बर्धा के मुंह पर खोंचा बांध झूलन ददा खेत की जोताई में जा लगे थे। उंकुरू बैठ दादी पीछे-पीछे चीखुर बीन रहीं थी। घाम उम्मीद बन कर आंखों में चमक जा रही थी पर देर तक टिक नहीं पा रही थी। ठंढ से दांत कांप जा रहे थे। ओस के प्रकोप से पांव में मिट्टी सन गई थी। चरी, जोन्हरी, उतेर जैसे खेती के जड़ों और घासों के साथ से चीखुर खूब-खूब मात्रा में प्राप्त हो जाती थी जिसे बीनते समय तो मन गुस्से से भर उठता था पर शीत की कंपकंपाती शाम को सुकून पहुंचाने का कारण भी चीखुर ही हुआ करता था। जोताई के बाद आलू लगाने के लिए गांव भर से करीब दस लोग इकट्ठे हो गये थे जिसमें लोलारख, नरेश, कतवारू सहित कुछ बच्चे भी शामिल थे। कोई कुदार से खींना खींचता तो कोई उसमें आधी कटी आलू रखता तो कोई मेड़ी चढ़ाने को उत्सुक नजर आ रहा था। सबसे सुघ्घर मेड़ी बांधने में तो ददा ही माहिर थे पर लोगों के मिल जाने से जल्दी ही पूरी आलू लगा दी गई थी हां ये बात अलग थी कि पूरे खेत में लगभग तीन तरीके से मेड़ी दिख रही थी जहां ददा द्वारा बनाई मेड़ी अलग ही नजर आ रही थी। आलू लगने के बाद गुड़ और पानी पीकर सभी अपने अपने घर चले गये थे। परसो लोलारख के खेत में भी आलू लगना है ददा को भी वहां जाना पड़ेगा कारण ये हूंड़ा फेरना ही था जिसकी वजह से एक दूसरे की सहायता के चलते पूरे गांव वालों की खेती आसानी से हो जाती थी।
महीनों पहले से लोग अपने खेतों में घूर पर इकट्ठा किए गए गोबर की खाद डालते आ रहे थे। रोज सबेरे दस बीस झउआ खाद खेत में पहुंचाने के बाद ही कोई दूसरा काम होता था। आज आलू लगने के बाद दादी के खुशी का ठिकाना नहीं था कारण आलू लग जाना मतलब बहुत बड़ा कार्य संपन्न होना माना जाता था।
गड़ही किनारे गजहरी में छुप्पन-छुपाई खेलने के बाद अन्हियारे लाग लेड़ियहवा के डर से लड़िकन के मंडली अपने-अपने घर पहुंचकर बथुआ के साग, बजड़ी के रोटी और भात खाकर रजाई में लुका गई थी। ददा अभी-अभी आलू के खेत में पानी देकर ओसारे में आ गये थे। दादी कउड़ा बार कर ताप रहीं थीं बगल अंगीठी में दूध पक रहा था। बिल्ली कोने में दुबक कर टुकुर-टुकुर ताक रही थी, रोज ताकती थी पर दूध नहीं पाती थी। छान्हीं में लटकी लालटेन जुगुर-जुगुर जर रही थी। कउड़ा में ही आलू डाल कर चोखा बना कर चूल्हे पर चार मोटी रोटी सेंक कर दादी ददा को वही खिलाने वाली थी।
‘बूढ़ा, भंइसिया लाग कि नाइ’ ददा बोले।
‘हां हां लग गइ’
‘तऽ चलऽ, लालटेन देखाव बांधि दिहा जाइ’
आगे-आगे ददा पीछे से दादी लालटेन और बांस लिए भैंस बांधने पहुंच गये थे। भैंस बांधने के बाद ददा ने देखा वहां तो बहुत ही गीला था, पैर धंस रहा था। घूरे से राखी लाकर डाल दिए थे ददा। बांस का बेंड़ा मोहारे में लगा कर दोनों वापस आ गये थे। हांथ-पांव धुलकर दोनों आराम से कउड़ा तापने बैठ गये थे।
‘आज अगर पतोहिया रही होत् तऽ केतना बढ़िया होत्, कब से कहथई कि आनि लियावऽ लेकिन पता नाइ कवने मोह में फंसा बाट्य। एतना परेशानी झेलत हयऽ’- दादी बोली।
‘का करी, गऽ तऽ रहे लेकिन ओकर माई मंत्तइ नाइ बाऽ। कहत रही भंइस बियान बाऽ दूध घियु अघाइ के खाइ लेये त जाए। हमहूं मानि गए। आखिर आपन भंइसिया त गिनि के पाउ भर देत बा ओतने में काउ खाये बेचारी, अउर फेरि का ओकर माई तोंहसे एक्कउ इंच कम बा का। आखिर में बतिया तऽ मनहिन के पड़े। हम मानि गए का करीऽ’।
दादी जोर-जोर से हंसने लगीं इतना जोर से हंसी कि उनके हंसी के आगे दूर से आती लोहखरी की आवाज जैसे कहीं हेरा सी गई। बिल्ली डर के मारे बाहर भाग गई। शेरुआ कान खड़ा करके बात की गंभीरता को भांपने लगा।
पंकज तिवारी
(लेखक बखार कला पत्रिका के संपादक एवं
कवि, चित्रकार, कला समीक्षक हैं)
