-गांवों में मौतें रोकने के लिए कागज नहीं, जमीन पर चाहिए इलाज की गारंटी
राजन पारकर / मुंबई
बरसात शुरू होते ही महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में सर्पदंश का खतरा एक बार फिर सिर उठाने लगा है। किसान, खेत मजदूर, आदिवासी और जंगल क्षेत्र में रहने वाले नागरिक आज भी जहरीले सांपों के डर के बीच जीवन जीने को मजबूर हैं। इसी गंभीर मुद्दे पर विधानसभा में सरकार से सवाल पूछे गए, जिसके जवाब में स्वास्थ्य विभाग ने योजनाओं और व्यवस्थाओं का पूरा ब्यौरा पेश किया।
विधायक विक्रम पाचपुते, डॉ. तुषार राठोड और अनिल मंगुळकर ने सरकार को घेरते हुए कहा कि सर्पदंश केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि ग्रामीण महाराष्ट्र के लिए गंभीर स्वास्थ्य संकट है। समय पर एंटी स्नेक वेनम नहीं मिलना, प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी और अस्पतालों तक पहुंचने में देरी के कारण कई परिवारों को अपने लोगों की जान गंवानी पड़ती है।
स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश आबिटकर ने विधानसभा में बताया कि सरकार ने सर्पदंश नियंत्रण के लिए जिला स्तर पर एक्शन प्लान तैयार किया है। डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मचारियों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है तथा सरकारी अस्पतालों में एंटी स्नेक वेनम (ASV) उपलब्ध रखने के निर्देश दिए गए हैं।
लेकिन सवाल यह है कि सरकारी फाइलों में मौजूद व्यवस्था क्या सचमुच गांव की आखिरी चौखट तक पहुंच रही है? क्योंकि कई बार सरकारी घोषणाएं होती हैं, लेकिन जब किसान को रात के अंधेरे में सांप काटता है, तब उसे समय पर इलाज मिलना ही असली परीक्षा होती है।
स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, ग्रामीण अस्पताल और उपजिला अस्पतालों में ASV उपलब्ध कराया गया है। गंभीर मरीजों को जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज में भेजने की व्यवस्था है। 108 एंबुलेंस सेवा के माध्यम से भी तत्काल मदद उपलब्ध कराने का दावा किया गया है।
सरकार ने यह भी कहा कि सर्पदंश को लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में अंधविश्वास दूर करने और जागरूकता बढ़ाने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं। डॉक्टरों, नर्सों, आशा कार्यकर्ताओं और स्वास्थ्य कर्मचारियों को उपचार पद्धति का प्रशिक्षण दिया गया है।
लेकिन महाराष्ट्र की जनता का सीधा सवाल है—
हर साल सर्पदंश से होने वाली मौतों का आंकड़ा कब कम होगा? गांव-गांव में समय पर इलाज की व्यवस्था कब पूरी तरह मजबूत होगी?
सर्पदंश पर सिर्फ बैठकें और आदेश नहीं, बल्कि हर ग्रामीण नागरिक के जीवन की सुरक्षा की ठोस गारंटी चाहिए। यही असली स्वास्थ्य व्यवस्था की कसौटी है।
