मुख्यपृष्ठसमाचारमहान कवि पंडित रामनरेश त्रिपाठी को रास नहीं आया अपना शहर सुल्तानपुर!

महान कवि पंडित रामनरेश त्रिपाठी को रास नहीं आया अपना शहर सुल्तानपुर!

-सुल्तानपुरिया चटर-पटर-२

विक्रम सिंह / सुल्तानपुर

जीवन का लंबा वक्त इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में गुजारने के बाद उत्तरार्द्ध में हिंदी के शीर्षस्थ साहित्यकार व कवि स्व. पंडित रामनरेश त्रिपाठी अपने शहर सुल्तानपुर लौट आए।..लेकिन उन्हें अपना ये शहर रास न आया। खुद भी बड़े कवि व साहित्यकार रहे स्व.त्रिपाठी के ज्येष्ठ पुत्र पंडित आनंद कुमार त्रिपाठी ने ‘काव्य संकलन भाग-१’ की भूमिका में लिखा है कि, यहां उन्हें अनेक प्रकार के कटु अनुभव हुए।

स्व.रामनरेश त्रिपाठी जी को जनपद के उन सरकारी शासकों-त्रासकों तथा वंचकवृत्तिधारी शब्दपतियों से निरंतर संघर्षरत रहकर उनके कोप का भाजन बनना पड़ा। उन्होंने सन १९४४ से १९५२ के बीच अपनी उसी अनुभूति को व्यंगात्मक उक्तियों के जरिये बेबाकी से शब्दों में पिरोया। त्रिपाठी जी इन चुटीली काव्यात्मक उक्तियों को चुपचाप लिखकर प्रचारित कर देते थे। उन्हें वे प्रायः अपना न बताकर अपने किसी मित्र या तत्कालीन जिला पंचायत अध्यक्ष व दिग्गज कांग्रेसी पंडित देवकली दीन के नाम की मुहर लगा देते थे। संभवतः इस आत्मीयता के भाव से कि ‘मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर’!

इसका संकलन उनके मुक्तक काव्य संग्रह ‘चयनिका’ में मिलता है। पेश है सुल्तानपुर को लेकर त्रिपाठी जी के तजुर्बे पर आधारित चंद चुटीली व्यंगोक्तियां…

● त्रेता के उपखान की सुलतापुर है खान।
कालनेमि तो अवतरे, आएंगे हनुमान ।।

● सुलतापुर के भाग्य में बदे चोर ही चोर।
कोई चिट्ठी चोर है कोई धोती चोर ।।

● सुलतापुर में सुख चहै तो काम संभाले तीन ।
चुगली निंदा और खुशामद कहैं देवकली दीन।।

● सुलतापुर की सड़क पर कबहुं न मिलिये धाय।।
ना जाने किस भेष में कब राक्षस मिलि ज़ाय।।

● प्याला भर ही चाय से, हारा घी का टीन ।
पूछो तहसीलदार से कहैं देवकली दीन ।।

● सुलतापुर मा भा सम्मेलन, जुटे बहुत कबिराई ।
श्रेय मिला गोपाल चन्द्र को, चटनी पीसेसि माई।।

● कविता मा हम सुनत रहिनि चंदा चकोर चंदा चकोर।
सम्मेलन मा इहवाँ देखा चंदा बटोर बटोर।।

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