सांझ-सवेरे आरती, पांचों वक्त अजान।
पर बातें सब प्यार की, भूल गया इंसान।।
मंदिर-मस्जिद घूमकर, खोजे रब का द्वार।
मन के भीतर झाँकना, समझे नहीं विचार।
नफ़रत की दीवार में, कैद हुआ ईमान—
पर बातें सब प्यार की, भूल गया इंसान।।
राम-रहीम के नाम पर, बढ़ते रोज विवाद।
धर्म नहीं सिखला रहा, आपस में अवसाद।
ममता, करुणा, प्रेम का, टूट गया सम्मान—
पर बातें सब प्यार की, भूल गया इंसान।।
जाति-धर्म के जाल में, उलझा हर इंसान।
अपनेपन की धूप को, कर बैठा वीरान।
रिश्तों की बगिया हुई, सूनी और सुनसान—
पर बातें सब प्यार की, भूल गया इंसान।।
भूखे को रोटी नहीं, प्यासे को ना नीर।
फिर भी ऊँची हो रही, धर्मों की जागीर।
मानवता के नाम पर, मिलता केवल ज्ञान—
पर बातें सब प्यार की, भूल गया इंसान।।
‘सौरभ’ धर्म वही बड़ा, जो बाँटे मुस्कान।
दुखियों के आँसू पोंछे, दे सबको सम्मान।
प्रेम बिना सूने लगे, पूजा और अजान—
पर बातें सब प्यार की, भूल गया इंसान।।
-डॉ. प्रियंका सौरभ
