सैयद सलमान / मुंबई
देश के सामाजिक और राजनीतिक माहौल में जब भी कोई गहरा बदलाव आता है, उसकी सबसे पहली सुगबुगाहट युवाओं के रुख में ही दिखाई देती है। बीते कुछ वर्षों में धर्म और पहचान के इर्द-गिर्द घूमती सियासत ने आम इंसान और उसकी रोजमर्रा की जीवन शैली को खासा प्रभावित किया है।
साझीदारी
इस लगातार तनाव और ध्रुवीकरण से समाज में एक तरह की उदासीनता और सांप्रदायिक दूरी साफ महसूस होने लगी थी। ऐसे समय में जब लोग इस माहौल से बाहर निकलने की राह तलाश रहे हैं, देश की नई पीढ़ी यानी ‘जेन-ज़ी’ के हालिया आंदोलनों और उनकी सोच ने एक बड़ी राहत दी है। यह पीढ़ी पुरानी नफरतों या राजनीतिक नारों को स्वीकार करने के बजाय तर्क, काम और व्यावहारिक सोच को तरजीह दे रही है।
इस पूरे बदलाव में जेन-जी के उस आंदोलन की भूमिका बेहद अहम रही है, जिसने देश के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। जंतर-मंतर के विरोध प्रदर्शनों से लेकर मुंबई की सड़कों तक, युवाओं ने जिस बेबाकी से अपने आंदोलन के बीच तकनीक, कला और सामाजिक मुद्दों पर आवाज उठाई है, उसने देश के सामने एक नई मिसाल पेश की है। आज का युवा पहचान के संकीर्ण दायरों में घुटकर रहने को तैयार नहीं है। इस आंदोलनकारी सोच की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें मुस्लिम समाज के युवाओं की आवाज भी पूरी मजबूती और बराबरी के साथ गूंज रही है।
मुस्लिम समाज का युवा अब खुद को केवल किसी राजनीतिक नैरेटिव या पीड़ित के रूप में देखने से इनकार कर रहा है। वह अपनी पहचान के साथ आगे आकर शिक्षा, सामाजिक न्याय और सिविल राइट्स जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रख रहा है। जब जंतर-मंतर पर या देश के किसी भी हिस्से में छात्र और युवा सड़कों पर उतरते हैं, तब वहां मुस्लिम युवाओं की मौजूदगी सिर्फ उनकी भागीदारी भर नहीं होती, बल्कि वे सोच और नेतृत्व के स्तर पर भी कंधे से कंधा मिलाकर साथी युवाओं के साथ खड़े दिखाई देते हैं। नई पीढ़ी इस बात को बखूबी समझती है कि उनके हक और उनकी तरक्की देश के व्यापक लोकतांत्रिक ढांचे और आपसी भाईचारे से अलग होकर नहीं सोची जा सकती।
मूल ताकत
मुस्लिम समाज के दृष्टिकोण से देखें तो जेन-जी के इस संयुक्त उभार ने एक गहरे सुकून और भरोसे का अहसास कराया है। बरसों से पैâलाए जा रहे डर और अलगाव के माहौल ने समाज के बीच जो दूरियां बढ़ाई थीं, उन्हें यह नई पीढ़ी अपने साझा संघर्षों और विचारों से मिटा रही है। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक समाज के युवा अब एक साथ बैठकर नई तकनीक, स्टार्टअप्स और अधिकारों की लड़ाई पर काम करते हैं। इसका फायदा यह होगा कि इससे आपसी भाईचारे की एक नई और मजबूत बुनियाद बनने में मदद मिलेगी। यह महज राजनीतिक दिखावा न होकर, एक साथ मिलकर बेहतर भविष्य गढ़ने की सच्ची कोशिश है।
भारत की मूल ताकत हमेशा से उसका सर्वसमावेशी लोकतंत्र और उसकी मिली-जुली संस्कृति ही रही है। इतिहास गवाह है कि देश जब भी आगे बढ़ा है, समाज के हर वर्ग की साझी भागीदारी से ही बढ़ा है। जेन-जी का आंदोलन और मुस्लिम युवाओं की उसमें मुखर उपस्थिति इस बात का सबूत है कि पुरानी कड़वाहट के बल पर कोई आधुनिक देश नहीं बन सकता। आज का युवा नफरत के खेल को खारिज कर रहा है। वह सवाल पूछ रहा है, तर्क कर रहा है और अपनी रचनात्मकता से एक नया रास्ता बना रहा है।
याद रहे, किसी भी समाज का भविष्य इस बात से तय होता है कि उसकी नई नस्ल कितनी दूरदर्शी है। जेन-जी का यह तार्किक और जुझारू नजरिया सिर्फ एक आंदोलन नहीं है। यह देश के सामाजिक ताने-बाने को दुरुस्त करने की दिशा में उठाया गया एक बड़ा कदम है। जब युवा दिमाग हिंदू और मुस्लिम के चश्मे को उतारकर सीधे देश, इंसानियत और तरक्की के बारे में सोचने लगता है तो सियासत को भी अपनी पुरानी आदतें बदलनी ही पड़ती हैं।
समझ की जीत
जेन-जी आंदोलन के बाद आज देश जिस मोड़ पर खड़ा है, वहां नफरत की सियासत का असर कम होता दिख रहा है। आंदोलनों में शामिल इन युवाओं की नई सोच ने यह साबित कर दिया है कि भारत का भविष्य बांटनेवाली ताकतों के हाथों में नहीं बल्कि उन हाथों में सुरक्षित है, जो साथ मिलकर कुछ नया रचने का हौसला रखते हैं। यह बदलाव किसी एक समाज की जीत नहीं, बल्कि पूरे भारतीय समाज की उस साझी समझ की जीत है, जो हर दौर में नफरत को पछाड़कर मोहब्बत, बराबरी और तरक्की का रास्ता चुनती आई है। मुस्लिम समाज को इसी सिरे को थाम कर आगे बढ़ने की जरूरत है।
(लेखक मुंबई विश्वविद्यालय, गरवारे संस्थान के हिंदी पत्रकारिता विभाग में समन्वयक और देश के प्रमुख प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं।)
