-डॉ. रवीन्द्र कुमार
अब यह नहीं पता कि क्या यह ‘मेरा बाप कौन है?’ सिंड्रोम भारत के बाहर भी किसी मुल्क में है या नहीं। हमारे देश में तो इस सिंड्रोम का खूब बोलबाला है। रोड से लेकर गली-मोहल्ले तक, पॉलिटिक्स हो या बिजनेस, यह बीमारी हमारे मुल्क में महामारी की हद तक फैली है। भारत यूँ भी मिडियॉकर्स (औसत दर्जे/साधारण) लोगों की धरती है। अतः पूरी पीढ़ी की श्रृंखला में अगर कोई एक औसत से थोड़ा ज़्यादा/साधारण से तनिक ऊपर रिश्तेदार हुआ होता है, तो पूरा का पूरा खानदान उसी के पुण्य-प्रताप से जाना जाता है। वे यह सुनिश्चित करते हैं कि फलाँ ‘महान’ आत्मा उनके ही रिश्तेदार, बाप, चाचा, ताऊ, मामू, भाई, भतीजे-भांजे हैं, अतः उनका भी कुछ-कुछ महान होना तो बनता ही है। सेम-सेम डी.एन.ए., यू सी! (डी.एन.ए. की कोई ‘वैल्यू’ है या नहीं?) फिर ‘वो’ रिश्तेदार कितना ही दूर का हो या आपको मुँह भी नहीं लगाता हो, यह आपकी प्रतिभा है कि उसे आप नज़दीक, एकदम नज़दीक ले आएँ, ताकि मुँह से मुँह लग जाए।
इसे दूसरे शब्दों में ‘रिफ्लेक्टेड ग्लोरी’ कहते हैं। जिन्हें नहीं मालूम, उनकी मालूमात के लिए बता दूँ कि जैसे चंद्रमा की अपनी कोई रोशनी नहीं होती, वह सूरज की रोशनी से चमकता फिरता है। कुछ यही हाल इन लोगों का होता है। वे गाहे-बगाहे, जगह-जगह इसी मंत्र का जाप करते रहते हैं। इसमें वे कुछ सच्चे-झूठे किस्से भी जोड़ लेते हैं। उन किस्सों में मुख्य पात्र वे खुद अथवा उनके ये बाबा, जीजाजी, चाचा-भतीजे होते हैं। वे सभी ‘सक्सेस स्टोरीज़’ होती हैं, जिनमें वे खुद अथवा उनका ही अपना ‘वो’ जन्मजात हीरो बनकर निकलता है। यह बड़ी सुखद स्थिति होती है। यह भारत में बड़े काम की चीज़ है। आप यहाँ-वहाँ उनके नाम की जुगाली करते फिरते हैं। इसे अंग्रेज़ी में ‘नेम ड्रॉपिंग’ कहते हैं।
दरअसल! गलती उनकी भी नहीं। शेक्सपियर बहुत पहले कह गए थे—
सम आर बॉर्न ग्रेट, सम अचीव ग्रेटनेस, सम हैव ग्रेटनेस थ्रस्ट अपॉन देम।
तो ये इसी तीसरी किस्म के ग्रेट होते हैं। अब अगर उनका जीजा, साला, भाई-भतीजा ग्रेट है, तो है। इससे उनका रुतबा कम तो नहीं हो जाता। अब अगर समझो किसी का यही भाई-भतीजा भयंकर वाला अपराधी, कातिल या स्मगलर निकल जाए, तो लोग सब पता लगा लेते हैं, आप बताएँ या नहीं। उसी प्रकार अगर उनके ‘वो’ बड़े आदमी बन गए, तो इसका कुछ क्रेडिट तो उनको भी दिया जाना चाहिए। यह सब डर और ज़रूरतों का कारोबार है। डर यह कि अगर आपने उनका काम नहीं किया या उनका चालान कर ही दिया, तो देख लें, हमारे ‘वो’ आपका क्या हाल करेंगे। दूसरे, अगर आप हमें छोड़ देते हैं/हमारी मदद करते हैं, तो कल को हम आपका काम भी अपने ‘वो’ से कहकर हाथों-हाथ करवा देंगे। मुंबई में रेलवे वाले कहा करते हैं कि एक बार को ट्रैफिक पुलिस भी यह जानकर कि वे रेलवे में हैं, फोन नंबर के आदान-प्रदान के बाद छोड़ देती है। यह वादा लेकर कि अगली बार ट्रेन में वी.आई.पी. कोटे से उनकी बर्थ पक्की है। अब अपने बाहर-गाँव कौन नहीं जाना चाहता। सीट की मारा-मारी/सरगर्मी, गर्मी की छुट्टियाँ पड़ते ही हर साल होनी ही है। यह पचास साल पहले भी थी, आज भी है।
आपको ऐसे लोगों पर दया करनी चाहिए कि उसके पास सिवाय यह कहने के और कुछ भी नहीं। न अपनी लियाकत, न अपना नाम। उसकी योग्यता ही यह है कि वह आपका भाई-भतीजा है। उसकी रोज़ी-रोटी, प्रतिष्ठा या तीनों आपके नाम से ही चल रही हैं। मैंने एक समारोह में शिरकत की, जिसमें नामी फिल्म अभिनेता नहीं आ पाया, तो भाई लोग उसकी बहन को ही ले आए। वह बेचारी सीधी-सादी गृहिणी समारोह की चीफ गेस्ट बनी और बचपन से लेकर अब तक के कुछ असली, कुछ मनगढ़ंत किस्से सुनाती रही, जिससे दर्शकों को यह पता चले कि ‘एक्टिंग’ उसमें जन्म से ही थी। कैसे वह रोता भी फुल-फुल एक्टिंग के साथ था। ये बेचारे ‘मेरा बाप कौन है?’ सिंड्रोम से ग्रस्त लोग भी ऐसे ही होते हैं। इनमें यह प्रतिभा होती है कि कौन-सी कहानी, कौन-सी लघुकथा, कौन-सा प्रकरण कहाँ डालना है। जो कहीं उनका सुरक्षा कर्मी या उनकी गाड़ी मिल जाए, तो उस दिन वे शहर में अपने किसी काम को नहीं छोड़ते। यहाँ जा, वहाँ जा। इससे मिल, उससे मिल। अतः आपसे निवेदन है कि ऐसे लोगों की हँसी न उड़ाएँ। उनका मज़ाक न बनाएँ, उनके साथ सहानुभूति रखें। वह कहावत है न कि अगर आपकी कुल जमा संपत्ति एक अदद हथौड़ा मात्र है, तो आपको हर चीज़ कील दिखने लगती है। तो उनके पास यही एक अदद हथौड़ा ही तो है। आप उनसे यह भी छीन लेना चाहते हैं। शेक्सपियर, जो रोमियो एंड जूलियट में पूछते हैं, “व्हाट्स इन अ नेम…” गुलाब को किसी भी नाम से पुकारो, उसकी खुशबू वही रहनी है। वही शेक्सपियर खुद ऑथेलो में कहते हैं— “मेरे पास एक नाम ही तो है।”
