डाॅ. रवीन्द्र कुमार
यूं कहते हैं कि हमारे वायुमंडल में नाइट्रोजन की मात्रा 78% तक है। आप अंदाजा लगा लें कि फिर ऑक्सीजन कितनी कम है। ऐसा समझिए मात्र 21% है। बाकी 1% और तमाम गैस हैं। आप समझ गए होंगे कि क्यों ऑक्सीजन की इतनी मारामारी है। योगा वाले अलग सुबह-सुबह उठ कर ऑक्सीजन खींचने में लगे रहते हैं। अस्पताल में मरीज की हालत बिगड़ी नहीं और ऑक्सीजन की चीख-पुकार मचने लगती है। कोरोना में हम सबने ऑक्सीजन को लेकर मारधाड़ देखी भी है और उस दौर से खुद गुजरे भी हैं। पूरी दुनिया पेड़-पौधे लगा रही है, ताकि ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ सके। मेरे भारत महान में हम विकास को लेकर चिंतित हैं। अतः जंगल काट-काटकर एक्स्प्रेस वे और कारखाने लगा रहे हैं, खदानें खोद रहे हैं।
सुना है कि भूटान में कार्बन रेटिंग नेगेटिव में चल रही है। हमारे ए.क्यू.आई. 400-500 तक जाता है, जबकि कहते हैं कि इसे तीन अंक में नहीं आना चाहिए अर्थात 100 भी नहीं होना चाहिए। हम मस्त कौम हैं। हमें कोई ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। जीना-मरना सब ऊपर वाले के हाथ है। वो जोश मलीहाबादी साब का शेर है ना:
क्या तब्ख मिलेगा गुल-फिशानी कर के
क्या पाएगा तौहीन-ए-जवानी कर के
तू आतिश-ए-दोजख से डराता है उन्हें
जो आग को पी जाते हैं पानी कर के
अतः ये छोटे-मोटे ए.क्यू.आई. हमें डरा नहीं सकते। विकास का जो महती काम हम कर रहे हैं, उससे डिगा नहीं सकता। हां, अगर तुम एक पेड़ काटोगे अपने आंगन का, जिससे आपको हानि पहुंच रही हो तो हम आपको नोटिस भेज देंगे और आपको चक्कर लगवा-लगवा कर दो चीज घिसवा देंगे-एक आपकी नाक और एक आपके जूते। हां, अगर आप एक हजार पेड़ काटेंगे तो हम कुछ नहीं कहेंगे, बशर्ते आपने यह काम देश हित में विकास के लिए किया हो। आपने ऐसे केस देखे होंगे, जहां बिल्डर जंगल के जंगल काट कर आपके लिए कॉलोनी बनाता है और फिर आपको फ्लैट बेचते वक्त बताता है कि कैसे उन्होंने आर्टिफिशियल लेक बनाई है। घास उगा दी है। आपके वास्ते ग्रीनरी बनाई है। कहीं नैचुरल कहीं आर्टिफिशियल प्लास्टिक की घास से। क्या आपने किसी भी पॉलिटिकल पार्टी के चुनाव-घोषणा पत्र में ऑक्सीजन की, एनवायर्नमेंट की बात देखी-पढ़ी-सुनी है ? मुझे ज्यादा ताज्जुब नहीं हुआ, जब मैंने देखा आप बस अपना कार नंबर बताइए और बिना कार ले जाये आपको प्लूशन अंडर कंट्रोल का प्रमाणपत्र मिल जाता है। पर जहां वोट आपके जाए बिना गिर जाता है तो यह आदमी के गिरने के ही प्रमाण हैं। जब आदमी गिर ही गया तो फिर काम कोई हो, क्षेत्र कोई भी हो, धरातल कोई भी हो क्या फर्क पड़ता है।
हां, तो बात ऑक्सिजन की हो रही थी। एक अस्पताल में जब एक मरीज की हालत नाज़ुक हुई तो हस्बे मामूल उस को ऑक्सीजन दी जाने लगी। जिसे आजकल आम भाषा में कहा जाता है कि फलां ऑक्सीजन पर है। यह वेंटिलेटर से अलग है। वेंटिलेटर-पुराण फिर कभी उसकी महिमा में तो एक पूरा लेख लगेगा।
वेंटिलेटर अनंत
वेंटिलेटर कथा अनंता
तो ऑक्सीजन तो इस उम्मीद से लगाई गयी थी कि अब मरीज की हालत में सुधार नहीं हुआ तो कमसकम स्थिर तो बनी रहेगी। मगर यह क्या ऑक्सीजन पाइप में ही भयानक विस्फोट हो गया। वो क्या कहते हैं सिलिन्डर ही फट गया। अभी तक कुकिंग गैस के सिलिन्डर फटते सुने-पढ़े थे, अब ऑक्सीजन के सिलिन्डर भी फटने लगे। कलयुग शायद इसी को कहते हैं। तो जी ऑक्सीजन का सिलिन्डर फटते ही विस्फोट हुआ और विस्फोट के तुरंत बाद भयानक आग लग गयी। बेचारे मरीज को ऑक्सीजन दी थी कि उसे जीवन मिले, यहां देखते-देखते मरीज के चिथड़े उड़ गए। दर्दनाक मृत्यु हो गयी। जांच-वांच तो होती रहेगी। होगी भी। पर कुछ तुरंत ऐसा करें कि ऑक्सीजन जो जीवन के लिए दी जा रही है, वहीं मृत्यु का कारण न बन जाए। अभी तक वेंटिलेटर का सुन कर ही मरीज के परिजन उम्मीद छोड़ देते हैं। अब ऑक्सीजन का नाम सुनते ही वो कह देंगे “जी रहने दें, हम मरीज को घर ले जा रहे हैं!”
(डाॅ. रवीन्द्र कुमार रेलवे से रिटायर्ड एक वरिष्ठ अधिकारी हैं। वह एक प्रतिष्ठित लेखक, कवि एवं व्यंग्यकार हैं)
