डॉ. मंगलेश्वर त्रिपाठी / नई दिल्ली
सरकार एक तरफ ‘विश्वगुरु’ का नारा दे रही है, तो दूसरी तरफ रुपया डॉलर के मुकाबले शतक लगाने के करीब पहुंच गया है। 1 डॉलर अब 99 रुपये के पार ट्रेड कर रहा है। यह गिरावट सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि हर भारतीय की जेब पर सीधी चोट है।
सोना बढ़ा, रुपया क्यों गिरा?
PIB के फैक्ट-चेक में दावा किया गया कि RBI ने सोना बेचा नहीं, बल्कि विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की हिस्सेदारी सितंबर 2025 के 13.92 प्रतिशत से बढ़कर 22 मई 2026 तक 16.85 प्रतिशत हो गई। यानी सरकार की तिजोरी में सोना तो बढ़ा, पर आम आदमी की तिजोरी खाली होती जा रही है।
सवाल यह है कि जब RBI सोना खरीदकर भंडार मजबूत कर रहा है, तो रुपया लगातार क्यों टूट रहा है? सरकार इसका ठीकरा “वैश्विक कारणों” पर फोड़ देती है—कच्चे तेल की कीमतें, अमेरिका में ब्याज दरें और जियो-पॉलिटिक्स। लेकिन 12 साल से सत्ता में रहने के बाद भी यदि हम तेल और आयात के लिए डॉलर पर निर्भर हैं, तो यह नीतिगत नाकामी नहीं तो क्या है?
महंगाई की मार के बीच सरकार बेपरवाह
डॉलर महंगा होने का मतलब है कि पेट्रोल-डीजल, खाद, इलेक्ट्रॉनिक सामान और दवाइयां सब महंगी होंगी। वर्ष 2014 में 1 डॉलर 60 रुपये का था, आज 99 रुपये का है। यानी 10 वर्षों में लगभग 65 प्रतिशत की गिरावट। इस दौरान ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसे नारे दिए गए, लेकिन व्यापार घाटा 2025-26 में रिकॉर्ड 270 अरब डॉलर तक पहुंच गया। हम निर्यात कम कर रहे हैं और आयात ज्यादा। यह किसकी जिम्मेदारी है?
‘हेडलाइन मैनेजमेंट’ से नहीं चलेगी अर्थव्यवस्था
जब “RBI ने सोना बेच दिया” जैसी खबरें चलती हैं, तो PIB तुरंत फैक्ट-चेक जारी करता है। यह अच्छी बात है। लेकिन जब रुपया 99 के पार पहुंच जाता है, तब कोई यह नहीं बताता कि सरकार इसे रोकने के लिए क्या कर रही है। क्या वित्त मंत्रालय ने निर्यात बढ़ाने के लिए कोई ठोस रोडमैप दिया है? क्या तेल पर निर्भरता कम करने के लिए इथेनॉल और सौर ऊर्जा के क्षेत्र में किए जा रहे प्रयास जमीनी स्तर पर दिखाई दे रहे हैं?
विश्वगुरु बनने के लिए मजबूत रुपया चाहिए
G20 की मेजबानी, चंद्रयान मिशन और डिजिटल पेमेंट्स के कारण दुनिया में भारत की धाक जरूर जमी है। लेकिन जब एक भारतीय को विदेश में पढ़ाई के लिए डेढ़ गुना अधिक फीस देनी पड़े, जब हज-उमराह 40 प्रतिशत तक महंगा हो जाए और जब दवा कंपनियों को कच्चा माल महंगा पड़े, तब ‘विश्वगुरु’ का नारा खोखला प्रतीत होता है।
जापान और दक्षिण कोरिया की मुद्राएं भी कमजोर हैं, लेकिन वहां प्रति व्यक्ति आय लगभग 30 लाख रुपये सालाना है। भारत में आज भी 80 करोड़ लोग मुफ्त राशन पर निर्भर हैं। इसलिए यहां रुपये की गिरावट सीधे तौर पर गरीबी और आर्थिक बोझ को बढ़ाती है।
नाकामी छिपाने से बेहतर है स्वीकार करना
सरकार को यह मानना होगा कि रुपये को संभालना सिर्फ RBI की जिम्मेदारी नहीं है। विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) बढ़ाना, निर्यात को प्रोत्साहित करना और तेल के विकल्प विकसित करना नीति-निर्माताओं की जिम्मेदारी है। केवल ‘साजिश’ का शोर मचाने या PIB के जरिए खबरों को गलत साबित करने से रुपया मजबूत नहीं होगा। 2027 के चुनाव से पहले सरकार को इसका जवाब देना होगा। यदि हम वास्तव में ‘विश्वगुरु’ हैं, तो हमारा रुपया इतना बेबस क्यों है?
