-कर्मचारियों की भी है कमी तो खराब हो चुके हैं उपकरण
धीरेंद्र उपाध्याय
मुंबई के कुर्ला इलाके में स्थित भाभा अस्पताल अपनी बदहाल व्यवस्था और चरमराई स्वास्थ्य सेवाओं के कारण बीमार होता जा रहा है। मनपा के ३३६ बेड वाले इस अस्पताल में फिलहाल केवल २७० बेड ही कार्यान्वित हैं। दवाओं की किल्लत, एक्स-रे व अन्य जरूरी उपकरणों का खराब होना, पर्याप्त मेडिकल स्टाफ की कमी और बदहाल साफ-सफाई जैसी समस्याओं के चलते यहां इलाज करवाना मरीजों के लिए किसी जद्दोजहद से कम नहीं है। हालत यह है कि मरीजों को न सिर्फ जरूरी जांचों के लिए दूसरे अस्पतालों में भेजा जा रहा है, बल्कि जीवनरक्षक दवाएं भी उन्हें बाहर से खरीदनी पड़ रही हैं। अस्पताल की ओपीडी में रोजाना १,७०० से २,००० मरीज इलाज के लिए आते हैं, लेकिन सुविधाएं और व्यवस्था नाम मात्र की रह गई है।
मुंबई मनपा द्वारा संचालित भाभा अस्पताल में इलाज के लिए आनेवाले गरीब और मध्यमवर्गीय मरीजों को दवाओं की अनुपलब्धता से सबसे बड़ी मार झेलनी पड़ रही है। मरीजों को अस्पताल परिसर में मौजूद फॉर्मेसी काउंटरों से जीवनरक्षक दवाएं तक नहीं मिलतीं। पूर्व नगरसेविका और मनपा स्वास्थ्य समिति की सदस्य रह चुकी दिलशाद अशरफ आजमी ने आरोप लगाया कि अस्पताल में पिछले डेढ़ साल से दवाओं की सप्लाई बेहद अनियमित है। अस्पताल प्रशासन हर बार स्पॉट कोटेशन के जरिए २५ लाख रुपए की दवाइयां मंगवाने का नाटक करता है, लेकिन कोई स्थाई व्यवस्था नहीं की जाती। नतीजतन, मरीजों को जेब से पैसे खर्च कर बाहर से दवा लेनी पड़ती है। स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता अकील खातिक ने भी भाभा अस्पताल में गहराते भ्रष्टाचार और लापरवाही पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक इतने बड़े अस्पताल में चार फॉर्मेसी काउंटर हैं। लेकिन काम के समय सिर्फ एक ही चालू रहता है। शाम के बाद तो अक्सर सभी काउंटर बंद हो जाते हैं।
खराब मशीनें, न के बराबर स्टाफ
भाभा अस्पताल की हालत तकनीकी स्तर पर भी बेहद चिंताजनक है। एक्स-रे मशीन हो या सोनोग्राफी कई अहम उपकरण अक्सर खराब रहते हैं। हाल ही में एक्स-रे यूनिट चार दिन तक ठप रही, जिससे सैकड़ों मरीजों को मजबूरी में घाटकोपर, सायन या राजावाड़ी अस्पताल का रुख करना पड़ा। कई मामलों में मरीजों को निजी लैब में महंगी दरों पर जांच करवाने के लिए मजबूर होना पड़ा। अस्पताल में स्टाफ की भी जबरदस्त कमी है। नर्सों की संख्या जरूरत से आधी है। टेक्नीशियन और वार्ड बॉय की भी भारी किल्लत है। डॉक्टरों पर दबाव इतना अधिक है कि ओपीडी में एक-एक डॉक्टर को रोजाना ३०० से ज्यादा मरीज देखने पड़ते हैं। इससे न सिर्फ इलाज की गुणवत्ता प्रभावित हो रही है, बल्कि मरीजों को घंटों कतार में खड़ा रहना पड़ता है। अस्पताल प्रशासन के अनुसार, यहां कुल ९६ डॉक्टर कार्यरत हैं, जिनमें से १२ स्थाई और ८४ संविदा पर हैं। फिर भी मरीजों को कई विभागों में लंबा इंतजार करना पड़ता है।
आपना चिकित्सा केंद्र बंद होने से और बढ़ा बोझ
बताया गया है कि अपना चिकित्सा केंद्र बंद हो जाने से भाभा अस्पताल पर दबाव और बढ़ गया है। कई बार खून की जांच के लिए भी दो से पांच दिन का इंतजार करना पड़ता है। फिलहाल, अस्पताल का नवीनीकरण हो रहा है और कई जगहों पर निर्माण का मलबा पैâला हुआ है। वरिष्ठ अधिकारियों के दौरे से पहले परिसर को साफ किया जाता है।
गंदगी, बदबू और संक्रमण का खतरा
अस्पताल परिसर में गंदगी आम बात हो गई है। वार्डों में शौचालयों से बदबू आती है। कई जगहों पर कचरे के ढेर लगे रहते हैं और मच्छरों की भरमार के चलते डेंगू व मलेरिया जैसे संक्रमणों का खतरा बना रहता है। मरीज और उनके परिजन न तो स्वच्छ पानी पा रहे हैं, न ही बुनियादी स्वच्छता ही है। कई वार्डों में सैनेटाइजर और साबुन तक उपलब्ध नहीं है। इसे लेकर बार-बार मनपा प्रशासन से शिकायतें की गईं, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। लोगों का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन और मनपा अधिकारियों के बीच मिलीभगत के कारण समस्याएं जानबूझकर नजरअंदाज की जा रही हैं। यह गंभीर लापरवाही न केवल स्वास्थ्य सेवाओं का मजाक बना रही है, बल्कि गरीब मरीजों की जान को भी खतरे में डाल रही है।
