मुख्यपृष्ठनए समाचारसंपादकीय : मोदी के ‘बारह' साल; और नेहरू...

संपादकीय : मोदी के ‘बारह’ साल; और नेहरू…

संयोग भी वैâसा होता है, देखिए। प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता में आए २६ मई को १२ साल पूरे हो गए। इस उपलक्ष्य में भारतीय जनता पार्टी द्वारा उत्सव मनाना और मोदी पर प्रशंसा के पुल बांधना, इसमें आश्चर्यचकित होने जैसी कोई बात नहीं है। हर बात का उत्सव मनाना, यहां तक कि हार और नाकामी का भी उत्सव मनाना, यही पिछले १२ वर्षों के कार्यकाल का मुख्य सूत्र रहा है। ‘ऑपरेशन सिंदूर’, का भी उत्सव मनाया गया, जिसमें पीछे हटना पड़ा। पुलवामा आतंकवादी हमले में ४० जवानों की शहादत का भी उत्सव मनाया गया। २६ मई २०१४ को भारत में सत्ता परिवर्तन हुआ था। भाजपा के लोगों का कहना है कि इस दिन को हर साल ‘सेवा सुशासन स्थापना दिवस’ के रूप में मनाया जाना चाहिए। संयोग ऐसा है कि २६ मई जहां मोदी का ‘उत्सव दिवस’ है, वहीं ठीक उसके दूसरे दिन पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि का दिन है। नेहरू को गुजरे हुए ६२ साल हो गए, लेकिन आजादी के बाद पैदा हुए और २०१४ के बाद भी जिनका दिमाग और अंतरात्मा जीवित है, ऐसे लाखों लोगों ने नेहरू का स्मरण किया। स्वतंत्र भारत के निर्माण में नेहरू के योगदान पर लेख लिखे गए, चर्चाएं हुईं। इसका सीधा अर्थ यही है कि मोदी और उनके लोगों द्वारा पिछले दस-बारह वर्षों में रोज नेहरू को बदनाम करने और नेहरू के राष्ट्रकार्य पर सवाल उठाने के बावजूद, जनता के दिलों में नेहरू आज भी अचल हैं। मोदी ने नेहरू की पुण्यतिथि पर लोक-लाज के कारण एक पंक्ति की श्रद्धांजलि अर्पित की। सच तो यह है कि भारत के भाग्यविधाता रहे नेहरू के समाधि स्थल पर जाकर उन्हें खुद के प्रधानमंत्री पद पर १२ साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आशीर्वाद और प्रेरणा लेनी चाहिए थी, लेकिन इसके लिए दिल बड़ा होना चाहिए। १२ वर्षों में मोदी की ठोस उपलब्धि कौन-सी है? चुनाव आयोग को जेब में डालकर हर चुनाव जीतना ही अगर कोई मोदी की ठोस उपलब्धि मानता है तो प्रभु श्रीराम ऐसे लोगों को सुबुद्धि दें। मोदी की शान-शौकत अलग ही है। मोदी सरकार ने पिछले १२ वर्षों में अपनी पब्लिसिटी पर ५,९८७.४६ करोड़ रुपए खर्च किए। यानी रोज का औसतन डेढ़ से पौने दो करोड़ रुपये। नेहरू को ऐसी झूठी पब्लिसिटी की जरूरत नहीं पड़ी। उनका नेतृत्व स्वतंत्रता आंदोलन की भट्ठी में तपकर निखरा था। वे स्वयं ही एक आभामंडल थे। मोदी की सुरक्षा पर सालाना ६०० करोड़ रुपये खर्च होते हैं। ये आधिकारिक आंकड़े हैं। यानी रोज कितने करोड़ रुपए, यह लोग खुद गिनते रहें। २०१४ से २०२६ तक मोदी के विदेश दौरों पर करीब १६,८१५ करोड़ रुपए खर्च होने का रिकॉर्ड है। मोदी ने अपने दौरों के लिए १० हजार करोड़ का भव्य आलीशान विमान खरीदा है। मोदी के
महंगे कपड़ों पर भी चर्चा
