भरतकुमार सोलंकी
मनुष्य जन्म लेते ही दुनिया से परिचय नहीं करता; सबसे पहले वह अपने “मैं” से परिचित होता है। यह “मैं” कोई अचानक उगने वाली चीज नहीं, बल्कि जन्म के कुछ ही दिनों बाद धीरे-धीरे सिर उठाने वाली एक अदृश्य बीमारी है, जो अपनी मौजूदगी का एहसास करवाने को बेचैन रहती है।
जन्म के तुरंत बाद बच्चा अपनी मां को संकेत देता है कि “मैं भी हूं।”
भूख लगे तो रोकर कहता है कि मेरी जरूरत का सम्मान करो।
असहज लगे तो कराहकर ध्यान खींचता है कि मुझे मत भूलो।
माँ थोड़ी देर भी अनदेखा कर दे तो वह रोने की आवाज ऊंची कर देता है, जैसे कह रहा हो कि “मुझे देखो, मैं यहां हूं।”
यही “मैं” पहली बार रोने की भाषा में प्रकट होता है।
और यही “मैं” कुछ महीनों में चिल्लाने से लेकर हंसाने तक हर तरीके का इस्तेमाल करके मां को अपनी ओर खींचना सीख लेता है।
फिर समय बीतता है।
बच्चा बड़ा होता है, समझदार होता है। अब उसे पता लगने लगता है कि बीमार होने पर माता-पिता का प्यार दस गुना बढ़ जाता है।
तो कभी सच में दर्द होता है, कभी ज़रा सा बहाना बनता है, लेकिन इरादा एक ही रहता है-“मां, मुझे मत भूलना… मैं भी हूं।”
कई बच्चे तो सिर्फ इसलिए मां की गोद में आकर सो जाते हैं, ताकि अपना अस्तित्व जताते रहें।
धीरे धीरे स्कूल आता है।
कोई बच्चा पढ़ाई में अव्वल होकर अपने “मैं” को मजबूत करता है, तो कोई शरारतों और धौंस से अपने “मैं” को बढ़ाता है।
घर हो, गली हो, स्कूल हो, हर जगह “मैं” अपनी ताकत बढ़ाता रहता है।
फिर कॉलेज।
युवावस्था की दहलीज पर पहुंचकर “मैं” को दिखाने के नए नए मंच मिल जाते हैं।
किसी को लगता है कि सुंदर दिखने में उसका “मैं” है, किसी को दोस्ती के दायरे में, किसी को प्रतिभा में, किसी को बहस में, किसी को अपनी पहचान में।
इसके बाद नौकरी या व्यापार।
अब तो “मैं” को दिखाने का सबसे बड़ा मैदान मिल जाता है।
दफ्तर में पद मिला तो “मैं” खुश, नहीं मिला तो “मैं” दुखी।
व्यापार में ज्यादा प्रॉफिट आया तो “मैं” फूल जाता हैं, घाटा आया तो “मैं” तिलमिला उठता है।
और जब समाज में भी लोग ध्यान न दे, तब “मैं” का आखिरी दाँव दिखता है:
उपवास।
पहले एक दिन।
फिर तीन।
फिर आठ।
फिर पंद्रह।
फिर चालीस-पैंतालीस दिन तक उपवास।
उपवास धर्म का साधन कम, और “मैं” को दिखाने का एक अदृश्य तरीका ज्यादा बन जाता है।
यह बात इंसान को खुद भी पता नहीं चलती, पर “मैं” हर बार किसी न किसी बहाने से अपने आपको और मजबूत कर लेता है।
और इसी तरह, जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, “मैं” और ताकतवर हो जाता है।
हर संबंध में, हर काम में, हर चाहत में अपना चेहरा दिखाता है।
लेकिन एक दिन भीतर कहीं हल्का सा ज्ञान जगता है।
एक फुसफुसाहट सी सुनाई देती है कि “असल में बाधा मैं नहीं हूं… यह मेरा यह ‘मैं’ है।”
उस दिन से यात्रा बदल जाती है।
इंसान बाहर की दुनिया जीतने के बजाय अपने भीतर उतरना शुरू करता है।
मौन की ओर कदम बढ़ते हैं।
जैसे जैसे मन शांत होता है, “मैं” की आवाज धीमी पड़ती जाती है।
और फिर एक क्षण आता है जब मौन के बीच व्यक्ति अपने सबसे प्राचीन आनंद से परिचित होता है।
वही आनंद, जो मां के गर्भ में था।
जहाँ किसी “मैं” का कोई अस्तित्व नहीं था।
और तभी पता चलता हैं कि आध्यात्मिकता बाहर कुछ खोजने की यात्रा नहीं है।
वह तो “मैं” को विसर्जित करने की प्रक्रिया है।
जहाँ मैं नहीं बचता, वहाँ केवल आनंद बचता है।
वह निर्मल, निष्कलंक, शांत आनंद — जो जन्म से पहले था, और आज भी भीतर कहीं मौजूद है।
