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पर्यावरण, विकास एवं द्वंद्व

डॉ. अर्जुन पाण्डेय / पर्यावरणविद्

भूमंडल पर ग्रीनहाउस प्रभाव की त्रासदी, ओजोन परत में हो रहे छिद्र एवं क्षरण, भूताप में वृद्धि, न्यूक्लीय शीत, जलवायु में हो रहे व्यापक परिवर्तन, भूमंडलीकरण से जनित समस्याएं तथा नित्य बढ़ते प्रदूषण के प्रभाव से समस्त पृथ्वी इसकी चपेट में है। अंतरराष्ट्रीय समस्या होने के कारण पर्यावरणविदों, भूगोलविदों तथा अर्थशास्त्रियों का ध्यान इस ज्वलंत समस्या से निजात पाने के लिए तेजी से आकृष्ट हुआ है।
ठोस, द्रव्य एवं गैसीय पदार्थों से निर्मित एक जीवन-परत, जो भूमंडल में रहने वाले मानव सहित समस्त जीव-जगत को समेटे हुए है। हम जीवन-परत के बिना जीवित नहीं रह सकते हैं। अतः जीवन-परत को उसकी मौलिक अवस्था में बनाए रखना निहायत जरूरी है।
जीवंत ग्रह पृथ्वी पर जीवन का माता और पुत्र के समान अटूट रिश्ता है। सूर्यमंडल के इस ग्रह में प्रकृति प्रदत्त तत्वों में साम्यावस्था की शक्ति निहित है। यदि पृथ्वी पर किसी भी प्रकार की पर्यावरणीय क्षति होती है, तो पृथ्वी अपनी शक्ति के बल पर समय रहते समायोजन कर लेती है।
पर्यावरण एक भौतिक एवं जैविक संकल्पना है, जिसमें भौतिक के अंतर्गत स्थल, जल, वायु एवं सूर्य प्रकाश तथा जैविक के अंतर्गत बृहद एवं सूक्ष्म पेड़-पौधे, जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े एवं मानव सम्मिलित हैं। भारत में प्रायः लोग प्राचीन काल से ही प्रकृति एवं पर्यावरण को सुरक्षित रखने की दिशा में सचेष्ट रहे हैं। आम, नीम, पीपल, आंवला, तुलसी, रुद्राक्ष आदि तथा हाथी, शेर जैसे हिंसक पशुओं के साथ भूमि, जल, वायु, चंद्रमा एवं सूर्य आदि की पूजा इसके प्रमाण हैं। हमारे यहां संयुक्त राज्य अमेरिका एवं ब्रिटेन आदि विकसित देशों की तुलना में अपेक्षाकृत इसकी समस्या कम है, तथापि इस समस्या के प्रति सतर्क रहना निहायत जरूरी है। आज विकास के नाम पर मानव की असीमित इच्छाशक्ति ने संसाधनों के उपयोग का जो रास्ता चुना है, वह दिन दूर नहीं जब ऐसा करना उसके लिए स्वयं घातक सिद्ध होगा।
पश्चिम का दर्शन, ‘प्रकृति का शोषण करने से समृद्धि आती है’, के कारण जल, जंगल और जमीन का क्षरण तेजी से हुआ है। पर्यावरणीय तत्वों का अवनयन तेजी से बढ़ा है, जिसने अनेक पर्यावरणीय समस्याओं को जन्म दे दिया है। यदि समय रहते उभरते पर्यावरणीय संकट पर नियंत्रण नहीं किया गया, तो कहीं समस्त भूमंडल केपटाउन न बन जाए। आए दिन बाढ़, सूखा, भूकंप, ज्वालामुखी, सुनामी एवं कैटरीना जैसी प्राकृतिक आपदाओं का दंश समस्त भूमंडल को झेलना पड़ता है।
मेरा ऐसा मानना है कि पर्यावरण एवं विकास के कार्य अलग नहीं हैं। विकास तो पर्यावरण का श्रृंगार है। यदि विकास कार्य आवश्यकता के अनुरूप तथा मांग एवं आपूर्ति पर आधारित होगा, तभी पर्यावरण का संतुलन संभव है। अन्यथा विकास के प्रभाव में पारिस्थितिक असंतुलन से उत्पन्न समस्याओं तथा वर्तमान चुनौतियों— ग्रीनहाउस प्रभाव, अम्लीय वर्षा, ओजोन परत में क्षयीकरण, वन विनाश, पादप प्रजातियों, वन्यजीव-जंतुओं तथा पक्षियों का लोप होना, प्रवाल श्वेतन, एशियाई भूरी धुंध आदि का सामना अवश्यंभावी है। ब्रिटेन के ऊपर प्रमाणस्वरूप ओजोन परत में अंटार्कटिका के बराबर छिद्र बन चुका है। आज दुनिया के सभी देश इन समस्याओं से भयाक्रांत हैं।
