राजन पारकर
आषाढ़ी एकादशी पर जब प्रशासन ने घोषणा की कि वीआईपी दर्शन पूरी तरह बंद रहेंगे, तब श्रद्धालुओं ने समझा कि इस बार विठ्ठल के दरबार में सब बराबर होंगे। लेकिन पहले ही दिन व्यवस्था की ऐसी पोल खुली कि लगता है आदेश केवल कागज के लिए था, जमीन पर नहीं। चर्चा है कि एक मंत्री के साथ आए लोगों को बिना रोक-टोक दर्शन मिल गए, जबकि पूर्व मंत्री और उनके परिवार को प्रतीक्षा करनी पड़ी। यदि यह सही है तो सवाल केवल किसी एक नेता का नहीं, बल्कि प्रशासन की निष्पक्षता का है। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि सत्ता में बैठे लोगों के लिए नियम अलग और बाकी लोगों के लिए अलग दिखाई देते हैं। आखिर यदि वीआईपी दर्शन बंद थे तो फिर कुछ लोगों के लिए दरवाजे वैâसे खुल गए? और यदि खुले, तो आदेश किसके लिए था? आचार्य अत्रे होते तो शायद लिखते विठ्ठल आज भी पत्थर के हैं, लेकिन उनके दरबार के पहरेदार सत्ता देखकर पिघल जाते हैं। सूत्रों के अनुसार, इस घटना से सरकार के भीतर भी असहजता है और कुछ वरिष्ठ नेता प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं।
विठ्ठल के दरबार से लेकर सत्ता के गलियारों तक
राजनीति में संयोग कम और संकेत अधिक होते हैं। पंढरपुर में वीआईपी दर्शन पर उठे सवाल हों, मौसम विभाग की चेतावनी के बीच प्रशासन की तैयारी हो या फिर वरिष्ठ नेता सुधीर मुनगंटीवार का ‘देव की इच्छा से मंत्रिमंडल से बाहर हूं’ वाला बयान-तीनों घटनाएं सत्ता के भीतर चल रही हलचलों की ओर इशारा करती हैं। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि सरकार के भीतर सब कुछ उतना सहज नहीं जितना मंचों से दिखाई देता है। सूत्रों के अनुसार, आने वाले दिनों में कई राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं और कुछ कुर्सियों पर भी सवाल उठ सकते हैं।
बादलों की चेतावनी या प्रशासन की परीक्षा?
मौसम विभाग ने तेरह जिलों में भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। यह खबर नई नहीं है। नई बात तब होगी जब पहली बारिश में सड़कें नदी न बनें, पुल बंद न हों और नागरिकों को नाव ढूंढनी न पड़े। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि हर वर्ष करोड़ों रुपए नालों की सफाई, जलनिकासी और आपदा प्रबंधन पर खर्च होते हैं, लेकिन पहली तेज बारिश आते ही सारी योजनाएं बह जाती हैं। सूत्रों के अनुसार, मंत्रालय में भी कई विभागों की तैयारियों की समीक्षा हो रही है। यदि हालात बिगड़े तो कुछ अधिकारियों की कुर्सी भी हिल सकती है। विडंबना देखिए, बारिश आने से पहले प्रेस कॉन्प्रâेंस होती है, बारिश आते ही कंट्रोल रूम खुलते हैं और बारिश जाने के बाद जांच समिति बैठती है। जनता हर साल भीगती है, लेकिन जवाबदेही कभी नहीं भीगती।
देव की इच्छा से मैं मंत्री नहीं हूं
सुधीर मुनगंटीवार का यह कहना कि ‘देव की इच्छा से मैं मंत्रिमंडल से बाहर हूं, राजनीतिक हलकों में कई सवाल छोड़ गया है। सूत्रों के अनुसार, भाजपा के भीतर आने वाले समय में संगठन और सरकार दोनों स्तरों पर बदलाव की चर्चा तेज है। मुनगंटीवार जैसे वरिष्ठ नेता का यह बयान केवल आध्यात्मिक विनम्रता है या राजनीतिक संदेश—इस पर अलग-अलग व्याख्याएं हो रही हैं। राजनीतिक गलियारों में कानाफूसी है कि महाराष्ट्र की सत्ता में अभी कई समीकरण पूरी तरह स्थिर नहीं हैं। कुछ चेहरे असंतुष्ट बताए जा रहे हैं, तो कुछ नए चेहरों को आगे लाने की रणनीति पर भी चर्चा है। यदि कोई नेता सार्वजनिक मंच से ‘देव की इच्छा’ का सहारा ले रहा है, तो राजनीति के जानकार उसके पीछे ‘दिल की पीड़ा’ भी पढ़ने की कोशिश करते हैं, क्योंकि सत्ता में मौन भी कई बार सबसे बड़ा बयान होता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह है कि कानून सबके लिए समान होना चाहिए। मंदिर हो या मंत्रालय, प्रशासन हो या राजनीति-नियमों का पालन बिना भेदभाव के होना चाहिए। मौसम की चेतावनी हो या राजनीतिक संकेत, दोनों का समय रहते गंभीरता से लिया जाना आवश्यक है।
