राजन पारकर
महाराष्ट्र की राजनीति का रंगमंच एक बार फिर सज चुका है। पर्दा वही है, कलाकार वही हैं, बस किरदारों की वफादारी के संवाद बदल गए हैं। कहीं कोई निष्ठा की दुहाई दे रहा है, कहीं कोई बगावत का झंडा उठा रहा है और दूसरी तरफ आम आदमी अपनी जेब का हिसाब लगाते हुए सोच रहा है कि आखिर इस राजनीतिक गर्मी में उसकी रसोई क्यों तप रही है? धाराशिव सांसद की शिवसेना से गद्दारी के बाद राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर जिनकी लोकप्रियता कभी तालियों की गूंज थी, वहीं अब सवालों की आवाजें सुनाई दे रही हैं। डिजिटल युग की यही खासियत है, यहां जनता सिर्फ पोस्ट नहीं पढ़ती, बल्कि हिसाब भी रखती है। कल तक जिन तस्वीरों पर हजारों लाइक बरसते थे, आज उन्हीं पोस्ट के नीचे नाराजगी के शब्द दिखाई दे रहे हैं। इस सांसद ने अपने पैâसले के पीछे की परिस्थितियों, निधि की कमी आदि का रोना रोया लेकिन राजनीति में जनता सिर्फ कारण नहीं सुनती, वह परिणाम भी देखती है। क्योंकि लोकतंत्र की अदालत में सबसे बड़ा फैसला जनता की उंगलियों से निकलता है।
‘गद्दारी की आग में रिश्तों और विरासत की जंग!’
शिवसेना उपनेता सुषमा अंधारे ने हिंगोली के सांसद के मामले में तीखा हमला बोला। दूसरी तरफ उनके बेटे की ओर से शिवसेनापक्षप्रमुख उद्धव ठाकरे के साथ खड़े होने का दावा भी सामने आया। अब राजनीति में सवाल यह है कि असली वारिस कौन और असली निष्ठा किसकी? महाराष्ट्र की राजनीति भी अजब खेल दिखाती है, कभी विचारधारा की तलवारें निकलती हैं, तो कभी सत्ता की शतरंज बिछती है। मोहरे बदलते हैं, लेकिन जनता सब देखती रहती है।
‘नेता बदल रहे पाले, जनता गिन रही दूध के पैसे!’
जब राजनीतिक गलियारों में जोड़-तोड़ का बाजार गर्म है, वहीं आम आदमी की रसोई में महंगाई की आग धीमी-धीमी जल रही है। दूध के दाम फिर बढ़ने की संभावना ने मध्यमवर्ग की चिंता बढ़ा दी है। चाय का कप, बच्चों का नाश्ता और घर का रोजमर्रा का खर्च, हर जगह बजट का गणित बिगड़ता दिखाई दे रहा है। राजनीति में कुर्सियों के समीकरण बदलने में नेता व्यस्त हैं, लेकिन आम आदमी के लिए असली सवाल वही है, महीने का खर्च कैसे संभले? ‘महाराष्ट्र की सियासत में निष्ठाएं अपना पता बदल रही हैं, सोशल मीडिया पर जनता अपनी नाराजगी लिख रही है और आम आदमी की रसोई में दूध का भगोना महंगाई की आंच पर चढ़ा हुआ है!’ क्योंकि लोकतंत्र के इस महान नाटक में नेता संवाद बदल सकते हैं, लेकिन जनता का हिसाब कभी नहीं बदलता।
