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संपादकीय : गणपति अपने गांव चले…!

पिछले ग्यारह दिनों से घर-घर और सार्वजनिक गणेशोत्सव मंडलों के मंडपों में विराजमान श्री गणेश आज सभी भक्तों से विदाई लेंगे। २७ अगस्त को ढोल-नगाड़ों और झांझ-मजीरों की ध्वनि के बीच गणपति बाप्पा को बड़ी श्रद्धा और पारंपरिक तरीके से हर जगह स्थापित किया गया था। गणेश जी का आगमन धूम-धाम और गुलाल के साथ हुआ। आज अनंत चतुर्दशी के दिन श्री गणेश को उसी पारंपरिक तरीके से, उत्साह के साथ, ढोल-नगाड़ों और झांझ-मजीरों के साथ विदाई दी जाएगी। गणेशोत्सव के ग्यारह दिन केवल महाराष्ट्र के लिए ही नहीं हैं, बल्कि जहां भी गणेश भक्त और उनके परिवार होते हैं, वहां एक अद्भुत मंगलमय वातावरण होता है। सभी भक्तजन मांगल्य के इस उत्सव में भक्ति में डूब जाते हैं। पिछले कुछ वर्षों में समाज के अन्य वर्ग भी उत्साह और भक्ति के साथ इस उत्सव में भाग लेने लगे हैं। यही गणेशोत्सव की विशेषता है। लोकमान्य तिलक ने स्वतंत्रता के लिए भारतीयों को एकजुट करने के उद्देश्य से ब्रिटिश काल में गणेशोत्सव को सार्वजनिक रूप दिया था। इस सार्वजनिक गणेश उत्सव का प्रभाव और आस्था भारतीय जनमानस में इतनी गहराई तक समा गई कि आजादी के बाद भी यह उत्सव उसी तरह चलता रहा। समय के साथ इसमें बदलाव जरूर आया। उनमें से कई मुद्दों पर
बहस और चर्चा
हुई। पर्यावरण से लेकर डीजे के शोरगुल तक ऐसे कई मुद्दे हैं, जिनकी हर गणेशोत्सव के दौरान आलोचना होती है। खासकर सार्वजनिक गणेशोत्सव के बदले स्वरूप को लेकर, कई मंडल अलग-अलग राय रखते हैं। गणेश प्रतिमा की ऊंचाई से लेकर ‘पीओपी’ प्रतिमाओं पर प्रतिबंध तक, शाडू (मिट्टी) की प्रतिमा पर जोर से लेकर पर्यावरण अनुकूल गणेश प्रतिमाओं तक, हर साल कई मुद्दे उठाए जाते हैं। सार्वजनिक गणेशोत्सव का पहले वाला स्वरूप अब नहीं रहा। इन आपत्तियों का स्वरूप यह है कि अब पहले की तरह जनजागरण, ज्ञानवर्धक कार्यक्रम, व्याख्यान आदि आयोजित नहीं होते। हालांकि, इसमें कुछ हद तक सच्चाई भी है, लेकिन अगर समय के साथ सब कुछ बदला है, गणेशोत्सव के स्वरूप में भी बदलाव अपेक्षित है। हालांकि आज व्याख्यान आदि आयोजित नहीं होते, फिर भी गणेशोत्सव मंडल विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को जागरूक करने का काम करते ही रहते हैं। हम इस तथ्य को वैâसे नजरअंदाज कर सकते हैं कि कई बड़े मंडल आर्थिक रूप से कमजोर जरूरतमंदों को आर्थिक और चिकित्सा सहायता जैसे धर्मार्थ कार्य और सामाजिक गतिविधियां भी जारी रखे हैं? लेकिन यह भी सही है कि मंडलों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि उत्सव का अत्यधिक दिखावटीपन और उथलापन और उत्साह समय के साथ हावी न हो जाए। हाल के वर्षों में कई
सकारात्मक बदलाव
आए हैं और आवश्यक सुधारों के साथ गणेशोत्सव मनाने की परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी बिना किसी बाधा के साथ चली आ रही है। लोकमान्य तिलक ने सामाजिक एकता के जिस उद्देश्य से इस उत्सव की शुरुआत की थी, वह आज भी गणेशोत्सव में साकार हो रहा है। हालांकि इसने कुछ स्थानों पर एक इवेंट, एक तमाशा और एक अनावश्यक दिखावे का रूप अवश्य ले लिया है। लेकिन इस उत्सव के प्रति आस्था और भक्ति में तनिक भी कमी नहीं आई है। इस वर्ष भी भक्ति और आस्था का गणेशोत्सव पिछले ग्यारह दिनों से महाराष्ट्र में छाया हुआ है। श्री गणेश जी अपने भक्तों का आतिथ्य ग्रहण करने के बाद आज अपनी वापसी यात्रा पर निकलेंगे। गणेश जी को जल तत्व का स्वामी माना जाता है। इसलिए उन्हें जल में विसर्जित किया जाता है। गणेशोत्सव की खास बात यह है कि जिस भक्तिभाव से बाप्पा का आगमन होता है, उसी भक्तिभाव से अगले वर्ष जल्दी आने का वचन देते हुए विदाई लेते हैं। आज श्री गणराया अपनी वापसी यात्रा पर निकले हैं। उन्होंने अगले साल शीघ्र आने का वचन दिया ही है, लेकिन साथ ही जाते-जाते, उन्हें राजनेताओं को जनहित में निर्णय लेने की बुद्धि भी देनी चाहिए, बस यही प्रार्थना है!

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