मन पाखी

मेरा मन पाखी उड़ता जाए,
दूर अति दूर क्षितिज के पार।
पकड़ अपार आकांक्षाओं की डोर,
उड़ता जाए छोटे, कोमल पंखों पर।
धर अडिग विश्वास,
वायु के झोंकों को कर परास्त,
अपना पथ चुनता जाए।
मेरा मन पाखी उड़ता जाए।

मेरी भोर सिंदूरी,
रात रुपहली हो गई।
चपला-सी चमकती हर चाहत
सतरंगी बादलों पर झूल रही।
सपनों का एक बड़ा पुलिंदा
आवारा बादलों-सा उड़ रहा।
सिहरन मीठी यादों की
बार-बार उलझ रही।

मन पाखी को उड़ान की
एक नवीन दिशा मिल गई।
उड़ चल, मेरे मन पाखी,
उड़ जा तू दूर क्षितिज के पार।

-बेला विरदी

अन्य समाचार