-‘सफाई’ के नाम पर कहीं लोकतंत्र के असली वोटर तो साफ नहीं हो गए?
सामना संवाददाता / मुंबई
मुंबई के ३६ लाख मतदाताओं के नाम कम होने का मामला इन दिनों राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के तहत ३१ अगस्त को जारी प्रारूप मतदाता सूची में मुंबई के मतदाताओं की संख्या पिछली सूची की तुलना में काफी कम दिखाई दी है। महाराष्ट्र की प्रारूप सूची में भी करीब २.०६ करोड़ नामों की कमी दर्ज की गई है। यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है। आखिर मुंबई के ३६ लाख मतदाता गए कहां?
यह लोकतंत्र के लिहाज से सवाल छोटा नहीं है। जब एक ही प्रक्रिया में इतनी बड़ी संख्या में नाम कम दिखाई दें तो यह जानना जरूरी है कि इनमें कितने मृत, स्थानांतरित, डुप्लीकेट या वास्तव में मौजूद मतदाता हैं।
३० सितंबर तक मौका, ४ नवंबर को असली तस्वीर
नाम छूटने वाले मतदाताओं के लिए दावे और आपत्तियां दाखिल करने की प्रक्रिया जारी है। मुंबई में ३० सितंबर तक दावा-आपत्ति का अवसर है, जबकि अंतिम मतदाता सूची ४ नवंबर २०२६ को प्रकाशित होनी है। मतदाता सूची में सफाई होनी चाहिए, लेकिन लोकतंत्र की सफाई नहीं। मुंबई के ३६ लाख नामों का सवाल आखिरकार सिर्फ चुनाव आयोग का प्रशासनिक विषय नहीं है।
मुंबई जैसे शहर में ‘स्थानांतरित’ की जांच कितनी सही?
मुंबई की आबादी का एक बड़ा हिस्सा किराये के मकानों में रहता है। नौकरी, कारोबार और रोजी-रोटी के लिए लोग एक इलाके से दूसरे इलाके में जाते रहते हैं। ऐसे में किसी मतदाता का पुराने पते पर न मिलना यह साबित नहीं करता कि वह मुंबई से चला गया है या उसका मतदान अधिकार खत्म हो गया है। यही वह बिंदु है, जहां एसआईआर की प्रक्रिया की पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। अगर किसी मतदाता का नाम इसलिए हट गया क्योंकि सत्यापन के दौरान वह अपने पते पर नहीं मिला, तो सवाल उठेगा कि क्या उसके दूसरे दस्तावेजों और वर्तमान पते का पर्याप्त सत्यापन किया गया? मतदाता सूची की सफाई जरूरी है। मृत लोगों, डुप्लीकेट नामों और वास्तव में स्थानांतरित मतदाताओं को हटाना चुनावी प्रक्रिया को मजबूत करता है।
वोटर को अपना वोट बचाने के लिए क्यों दौड़ना पड़े?
सबसे बड़ा सवाल यही है। किसी नागरिक ने वर्षों पहले मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराया। वह चुनावों में मतदान करता रहा। अचानक प्रारूप सूची में उसका नाम नहीं दिखता है। अब उसे दावा दाखिल करके यह साबित करना होगा कि वह वोट देने का अधिकार रखता है। लोकतंत्र में मतदाता को यह भरोसा होना चाहिए कि उसका नाम बिना पर्याप्त कारण नहीं हटेगा। मुंबई में प्रशासन और राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी भी यहां बढ़ जाती है। प्रशासन को बूथ स्तर तक यह स्पष्ट जानकारी देनी होगी कि कितने नाम किस कारण से हटे। राजनीतिक दलों को भी सिर्फ आरोप लगाने के बजाय अपने कार्यकर्ताओं के माध्यम से वास्तविक मतदाताओं के नाम जांचने और दावे दाखिल कराने में मदद करनी चाहिए।
