रवीन्द्र मिश्रा / मुंबई
रेलवे की जादुई स्याही यानी थर्मल प्रिंटर से तैयार किए गए रेलवे टिकट या मासिक पास बरसात के दिनों में रेल यात्रियों के लिए परेशानी का कारण बन रहे हैं।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, नालासोपारा में रहने वाले एक रेल यात्री ने वैतरणा, चर्चगेट तथा मुंबई सीएसटी का त्रैमासिक पास बनवाया था। स्टेशन से घर पहुंचते समय रास्ते में जोरदार बरसात हुई। इस बरसात में उसका त्रैमासिक पास भीग गया। जब वह घर जाकर उसे सुखाया, तो उसके पास पर छपा पूरा प्रिंट गायब हो गया था। उस टिकट पर सिर्फ पास का नंबर ही नजर आ रहा था। थर्मल प्रिंट की वजह से यात्रा संबंधी सभी जानकारियां छू-मंतर हो गई थीं।
इस परेशानी को लेकर वह यात्री नालासोपारा टिकट कार्यालय गया, जहां से उसने टिकट निकाला था। वहां बैठे वरिष्ठ अधिकारी ने उस यात्री की मदद करते हुए उसे कागज की रसीद वाला डुप्लीकेट टिकट दिया और कहा कि अब वह इस डुप्लीकेट टिकट पर यात्रा कर सकता है। अधिकारी ने उसे यह भी सुझाव दिया कि भविष्य में इससे बचने के लिए वह डिजिटल टिकट का भी इस्तेमाल कर सकता है।
रेल यात्रियों का कहना है कि पहले रिबन इंक वाले प्रिंटर से निकाले गए टिकट या पास की स्याही पसीने या पानी से भीगने पर खराब नहीं होती थी। लेकिन जब से रेलवे ने थर्मल प्रिंट व्यवस्था शुरू की है, तब से रेल यात्रियों को समय-समय पर इस समस्या का सामना करना पड़ रहा है। पहले वे लाइन में लगकर टिकट या पास खरीदते हैं, फिर पानी या पसीने से धुल जाने वाली इस जादुई स्याही की वजह से टीटीई के हाथों अपमानित होना पड़ता है। इसके बाद यात्री को दोबारा बुकिंग कार्यालय का चक्कर काटना पड़ता है, जहां से वह डुप्लीकेट रसीद लेकर यात्रा करने को मजबूर होता है। इस पूरी प्रक्रिया में रेल यात्रियों के साथ-साथ रेलवे कर्मचारियों का समय भी बर्बाद होता है।
