मुख्यपृष्ठस्तंभतड़का: ‘योग दिवस' से आगे- स्वस्थ सोच भी जरूरी

तड़का: ‘योग दिवस’ से आगे- स्वस्थ सोच भी जरूरी

कविता श्रीवास्तव

आज २१ जून है और आज पूरी दुनिया ‘अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस’ मना रही है। योग की साधना शरीर, मन और आत्मा को संतुलित करने वाला अभ्यास है, जो हमें बेहतर इंसान बनने की दिशा में प्रेरित करता है। योग करने से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ती है। यह भारत की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत है। अब इसकी वैश्विक पहचान बन चुकी है, जो आज की तेज रफ्तार जिंदगी को तनावमुक्त और संतुलित रखने का रास्ता दिखा रही है। लेकिन दुनिया में आज केवल अच्छे स्वास्थ्य की गरज ही नहीं है। दुनिया के सामनेअनेक गंभीर चुनौतियां भी हैं। भारत में महंगाई, बेरोजगारी, साइबर अपराध, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते अपराध, पर्यावरण प्रदूषण, भ्रष्टाचार, सामाजिक असमानता, सांप्रदायिक तनाव और बढ़ता ध्रुवीकरण जैसी समस्याएं चिंताजनक हैं। वहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भू-राजनीतिक संघर्ष, युद्ध, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, आतंकवाद, आर्थिक संकट और महामारियों जैसी चुनौतियां हैं। इनमें से कुछ समस्याएं प्राकृतिक परिस्थितियों या वैश्विक राजनीतिक समीकरणों से जुड़ी हैं, लेकिन बड़ी संख्या में ऐसी समस्याएं भी हैं जिनकी जड़ इंसान की सोच, मानसिकता और नीयत में छिपी है। जब समाज में संवेदनशीलता कम होती है, स्वार्थ बढ़ता है और संवाद की जगह टकराव ले लेता है, तब कई सामाजिक समस्याएं जन्म लेती हैं। यहीं पर योग की प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। योग व्यक्ति के भीतर सकारात्मक सोच, आत्मनियंत्रण, धैर्य और संतुलन विकसित करता है। मानसिक रूप से स्वस्थ और संतुलित व्यक्ति समाज में नफरत नहीं, बल्कि सहयोग और सद्भाव का वातावरण बनाता है। इसलिए योग दिवस को केवल एक दिन के आयोजन तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि इसे जीवन के मूल्यों से जोड़ने की आवश्यकता है। आज जरूरत इस बात की भी है कि जिस तरह दुनिया योग दिवस को एक वैश्विक अभियान के रूप में मनाती है, उसी तरह मानवता, सामाजिक सद्भाव, पर्यावरण संरक्षण, नैतिकता और जिम्मेदार नागरिकता को बढ़ावा देने के लिए भी व्यापक जनजागरण अभियान चलते रहें। क्योंकि स्वस्थ समाज केवल अच्छे आधारभूत ढांचों या मजबूत अर्थव्यवस्था मात्र से नहीं बनता। वह तो अच्छे विचारों, संवेदनशील नागरिकों और सकारात्मक संस्कारों से ही बनता है। बच्चों, युवाओं, महिलाओं और बुजुर्गों की सुरक्षा केवल सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। यह तो पूरे समाज का दायित्व है। हमें ऐसी पीढ़ी तैयार करनी होगी जो नशाखोरी, हिंसा, कट्टरता और भेदभाव से दूर रहकर रचनात्मकता, नवाचार और मानवता के रास्ते पर चले। योग दिवस हमें यही संदेश देता है कि बदलाव की शुरुआत स्वयं से होती है। यदि व्यक्ति स्वस्थ, संतुलित और संवेदनशील बनेगा तो परिवार मजबूत होगा, समाज बेहतर बनेगा और राष्ट्र प्रगति करेगा।

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