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फिर आ गया ‘लोकतंत्र का महान उत्सव’

सुषमा गजापुरे

‘लोकतंत्र का उत्सव’ फिर आ गया। इस शब्द का उपयोग अक्सर भारत में जीवंत और विविध चुनावी प्रक्रिया का वर्णन करने के लिए किया जाता है। १९४७ में ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की समृद्ध परंपरा के साथ भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना हुआ है। हालांकि, आजादी के बाद बहुत से विशेषज्ञों का मत था कि भारत में बहुत अधिक समय तक लोकतंत्र रह नहीं पाएगा और ये देश अपने ही विरोधाभासों के तले दब कर रह जाएगा। १९४७ से पूर्व स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने वाले अधिकतर नेताओं ने कई वर्ष जेल में बिताए थे। शासन करने में अनुभव की कमी थी, जिससे भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के बारे में अनिश्चितता बढ़ गई थी। इन चुनौतियों और शंकाओं के बावजूद भारत सात दशकों से अधिक समय से अपने लोकतंत्र को बनाए रखने में कामयाब रहा है। आजादी के बाद से देश में नियमित, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव होते रहे हैं, जिसमें एक पार्टी से दूसरी पार्टी को सत्ता का शांतिपूर्ण हस्तांतरण होता है। पिछले कुछ वर्षों में नागरिक स्वतंत्रता, एक सक्रिय नागरिक समाज, एक स्वतंत्र प्रेस और एक स्वतंत्र न्यायपालिका के विस्तार के साथ, भारत का लोकतंत्र गहरा हुआ है। हालांकि, अभी इन स्वतंत्रताओं पर मोदी सरकार में कई अंकुश भी लगे हैं, पर फिर भी देश का विश्वास इस प्रणाली में रहा है और आगे भी विश्वास है कि ये बना रहेगा।
ये सच है कि भारत ने एक लंबी दूरी तय की है और हम अभी भी गरीबी, असमानता और सामाजिक तनाव से संबंधित चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। हमारा देश भारत अनेक भाषाओं, संस्कृतियों, धर्मों और जातीय समाजों के साथ अविश्वसनीय रूप से विविध है। यह विविधता इसके चुनावों में भी परिलक्षित होती है, जहां विभिन्न पृष्ठभूमि के उम्मीदवार उच्च पद के लिए प्रतिस्पर्धा करते हैं, लेकिन इसके बावजूद १९५० में एक स्वतंत्र गणराज्य बनने पर भारत ने चुनाव के लिए सभी नागरिकों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान किया। इसका मतलब था कि लिंग, जाति, धर्म या सामाजिक-आर्थिक स्थिति की परवाह किए बिना प्रत्येक वयस्क नागरिक को वोट देने का अधिकार दिया गया था। भारत की विविध आबादी और लोकतंत्र के प्रति इसकी प्रतिबद्धता को देखते हुए यह एक महत्वपूर्ण और प्रगतिशील कदम था। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान भारतीय संविधान में निहित था, जिसे २६ जनवरी १९५० को अपनाया गया था। संविधान का अनुच्छेद ३२६ सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का प्रावधान करता है। यह भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला है, जो देश की राजनीतिक प्रक्रियाओं में व्यापक भागीदारी और प्रतिनिधित्व के लिए जिम्मेदार है।
२०२४ का चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इस बात में अब दो राय नहीं है कि मोदी एक सशक्त तानाशाह के रूप में उभरे हैं और भारत को अब कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा चुनकर आए हुए तानाशाह, इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी के रूप में दर्शाया जा रहा है। मोदी ने पिछले १० वर्षों में सारी सत्ता का केंद्रीकरण कर दिया है और देश का हर निर्णय अब उनकी इजाजत के बिना नहीं लिया जा सकता है। उन्हें अब एक अत्यंत निरंकुश शासक के रूप में भी देखा जा रहा है। मोदी को भारत में किसानों के विरोध प्रदर्शनों से क्रूरता से निपटने के लिए आलोचना का सामना भी करना पड़ा है, पर शायद उन पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय दबावों से भी मोदी विचलित नहीं होते हैं और अपनी निरंकुशता के साथ चलते रहते हैं। आलोचकों का मत है कि असहमति के प्रति सरकार की प्रतिक्रिया कठोर रही है। मोदी के नेतृत्व में प्रेस की स्वतंत्रता करीब- करीब खत्म हो चुकी है, जिसके कारण आलोचनात्मक रिपोर्टिंग में पूर्ण कमी आ गई है।
भाजपा के पास इस समय हर वो संसाधन है, जिसके सहारे वो इस चुनाव को हर हालत में जीतना चाहती है, पर भारत की जनता ने हमेशा ये दर्शाया है कि नेता अथवा दल चाहे जितने निरंकुश और संसाधनपूर्ण हो जाएं, वो हर मोड़ पर एक अंतिम निर्णय देती है। १९७७ में हमने देखा वैâसे भारत की जनता ने आपातकाल के विरुद्ध वोट दिया था। अब भारत फिर से उसी मोड़ पर आ खड़ा हुआ है। हालांकि, कुछ स्थितियां अब १९७७ से भिन्न भी हैं, पर आखिरकार जनता ही जनार्दन है।
इंडिया गठबंधन ने खुद को काफी हद तक मजबूत कर लिया है। २०२४ एक रोचक जंग लेकर आया है। सारा विश्व भारत के इस लोकतांत्रिक उत्सव को दिल थाम कर देख रहा है। चुनाव के नतीजे काफी हद तक भारत के आनेवाले वर्षों के भविष्य को तय करेंगे। हालांकि, देश में बढ़ती घृणा, विद्वेष और बिखरता समाज अब एक बड़ा खतरा बन कर उभरे हैं, पर देश को विश्वास है वो इन चुनौतियों से भी पार पा ही लेगा। यही तो भारत के लोकतंत्र की खूबसूरती है कि चुनौती कितनी भी बड़ी क्यों न हो देश के सजग नागरिक अपने मताधिकार द्वारा एक अच्छी सरकार चुनेंगें। हम सब को ४ जून का इंतजार रहेगा जब इस लोकतंत्र के उत्सव के परिणाम आएंगे।

२०२४ का चुनाव कई मायनों में महत्वपूर्ण है। इस बात में अब दो राय नहीं है कि मोदी एक सशक्त तानाशाह के रूप में उभरे हैं और भारत को अब कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं द्वारा चुनकर आए हुए तानाशाह, इलेक्टोरल ऑटोक्रेसी के रूप में दर्शाया जा रहा है। मोदी ने पिछले १० वर्षों में सारी सत्ता का केंद्रीकरण कर दिया है और देश का हर निर्णय अब उनकी इजाजत के बिना नहीं लिया जा सकता है। उन्हें अब एक अत्यंत निरंकुश शासक के रूप में भी देखा जा रहा है। मोदी को भारत में किसानों के विरोध प्रदर्शनों से क्रूरता से निपटने के लिए आलोचना का सामना भी करना पड़ा है, पर शायद उन पर इन बातों का कोई असर नहीं पड़ता है। अंतर्राष्ट्रीय दबावों से भी मोदी विचलित नहीं होते हैं और अपनी निरंकुशता के साथ चलते रहते हैं।

(स्तंभ लेखक आर्थिक और समसामयिक विषयों पर चिंतक और विचारक हैं)

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