मुख्यपृष्ठग्लैमर‘कल क्या होगा किसने देखा है!’ - गुलजार

‘कल क्या होगा किसने देखा है!’ – गुलजार

मशहूर लेखक, गीतकार, कहानीकार, पटकथाकार और निर्देशक गुलजार उन शख्सियतों में से एक हैं जो मल्टी टैलेंटेड हैं। हमेशा सफेद कुर्ते और पायजामे में नजर आनेवाले गुलजार साहब को हाल ही में वर्ष २०२३ के लिए ‘ज्ञानपीठ’ पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हो चुकी है। उम्र के ८९ पायदान पर पहुंच चुके गुलजार ने अपने ६० वर्ष के करियर में अपने गीतों के जरिए नई और पुरानी दोनों ही पीढ़ियों को बांध रखा है। पेश है, गुलजार से पूजा सामंत की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

 ‘ज्ञानपीठ’ पुरस्कार मिलने पर आप कैसा महसूस कर रहे हैं?
‘ज्ञानपीठ’ पुरस्कारों की चयन टीम में जितने भी मेंबर हैं मैं उन सभी का आदर करता हूं और शुक्रिया कहना चाहता हूं। उन्होंने मेरा चुनाव किया, जिससे मैं बहुत अभिभूत हूं। मैं ५०-६० वर्षों से लिखता चला आ रहा हूं। साहित्य के प्रति मेरा पैशन, मोह-माया ही मेरा अटैचमेंट है। काफी समय से मैं फिल्मी गीत लिख रहा हूं। लोगों ने मेरी कविताओं को नोटिस नहीं किया, मेरी यह सोच गलत थी। ज्ञानपीठ की घोषणा के बाद ये बात मेरी समझ में आई। मेरे जन्मदिन पर जितने मैसेजेस मुझे नहीं आते उससे कहीं अधिक मैसेजेस ज्ञानपीठ की घोषणा के बाद आ रहे हैं। इसे देखकर मैं बेहद भावुक हुआ हूं।

 ‘आपने साहित्य और फिल्मों का संतुलन कैसे बनाए रखा?
मैं फिल्मों में अपना करियर कभी नहीं बनाना चाहता था। किताबें, कविता, साहित्य में मेरा रुझान बचपन से ही था। साहित्य और फिल्मों का संतुलन मैंने जान-बूझकर या सोच-समझकर नहीं बनाया, बल्कि वो तो अपने आप बनता चला गया। जिंदगी में स्टेबिलिटी फिल्मों के योगदान से मिली। साहित्य और कविता का पैशन हमेशा मेरे साथ रहा इसलिए मैंने कम फिल्में कीं और मेरा पढ़ना-लिखना जारी रहा।

 ‘साहित्य में आपका रुझान वैâसे पैदा हुआ? खासकर हिंदी के साथ उर्दू और बांग्ला साहित्य पर भी आपकी कमांड है?
प्री इंडिपेंडेंस के दौर में मेरा जन्म पाकिस्तान में हुआ। हमारे घर पर मेरे पिताजी के कई दोस्त आते थे। उनकी बातचीत मेरे कानों में पड़ना स्वाभाविक बात थी। वे लोग आपस में सामाजिक सरोकार, साहित्य, कविता-कहानियों पर गहरी बातचीत करते थे। उनकी गपशप में कहावतें, मुहावरें, कोट्स आदि सब कॉन्शियसली मुझ तक आती रहीं। पिताजी के उन दोस्तों के प्रति मेरे मन में आदर की भावना निर्माण होती गई। मैं दिग्गज लेखकों का साहित्य पढ़ता गया और उनकी साहित्य कृतियों ने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला।

 ‘फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े रहने से क्या आपको नहीं लगा कि आप साहित्य से दूर हो जाएंगे?
साहित्य मेरा पैशन और मेरी रूह है। फिल्मों के लिए लिखने से मुझे आर्थिक स्थिरता मिली। मेरा नाम हुआ और मुझे पैसे मिले। मुझे फिल्मों से जुड़े रहने का मलाल नहीं, लेकिन साहित्य की चाहत मेरे दिल में हमेशा बरकरार रही। मैं कविताओं सहित और भी काम करता रहा। बस, दिल में यह टीस थी कि क्या मेरे साहित्य का योगदान अभी लोगों तक अज्ञात रहा है? क्या लोग मुझे सिर्फ फिल्म के योगदान के लिए जानते हैं? लेकिन ‘ज्ञानपीठ’ की घोषणा से यह गलतफहमी दूर हुई।

 ‘आज के दौर की फिल्मों में क्या आप साहित्य देख पाते हैं?
देखिए, हर फिल्म साहित्यिक मूल्यों से लबरेज नहीं हो सकती। मेघना की फिल्म ‘छपाक’ में कोई साहित्य नहीं था लेकिन जो उसने महसूस किया उसे स्क्रीन पर दिखाया। राकेश मेहरा की फिल्म भी रिलेवेंट होती है। विशाल भारद्वाज ने शेक्सपियर की रचनाओं पर ट्रायोलॉजी बनाई, यह भी साहित्यिक रचना थी। विशाल भी नए पीढ़ी के सर्जक हैं। पिछली पीढ़ी के श्याम बेनेगल की फिल्में साहित्य और समांतर सिनेमा का अनोखा मेल रही हैं। हर पीढ़ी का मेकर अपनी अभिव्यक्ति अनुसार फिल्म बनाएगा। कभी पुरानी पीढ़ी का हमने हाथ थामा था, अब आगे बढ़ने के लिए हमें नई पीढ़ी का हाथ थामना होगा।

 ‘आपके लिए पीढ़ी दर पीढ़ी रिलेवेंट रहना कैसे संभव हुआ?
मैं हर पीढ़ी से जुड़ा रहा। मैं बच्चों के साथ बहुत जल्दी घुल-मिल जाता हूं। मेरा पोता इस समय बास्केट बॉल वैâप्टन है। मैं उसके मैचेस देखने जाता हूं और उसके दोस्तों से खूब गप्पे लड़ाता हूं। विशाल भारद्वाज से मेरी गहरी दोस्ती है। सीखने की कोई उम्र नहीं होती। मैं सीखता ही चला जा रहा हूं।

 ‘इन दिनों आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की काफी चर्चा हो रही है। क्या आपको लगता है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के साहित्य में आने से साहित्य की ओरिजिनलिटी कम या खत्म हो जाएगी?
जमाना पल-पल बदल रहा है। पता नहीं कब क्या बदलाव आ जाए। मेरे लिए इस मुद्दे पर बात करना संभव नहीं। वक्त के साथ चलिए, मैं इतना ही जानता हूं। कल क्या होगा किसने देखा है?

 

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