वर्तमान परिवेश में विकास के नए आयामों में बाजारीकरण, शहरीकरण एवं औद्योगीकरण, जैव-नाशी एवं कीटनाशी रसायनों का प्रयोग तेजी से बढ़ा है, जो पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी की दृष्टि से हितकर नहीं है। समझना होगा कि प्रकृति आवश्यकता की आपूर्ति कर सकती है, लोभ-लालच की नहीं।
आज दुनिया की निगाहें प्रकृति द्वारा छिपाई गई वस्तुओं की तलाश हेतु ग्रीनलैंड एवं अंटार्कटिका जैसे क्षेत्रों की ओर लगी हैं। आज मनुष्य प्रकृति को अपने कब्जे में लेना चाहता है। वह भूल गया है कि प्रकृति पर विजय प्राप्त करना संभव नहीं है। ध्यान रहे, प्रकृति देती है, लेती नहीं। मानव के लिए आवश्यक है कि वह पुरानी पीढ़ी की तरह प्रकृति प्रदत्त उपहारस्वरूप प्राप्त वस्तुओं का अनुकूलतम उपयोग विरासत के बजाय धरोहर के रूप में करे।
रूपांतरण के वेग का केंद्र ब्रिटेन का पाश्चात्य उपभोगवाद है, जिसके कारण भारत में भी पुराने विचार, पुरानी मान्यताएं एवं पुरानी परंपराएं अधिक पाने की लालसा में तेजी से विनष्ट होती जा रही हैं।
हम कहां हैं? कहां है हमारा भविष्य? भौतिकता की इस चकाचौंध में आज की नई पीढ़ी दिग्भ्रमित हो चुकी है, जो प्रकृति के मौलिक रूप को बिगाड़ने पर तुली है, जो सर्वथा विनाशकारी है। पारिस्थितिक असंतुलन से दृश्य भयावह होगा। साथ ही लोग उदर एवं हृदय रोग, चर्म रोग तथा श्वसन संबंधी रोगों, दमा एवं अस्थमा आदि के शिकार होंगे तथा समस्त जीव-जगत को जलवायु एवं मौसम संबंधी व्यापक परिवर्तन का सामना करना पड़ेगा। पर्यावरण एवं विकास के मध्य संतुलन को लेकर सर्वप्रथम वर्ष 1972 में आयोजित स्टॉकहोम सम्मेलन में कुछ देशों को चिन्हित किया गया था।
आज मानव पर्यावरण की शुद्धता को नजरअंदाज कर भागने और दौड़ने के अंतर को भूलकर विकास के द्वंद्व में फंस गया है। भूमंडलीकरण ने समस्त भूमंडल को गांव का रूप दे दिया है। ऐसी स्थिति में प्राकृतिक आपदाओं और सांस्कृतिक क्षरण से बचने के लिए नैतिकता, भौतिकवाद एवं आध्यात्मिकता के मध्य संतुलन निहायत जरूरी है।
आज दिनों-दिन समस्त भूमंडल पर्यावरणीय समस्या से भयाक्रांत है। केवल मॉन्ट्रियल, रियो, जेनेवा, टोरंटो एवं क्योटो आदि में किए गए समझौतों मात्र से इस समस्या से निजात नहीं मिलेगी। इस समस्या से उबरने के लिए सर्वप्रथम पर्यावरण बोध एवं जनचेतना आवश्यक है। प्रकृति सर्वोपरि है। प्रकृति प्रेम ही एकमात्र समाधान बन सकता है। इसी भावना से मानव को सोचना होगा कि प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति की सभी वस्तुएं उसी के लिए हैं।
भूतल की समस्त मानव जाति के लिए आवश्यक है कि वह अतिवादिता से हटकर, भौतिकवाद से ऊपर उठकर आध्यात्मिक चिंतन द्वारा उपहारस्वरूप प्राप्त प्राकृतिक संसाधनों का अनुकूलतम उपयोग करे। इससे न केवल संसाधनों का संरक्षण होगा, अपितु जीव-जगत स्वयं सुरक्षित रहेगा। अतः भावी पीढ़ी की भलाई के लिए हमें दीर्घकालिक योजना तैयार करनी होगी, जिससे मानव एवं प्रकृति के मध्य कोई द्वंद्व न हो। इसके लिए संपूर्ण मानव जाति को जागरूक होना पड़ेगा।

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