होती है। उनका सूट दस लाख का, पेन दो लाख का, घड़ी पांच लाख की, चश्मा दो-पांच लाख का और चप्पलें तीन लाख की, ऐसी मनोरंजक जानकारी चर्चा में आती रहती है। मुमकिन है मोदी को ऐसे सजने-संवरने का शौक हो। लेकिन गरीबी भोग चुका और चाय बेचकर इतनी ऊंची छलांग लगानेवाला कोई भी नेता जनता की तिजोरी से खुद पर इतना भारी खर्च कभी नहीं होने देगा; वह मितव्ययिता और सादगी से ही जिएगा। परंतु प्रधानमंत्री मोदी वैसे नहीं हैं। इसके विपरीत, पंडित नेहरू की जैकेट, शेरवानी, टोपी और गुलाब सिर्फ कपड़े नहीं थे, बल्कि वे स्वतंत्र भारत का सौंदर्यशास्त्र थे। नेहरू के ‘ड्रेस स्टाइल’ ने भारत को एक सभ्य, सुसंस्कृत और आत्मविश्वासी राष्ट्र के रूप में पहचान दी। नेहरू कई मायनों में अद्भुत थे। अटल बिहारी वाजपेयी ने उन्हें श्रीराम की उपमा दी थी। कॉमरेड हिरेन मुखर्जी ने कहा था, ‘नेहरू एक सफल राजनीतिज्ञ नहीं बन सके, क्योंकि आज की राजनीति में सफल होने के लिए जिस अशिष्टता और झूठ की जरूरत होती है, वह नेहरू के पास बिल्कुल नहीं थी।’ यानी वे राम की तरह सत्यवादी थे, वाजपेयी जी की यह बात सच साबित होती है। राम के नाम पर राज करनेवाले मोदी ने देश बनाने के लिए कौन-सी कठिनाइयां झेलीं या ठोकरें खाईं? इसके उलट, उनके शासन के कारण आज दुनिया के नक्शे पर भारत के अस्तित्व पर ही सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। बड़े वैश्विक पैâसलों से भारत को दूर रखा जा रहा है। भारत की पहचान एक भ्रष्ट और चुनिंदा लोगों की विलासी जरूरतों को पूरा करनेवाले देश के रूप में बन रही है। लोकतंत्र के नाम पर चल रही तानाशाही और हुड़दंग ही प्रधानमंत्री मोदी की १२ वर्षों में भारत को मिली देन है। भारत की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है। भारत में जल्द ही आर्थिक मंदी का तूफान आएगा, राहुल गांधी ने जो कहा था, वैसी परिस्थिति आने ही वाली है। रुपया पूरी तरह गिर चुका है। महंगाई चरम पर पहुंच गई है और मोदी अपने ‘एक्स’ (ट्विटर) हैंडल से सलाह दे रहे हैं कि भारत में गर्मी बढ़ रही है इसलिए लोग सावधानी बरतें और पानी पीते रहें। मूल बात तो यह है कि देश की ६० प्रतिशत जनता को आज भी शुद्ध पीने का पानी नहीं मिल रहा है। ‘जल जीवन मिशन’ एक ‘प्रâॉड’ बनकर रह गया है। जब नेहरू प्रधानमंत्री बने थे, तब भारत भूख, गरीबी, बेरोजगारी और महज ५०० करोड़ रुपए के ‘बजट’ से जूझ रहा था। फिर भी नेहरू ने आईआईटी एम्स, इसरो और एटॉम्िाक रिसर्च सेंटर जैसी संस्थाओं का निर्माण किया। आज मोदी को सत्ता में १२ साल हो रहे हैं और भारत का बजट ५३.४७ लाख करोड़ रुपए का है। इतना बड़ा बजट होने के बावजूद मोदी राज में नेहरू जैसी कौन-सी संस्थागत संरचना खड़ी हुई? इस सवाल का जवाब केवल न में ही आता है। महाराष्ट्र में ‘मिंधे’ जैसे लोग कहते हैं, ‘१२ सालों में मोदी पर भ्रष्टाचार का एक भी दाग नहीं है।’ सच तो यह है कि ऐसा बयान देने वाले सभी ‘मिंधों’ को सत्ता में शामिल करना, उसके लिए चुनाव आयोग और सुप्रीम कोर्ट को कब्जे में करना और
