मुख्यपृष्ठस्तंभवन अधिकार अधिनियम (FRA), २००६ दो दशकों के अधूरे वादे

वन अधिकार अधिनियम (FRA), २००६ दो दशकों के अधूरे वादे

संतोषी रावत

‘साहब, ये कागज का टुकड़ा जिसे तुम मुआवजा कहते हो, दो साल में खत्म हो जाएगा। लेकिन ये जमीन, ये जंगल… ये हमारी पीढ़ियों को पालते आए हैं और हमेशा पालेंगे। सरकार ने ही कानून बनाकर हमें ये हक दिया था, अब सरकार ही हमें हमारी जड़ों से क्यों उखाड़ रही है?’ ये है गढ़चिरौली के एक आंदोलनकारी आदिवासी युवक की गुहार।
भूमिका और वर्तमान संघर्ष
४ जून २०२६ को महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में आदिवासियों ने मेगा स्टील प्लांट, हवाई अड्डे और औद्योगिक टाउनशिप के लिए किए जा रहे भूमि अधिग्रहण के खिलाफ दो दिवसीय शांतिपूर्ण आंदोलन किया। प्रशासन द्वारा आम सहमति के बाद ही आगे बढ़ने के आश्वासन पर यह प्रदर्शन अस्थायी रूप से समाप्त हुआ। आदिवासियों के लिए भूमि ही आजीविका का एकमात्र साधन है। यह संघर्ष संसद द्वारा पारित ‘वन अधिकार अधिनियम, २००६’ (इRA)के बीस साल बाद भी राज्य सरकारों द्वारा आदिवासियों के अधिकारों की अनदेखी को उजागर करता है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और प्रगति
१९८० के दशक से औपनिवेशिक काल के कड़े वन कानूनों के खिलाफ संघर्ष चल रहा था, जो आदिवासियों को उनकी ही जमीन पर अपराधी बना देते थे। इसी ‘ऐतिहासिक अन्याय’ को सुधारने और ग्राम सभाओं को सशक्त बनाने के लिए इRA कानून लाया गया, जो २००८ में लागू हुआ। जनजातीय मामलों के मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले २० वर्षों में भूमि अधिकारों के लिए लगभग ५१.२३ लाख दावे प्राप्त हुए, जिनमें से लगभग ४८ प्रतिशत यानी २५.११ लाख को मंजूरी मिली और ८५ प्रतिशत दावों का निपटारा किया जा चुका है।
सफलता के मॉडल और क्षेत्रीय असमानता
महाराष्ट्र और ओडिशा ने सामुदायिक दावों के निपटारे में बेहतरीन काम किया है। गढ़चिरौली का मेंढा लेखा गांव देश में सामुदायिक वन अधिकार प्राप्त करने वाला पहला गांव बना। यहां की ग्राम सभा मुख्य रूप से बांस की कटाई के जरिए सालाना १ करोड़ रुपए का राजस्व कमाती है। इस आत्मनिर्भर मॉडल को विदर्भ के ३०० से अधिक गांवों ने अपनाया है।
इसके विपरीत, मध्य प्रदेश और तेलंगाना सामुदायिक सशक्तीकरण में पीछे हैं, जबकि गुजरात, राजस्थान, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में स्थिति और भी खराब है। यहां तक कि महाराष्ट्र के वर्धा जिले में अब तक एक भी सामुदायिक दावा स्वीकार नहीं हुआ है।
प्रमुख चुनौतियां
प्रशासनिक बाधाएं: लगभग ३० प्रतिशत दावों को अपर्याप्त सत्यापन, दस्तावेजों की अत्यधिक मांग और भ्रष्टाचार के कारण खारिज कर दिया गया। इसी सुस्ती के खिलाफ २०१८ में नासिक और पालघर के ५०,००० आदिवासी किसानों ने मुंबई तक ‘लॉन्ग मार्च’ निकाला था।
संरक्षण बनाम समुदाय: बाघ अभयारण्यों और राष्ट्रीय उद्यानों (जैसे छिंदवाड़ा और दक्षिण गोवा) में वन विभाग और स्थानीय समुदायों के बीच लगातार टकराव बना रहता है।
विकास की वेदी पर अधिकार
कॉर्पोरेट और मेगा-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स (जैसे बुलेट ट्रेन, वाधवन बंदरगाह, कोयला और बॉक्साइट खनन) के लिए राष्ट्रीय संपत्ति का हवाला देकर वन भूमि का जबरन अधिग्रहण किया जा रहा है। पालघर जैसे क्षेत्रों में विडंबना यह है कि आदिवासियों को इRA के तहत भूमि अधिकार मिलने के कुछ ही महीनों के भीतर सरकार उन्हें भूमि अधिग्रहण का नोटिस थमा देती है।
अधिनियम का उद्देश्य आदिवासियों को सशक्त करना और वनों का संरक्षण दोनों था। परंतु वर्तमान में विकास के नाम पर ऐतिहासिक वादों को तोड़कर आदिवासियों को उनकी ही पैतृक भूमि से बेदखल किया जा रहा है।

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