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तड़का :  हरित क्रांति ला सकते हैं हम!.. जनभागीदारी की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका

कविता श्रीवास्तव

जलवायु परिवर्तन आज पूरी दुनिया के सामने बड़ी चुनौती है। बढ़ता तापमान, अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और प्रदूषण मानव जीवन के साथ-साथ प्रकृति के लिए भी खतरा है। ऐसे समय में पुणे के भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान का वैज्ञानिक अध्ययन कुछ उम्मीद लेकर आया है। इस अध्ययन के अनुसार, वर्ष २१०० तक भारत की वनस्पति पहले की तुलना में कहीं अधिक हरी-भरी हो सकती है और वायुमंडल से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की क्षमता भी दोगुनी हो सकती है।
शोध वैज्ञानिकों ने १९८५ से २०१४ तक के आंकड़ों का विश्लेषण कर आधुनिक जलवायु मॉडल के आधार पर अनुमान लगाया है कि इस शताब्दी के अंत तक भारत के जंगल, कृषि क्षेत्र और प्राकृतिक वनस्पतियां जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में पहले से अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। इंडो-गंगा का मैदान, पूर्वोत्तर भारत और पश्चिमी घाट जैसे क्षेत्रों में हरियाली तेजी से बढ़ने की संभावना है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल प्रकृति के भरोसे भारत हरित बन जाएगा? नहीं। वैज्ञानिक अध्ययन केवल संभावनाएं बताता है, उन्हें वास्तविकता में बदलना हमारे प्रयासों पर निर्भर करेगा। भारत सदियों से कृषि प्रधान देश रहा है। यहां की संस्कृति, अर्थव्यवस्था और ग्रामीण जीवन खेती तथा प्रकृति से जुड़े रहे हैं। कभी गांवों के चारों ओर घने पेड़, तालाब, नदियां और उपजाऊ खेत हमारी पहचान थे। लेकिन तेजी से बढ़ते शहरीकरण, अंधाधुंध औद्योगीकरण, वनों की कटाई, रासायनिक खेती, जल स्रोतों के दोहन और प्रदूषण ने इस प्राकृतिक संतुलन को कमजोर कर दिया है।

नदियां प्रदूषित हैं। भूजल का स्तर लगातार गिर रहा है। मिट्टी की उर्वरता कम हो रही है। शहरों की हवा सांस लेने लायक नहीं बची है। यही आज की बड़ी पर्यावरणीय चुनौती है। यदि हमें सचमुच २१०० तक हरित भारत का सपना साकार करना है तो इसके लिए जनभागीदारी सबसे महत्वपूर्ण होगी। आज बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण, प्राकृतिक वनों का संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदियों और तालाबों का पुनर्जीवन, जैविक एवं प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना जरुरी है। रासायनिक उर्वरकों का सीमित उपयोग, स्वच्छ ऊर्जा को अपनाना और प्लास्टिक प्रदूषण पर नियंत्रण जैसे कदम उठाने होंगे। किसानों को जलवायु-अनुकूल कृषि तकनीकों से जोड़ना और युवाओं को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करना भी आवश्यक है। बढ़ती हरियाली का अर्थ यह नहीं कि जलवायु संकट समाप्त होगा। तापमान वृद्धि, खराब मौसम, बाढ़ और सूखे जैसी चुनौतियां बनी रहेंगी। इसलिए कार्बन उत्सर्जन में कमी और सतत विकास की नीति पर लगातार काम करना होगा।
भारत के पास प्राकृतिक संसाधनों की अमूल्य विरासत
भारत के पास प्राकृतिक संसाधनों, जैव विविधता और कृषि परंपरा की अमूल्य विरासत है। यदि आज का विज्ञान, सरकार और समाज मिलकर पर्यावरण संरक्षण को जनआंदोलन बना दें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया के लिए हरित विकास का आदर्श मॉडल भी बन सकता है। हर नागरिक पेड़ लगाने, जल बचाने और प्रकृति की रक्षा का संकल्प ले, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित और समृद्ध भारत बन सकता है।

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