सत्ता स्थापना के लिए
विपक्षी विधायकों को पचास-पचास करोड़ में खरीदना ही भारत का अब तक का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार है। शुभेंदु अधिकारी, हिमंत बिस्वा सरमा, एकनाथ शिंदे ही मोदी के भ्रष्टाचार के प्रतीक हैं। मोदी का गुणगान उनकी भक्त मंडली और उनके द्वारा नियुक्त किए गए मुख्यमंत्री कर रहे हैं। मुख्यमंत्री फडणवीस ने कहा, ‘मैं तो मोदी के काम पर दिनों-दिन बोल सकता हूं।’ तो फिर १२ सालों में अलग क्या चल रहा है? मोदी और उनकी सरकार ने १२ वर्षों में कम से कम बारह सौ लफ्फाजी की है। प्रत्येक भारतीय नागरिक के खाते में १५ लाख रुपये डालने से शुरू हुई लफ्फाजी का यह सफर अब तक खत्म नहीं हुआ है। इस सफर में लोकतंत्र और संविधान का पूरी तरह से पतन हो गया। मोदी ने दिल्ली के राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्यपथ कर दिया। राजभवन को लोकभवन और प्रधानमंत्री कार्यालय को सेवातीर्थ कर दिया। प्रधानमंत्री के रहने के लिए वे एक अलग भव्य निवास स्थान बनवा रहे हैं। वर्तमान में मोदी का निवास स्थान आठ एकड़ में है। अब बगल के दिल्ली जिमखाना का २७ एकड़ का भूखंड मोदी को अपने निवास स्थान के लिए चाहिए। नेहरू, इंदिरा गांधी, लाल बहादुर शास्त्री, नरसिम्हा राव, डॉ. मनमोहन सिंह ने ऐसा ‘ठाठ’ कभी नहीं दिखाया। लेकिन खुद को ‘प्रधानसेवक’ कहनेवालों के इस ठाठ को ही देशसेवा मानना पड़ रहा है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से आखिरी दम तक लड़ने का मोदी का वचन था। वे पाक अधिकृत कश्मीर को भारत से जोड़नेवाले थे, लेकिन ‘ऑपरेशन सिंदूर’ उन्होंने वापस ले लिया। पुलवामा में सैनिकों का और पहलगाम में हिंदू पर्यटकों का खून बहा। धारा ३७० हटाने के बाद भी कश्मीर में स्थिरता नहीं आई। मणिपुर जल रहा है, लेकिन मोदी वहां नहीं गए। इसके विपरीत, दंगाइयों को काबू में करने के लिए नेहरू द्वारा खुद दंगों के बीच कूद पड़ने की घटनाएं रोमांचक हैं। मोदी के कार्यकाल में अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ यह सच है, लेकिन वे भारतवर्ष पर सत्यवादी राम का राज्य नहीं ला सके; वे लेकर आए अडानी का राज्य। यही मोदी के १२ वर्षों के शासनकाल का परिणाम है। विदेशों से काला धन कभी वापस नहीं आया, बल्कि वह बढ़ता गया और फिर से विदेशों में पहुंच गया। इसीलिए यह शंका होती है कि कहीं मोदी उस पैसे का हिसाब-किताब देखने के लिए ही तो विदेश दौरे नहीं करते? पंडित नेहरू ने स्वतंत्रता आंदोलन के लिए अपनी सारी व्यक्तिगत संपत्ति और बंगला आदि दान कर दिया था। (उस समय की संपत्ति का मूल्य लगभग २०० करोड़ रुपए था, यानी आज के हिसाब से १२,००० करोड़ रुपए।) इसे त्याग कहते हैं। मोदी के कामकाज को देखने पर नेहरू के त्याग का तेज और उभरकर सामने आता है। २६ तारीख को मोदी को आए १२ साल पूरे हो गए और २७ तारीख को नेहरू को गए ६२ साल हो गए। इसके बावजूद, नेहरू अमर हैं!

अन्य समाचार