मुख्यपृष्ठसमाज-संस्कृतिउर्दू की रूहानी आवाज : बशीर बद्र का अलविदा

उर्दू की रूहानी आवाज : बशीर बद्र का अलविदा

हिमांशु राज

सय्यद मोहम्मद बशीर बद्र का जन्म 15 फरवरी 1935 को अयोध्या (फैजाबाद) में हुआ था और उनका निधन 28 मई 2026 को भोपाल में हुआ। उर्दू ग़ज़ल का वह नरम स्वर, जो आम बोलचाल की भाषा में भी गहरे जज़्बात उभार देता था, अब हमारे बीच नहीं रहा। वे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से बीए, एमए और पीएचडी करने के बाद उर्दू अध्यापन से जुड़े और बाद में मेरठ कॉलेज में भी सेवा दी। फारसी, हिंदी और अंग्रेज़ी पर उनकी समान पकड़ ने उनकी शायरी को पारंपरिक मिठास के साथ समकालीन सहजता और व्यापकता दी।
बशीर बद्र की गजलें साधारण बोलचाल की भाषा में, लेकिन गहरे भावों के साथ लिखी जाती थीं। उनकी कुछ पंक्तियां महज़ शेर न रहकर हमारे समय की सामूहिक स्मृति बन गईं। “लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में, तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में…” यह पंक्ति समाज की विडंबना और मानवीय असहायता का तीक्ष्ण दस्तावेज बन चुकी है। उन्होंने प्रेम की पीड़ा को करुणा और समझ के साथ प्रस्तुत किया। “कुछ तो मजबूरियां रही होंगी, यूं कोई बेवफ़ा नहीं होता।” जैसी पंक्तियाँ वक्त और हालात को समझकर इंसान को आंकने का आग्रह करती हैं।
1972 के शिमला समझौते पर उन्होंने लिखा, “दुश्मनी जमकर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।” यह शेर विभाजन के बाद के भारत-पाकिस्तान संबंधों और मानवीय सौहार्द की आशा का प्रतीक है।
बद्र की शायरी में स्मृतियों का उजाला बार-बार लौटकर आता है-“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो, न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।” यह निवेदन केवल व्यक्तिगत स्मृति का नहीं, बल्कि जीवन की अनिश्चितताओं के बीच एक सुरक्षित सहारे की मांग है। उनकी पंक्तियाँ छोटे-छोटे रोजमर्रा के क्षणों को ठहराव और गरिमा दे देती थीं। “फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं, तुमने मेरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा…” जैसा शेर बाहरी शोभा और भीतर के संघर्ष की द्विविधा को बखूबी बयान करता है।
इसी तरह “कहां से आई ये खुशबू, ये घर की खुशबू है, इस अजनबी के अंधेरे में कौन आया है…” और “महक रही है जमीं चांदनी के फूलों से, खुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है…” जैसी पंक्तियाँ सामान्य दृश्यों में आध्यात्मिक अनुभूति जगा देती थीं। उनकी ग़ज़लों में ‘डायरी’, ‘चिट्ठी’, ‘ट्रेन की खिड़की’, ‘छतरी’, ‘लिफाफा’ और ‘सिगरेट के धुएं’ जैसी आम वस्तुओं को शायरी में जगह मिली। यह नवाचार उर्दू ग़ज़ल को आम आदमी के करीब ले आया।
जीवन ने उन्हें संघर्ष का पाठ भी पढ़ाया। 1987 के मेरठ सांप्रदायिक दंगों में उनका घर जल गया और सैकड़ों अप्रकाशित ग़ज़लें व दुर्लभ पांडुलिपियां, जिनमें मीर, ग़ालिब और इक़बाल के दौर की सामग्री शामिल थी, नष्ट हो गईं। बशीर बद्र बस अपनी जान बचाकर भाग पाए और बाद में भोपाल आकर अंतर्मुखी हो गए। इसी हादसे के बाद उपजी दार्शनिक सोच ने उनके शेरों की गहराई बढ़ाई। उन्होंने उत्तर प्रदेश छोड़कर भोपाल में नए जीवन की शुरुआत की।
