-पालघर के डहाणू में विकास के दावों की खुली पोल
-सड़क-पुलिया के अभाव में घायल युवक को
-एक किलोमीटर तक कंधों पर ढोना पड़ा
सामना संवाददाता / मुंबई
पालघर जिले के डहाणू तालुका के रायतली-चांदवड (डोंगरीपाडा) से सामने आई घटना ने सरकार के ‘आदर्श आदिवासी गांव’ के दावों की सच्चाई उजागर कर दी है। कागजों पर विकास के बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, लेकिन हकीकत यह है कि आज भी यहां गंभीर रूप से घायल मरीज को अस्पताल पहुंचाने के लिए ग्रामीणों को डोली का सहारा लेना पड़ रहा है। सड़क और पुलिया के अभाव में एंबुलेंस बस्ती तक नहीं पहुंच सकी, जिसके कारण ग्रामीणों ने कपड़े और लकड़ी से अस्थायी डोली तैयार कर युवक को करीब एक किलोमीटर तक कंधों पर उठाकर मुख्य सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद ही उसे इलाज के लिए अस्पताल भेजा जा सका।
बारिश शुरू होते ही डोंगरीपाडा का संपर्क लगभग पूरी तरह कट जाता है। कच्चे रास्ते कीचड़ और पानी में डूब जाते हैं, जिससे मरीजों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों को जान जोखिम में डालकर पैदल बाहर लाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या वर्षों पुरानी है, लेकिन जिम्मेदार विभागों ने आज तक इसका स्थायी समाधान नहीं किया।
विडंबना यह है कि गंजाड-रायतली-घोलवड क्षेत्र को आदिवासी विकास विभाग ने ‘आदर्श आदिवासी गांव’ घोषित कर रखा है। मई २०२६ में राज्यपाल कार्यालय के अधिकारियों ने भी क्षेत्र का दौरा कर विकास कार्यों की योजना तैयार करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद धरातल पर हालात जस के तस हैं। सरकारी घोषणाएं और दौरे केवल फाइलों तक सीमित रह गए हैं, जबकि ग्रामीण आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
ग्रामीणों ने प्रशासन पर गंभीर लापरवाही का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि यह पहली घटना नहीं है। पिछले कई वर्षों में अनेक मरीजों को इसी तरह डोली में अस्पताल ले जाना पड़ा और समय पर इलाज नहीं मिलने से कई लोगों की जान भी जा चुकी है। बावजूद इसके सड़क और पुलिया निर्माण की दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया।
१० से अधिक शिकायतें… फिर भी सिर्फ आश्वासन
ग्रामीणों के अनुसार सड़क और पुलिया निर्माण की मांग को लेकर ग्राम पंचायत तथा संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को १० से अधिक बार लिखित शिकायतें और निवेदन सौंपे जा चुके हैं। हर बार केवल आश्वासन मिला, लेकिन काम शुरू नहीं हुआ। नतीजतन, हर बारिश में पूरा इलाका बाकी दुनिया से कट जाता है और मरीजों के लिए डोली ही एकमात्र सहारा बन जाती है। पालघर जिला गठन के १२ वर्ष पूरे होने से पहले सामने आई यह घटना विकास के सरकारी दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है। ग्रामीणों ने मांग की है कि सड़क, पुलिया और स्वास्थ्य सुविधाओं का निर्माण युद्धस्तर पर पूरा किया जाए, ताकि भविष्य में किसी भी मरीज को इलाज के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर डोली का सहारा न लेना पड़े।
