लोगों के जीवन पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। रमजान आध्यात्मिक चिंतन, आत्म-सुधार, उच्च भक्ति, इबादत और अल्लाह के प्रति समर्पण का महीना है। रमजान में मुसलमानों से अपेक्षा की जाती है कि वे इस्लाम की शिक्षाओं का पालन करने के लिए और अधिक प्रयास करेंगे।
रमजान इस्लामिक वैâलेंडर में सबसे पवित्र महीना माना जाता है, क्योंकि ऐसी धारणा है कि कुरआन की पहली आयत इसी महीने में पैगंबर मोहम्मद साहब पर अवतरित हुई थी। रमजान को नेकियों का ‘मौसम-ए-बहार’ अर्थात ‘बसंत’ कहा गया है। रमजान न केवल मुसलमानों के लिए इबादत का महीना है, बल्कि इसका सामाजिक महत्व भी है और यह सामाजिक सुधार की दिशा में बड़े बदलाव लाने का एक सशक्त उपकरण है। शर्त यह है कि मुसलमान इस बात को समझे कि रमजान सिर्फ भूखे और प्यासे रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह महीना सामाजिक बुराइयों से हमेशा दूर रहने की कोशिश करने और संकल्प लेने का महीना है। दूसरों की तकलीफों का समझना और उनकी मदद करना ही इसका असल मकसद है। इसका मतलब यह है कि रमजान समाज को नैतिक पतन से बचाता है और समाज की बेहतरी में मदद करता है। इस बात को स्वीकार करना होगा कि अनुशासनहीनता जहां समाज के उत्थान में सबसे बड़ी रुकावट है, वहीं रमजान के रोजे लोगों में अनुशासन का गुण पैदा करते हैं और उन्हें अच्छा नागरिक बनने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। हर धर्म में किसी न किसी रूप में उपवास का प्रावधान है। पवित्र माह रमजान में रोजा रखने या किसी भी धर्म में उपवास रखने से गरीबों की भूख-प्यास का अहसास होता है। आध्यात्मिकता से इतर कई अध्ययनों से पता चलता है कि यही रोजा और उपवास लंबे समय तक जीने, अपने वजन को नियंत्रित करने, अपने मूड और एकाग्रता में सुधार करने, अपनी ऊर्जा के स्तर को बढ़ाने और नींद की गुणवत्ता में सुधार करने में मदद कर सकता है। इससे पाचन तंत्र को आराम करने का मौका मिल जाता है और मेटाबॉलिज्म को बढ़ावा मिलता है।
रमजान में रोजा, नमाज, तरावीह की अतिरिक्त नमाज, कुरआन की तिलावत के अलावा दान यानी जकात पर भी काफी जोर दिया जाता है। सालाना आय का २.५ प्रतिशत दान करना जकात कहलाता है। सोने, चांदी, इनके जेवर और तिजारत के माल पर जकात फर्ज है, जिसके पास साढ़े बावन तोला चांदी या साढ़े सात तोला सोना या इतनी रकम हो वह शख्स पूरे साल के अपने माल और आय का हिसाब कर जकात अदा करे। जकात गरीबों के लिए मदद, करुणा और प्रेम की भावना पैदा करता है। यह अहंकार को नियंत्रित करता है। अमीर लोग जरूरतमंदों को खुद से दूर करने के बजाय उनका सम्मान करते हैं। कुरआन ने जकात का पहला हक गरीबों और जरूरतमंदों को ही दिया है। रमजान में अपने पड़ोसियों से बेहतर संबंध बनाने में मदद मिलती है। गैर-मुस्लिम भाइयों के बीच इफ्तार की दावत सौहार्द बढ़ाने में सहायक होती है। सियासी इफ्तार पार्टियों से अलग निजी दावतें ज्यादा कारगर होती हैं। रमजान में किसी के प्रति मन में द्वेष भावना नहीं रखने, गाली-गलौज या वाद-विवाद से दूर रहने की ताकीद की जाती है। यही सब आदतें फिर साल भर की दिनचर्या का हिस्सा बन जाती हैं। रमजान दरअसल इसी आध्यात्मिकता का महीना है जिसकी गहराई में प्रेम, सौहार्द, समानता और मानवता रची-बसी है। ईद-उल-फित्र पर्व को इसी रमजान का इनाम कहा जा सकता है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक हैं। देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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