उन्होंने उर्दू गजल को आम बोलचाल की ‘हिंदुस्तानी’ भाषा में ढाला। वर्ष 1965 के आसपास अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के रूप में उनकी पहचान परवान चढ़ी। वे मानते थे कि शायरी को महलों की दासी बने रहने के बजाय लोकल ट्रेन पकड़कर दफ्तर जाने वाले आम इंसान की जुबान बनना होगा। रूढ़िवादी गलियारों में इसे उर्दू की तहजीब को हल्का करने वाली बात माना गया, लेकिन उन्होंने अपनी पीएचडी थीसिस ‘आजादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तन्क़ीदी मुताला’ लिखकर साबित किया कि उर्दू शायरी को लंबी उम्र जीनी है तो उसे आम बोलचाल की भाषा को अपनाना होगा।
उनकी रचनात्मक सूची में ‘आस’ का संग्रह विशेष स्थान रखता है। इसी के लिए उन्हें 1999 में साहित्य अकादमी पुरस्कार (उर्दू) मिला और उसी वर्ष साहित्य एवं नाटक अकादमी में योगदान के लिए उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया। अन्य प्रमुख संग्रह—‘इकाई’, ‘इमेज’, ‘आमद’, ‘आसमान’, ‘आहट’, ‘कुल्लियाते बशीर बद्र’ (पाकिस्तान में प्रकाशित) और देवनागरी में ‘उजाले अपनी यादों के’—ने उनकी कवितात्मक विविधता का परिचय दिया। आलोचनात्मक लेखन में ‘बीस
सदी में उर्दू ग़ज़ल’ ने उन्हें ग़ज़ल-विचारक के रूप में भी स्थापित किया। रेख़्ता जैसी डिजिटल लाइब्रेरी में उनकी ग़ज़लें उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी में उपलब्ध हैं तथा ई-पुस्तकें भी पढ़ी जा सकती हैं।
समुदाय और संस्थाओं ने भी उनकी कृति की कद्र की। उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी के चार पुरस्कार, बिहार उर्दू अकादमी पुरस्कार तथा मीर अकादमी पुरस्कार जैसे सम्मान मिले। लेकिन उनकी असली पहचान उनका जनसमर्थन रहा। 1994 के अमरोहा मुशायरे में जब भीड़ हुड़दंग करने लगी थी, तब बशीर बद्र ने माइक पर पढ़ा—“कोई कांटा चुभा नहीं होता, दिल अगर फूल सा नहीं होता… कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी, यूँ ही कोई बेवफ़ा नहीं होता”—और पल भर में शांति बहाल हो गई। यह उनका जादुई प्रभाव था।
वे दुनिया के 20 से अधिक देशों, जिनमें अमेरिका, दुबई, कतर और पाकिस्तान शामिल हैं, में मुशायरे पढ़ने गए। पिछले कुछ वर्षों से वे डिमेंशिया (अल्जाइमर) से ग्रस्त थे। भोपाल के शांत कोने में रहते हुए वे अक्सर अपनी पत्नी अलका बद्र से पूछते थे—“आप कौन हैं?” जब कोई उनका पुराना शेर पढ़ता, तो वे बच्चों की तरह ताली बजाकर कहते—“वाह! कितना उम्दा शेर है, किसने लिखा है?”
बशीर बद्र का इस दुनिया से रुखसत होना सिर्फ एक महान फनकार का जाना नहीं, बल्कि उर्दू ग़ज़ल के स्वर्ण युग का खामोश हो जाना है। व्यक्तिगत जीवन में उनका असली नाम सय्यद मुहम्मद बशीर था। वे अपने पीछे पत्नी और दो बच्चों को छोड़ गए। परिवार के अनुसार उन्हें मग़रिब की नमाज़ के बाद भोपाल के बड़ा बाग कब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
बशीर बद्र की शायरी ने यह सिखाया कि सरल भाषा में भी कितनी गहनता और दीर्घ प्रभाव समा सकता है। उन्होंने हमें याद दिलाया कि शब्दों की कोमलता में भी कटु सच्चाइयाँ समाई हो सकती हैं और करुणा किसी भी युग की सच्ची गाथा बन सकती है। उनकी विदाई ने उर्दू शायरी के उस मुलायम, परंतु सशक्त स्वर को खामोश कर दिया है, लेकिन उनके शेर और उनका संदेश आने वाली पीढ़ियों को ढांढ़स देते रहेंगे। यह लेख उनकी याद में समर्पित है।

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