पंडित मेवालाल, गायत्री धाम सेंधवा द्वारा चांद्रायण व्रत के आध्यात्मिक, शारीरिक और मानसिक महत्व पर प्रकाश डाला गया है। यह मात्र उपवास नहीं, बल्कि जीवन को परिष्कृत करने और प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करने की एक उच्च स्तरीय ‘कल्प साधना’ मानी जाती है।
चांद्रायण व्रत क्या है?
चांद्रायण व्रत एक उच्च स्तरीय आध्यात्मिक साधना है, जिसे आत्मशोधन, आत्मनिर्माण, आत्मजागरण और आत्मकल्याण का सर्वोत्तम मार्ग माना गया है। जैसे शिक्षा के क्षेत्र में प्राथमिक स्तर से लेकर स्नातकोत्तर तक के चरण होते हैं, वैसे ही अध्यात्म में चांद्रायण व्रत को बहुत उच्च स्तर की साधना माना जाता है। यह मनुष्य के कुसंस्कारों और अज्ञानता के आवरण को हटाकर उसके अंतर्जगत का निर्माण करता है।
साधना का आरंभ: प्रायश्चित और प्रकटीकरण
इस अनुष्ठान की शुरुआत सीधे उपवास से नहीं, बल्कि ‘प्रायश्चित’ से होती है।
आत्मसमीक्षा: साधक अपने अतीत की गलतियों, दुर्गुणों और कुसंस्कारों को स्वीकार करता है।
गुप्त पापों का प्रकटीकरण: साधक अपने भीतर छिपे वैचारिक और मानसिक दोषों को कागज पर लिखकर जल में प्रवाहित कर देता है या अपने इष्ट एवं गुरु को समर्पित कर देता है, ताकि मन पर पड़ा अपराधबोध समाप्त हो सके। इससे नए जीवन की शुरुआत मानी जाती है।
चांद्रायण व्रत के प्रमुख प्रकार
चंद्रमा की कलाओं के घटने और बढ़ने के आधार पर महर्षियों ने आहार ग्रहण करने की विशेष विधियां बताई हैं।
1.पिपीलिका चांद्रायण: यह पूर्णिमा से शुरू होकर अगली पूर्णिमा तक चलता है। इसमें पूर्णिमा के दिन अन्न के 15 ग्रास लिए जाते हैं। इसके बाद हर दिन एक ग्रास कम करते हुए अमावस्या को पूर्ण उपवास रखा जाता है। फिर प्रतिदिन एक ग्रास बढ़ाते हुए अगली पूर्णिमा तक 15 ग्रास पर वापस आया जाता है।
2.यव मध्य चांद्रायण: यह अमावस्या से शुरू होकर पूर्णिमा तक बढ़ते क्रम में चलता है और फिर पूर्णिमा से अमावस्या तक घटते क्रम में आता है।
3.यति चांद्रायण: इसमें एक ही समय में भोजन का आधा हिस्सा, जैसे 7-8 निवाले, ग्रहण किए जाते हैं।
4.शिशु चांद्रायण: इसमें शिशु की भांति दिन में दो बार थोड़ा-थोड़ा भोजन लिया जाता है, जैसे सुबह चार निवाले और शाम को चार निवाले।
आहार और संयम
चांद्रायण व्रत में सामान्य भोजन के बजाय ‘हविष्य अन्न’ ग्रहण किया जाता है। भोजन में नमक, शक्कर, मिर्च-मसाले, प्याज और लहसुन का पूर्णतः त्याग किया जाता है। जौ का दलिया, मूंग की पतली दाल, गाय का घी, छाछ, लौकी या उबली हुई सब्जियां ग्रहण की जाती हैं। अमावस्या के दिन साधक पूर्ण उपवास, मौन और एकांतवास का पालन करता है।
उपासना और स्वाध्याय
यह केवल भूखे रहने का व्रत नहीं, बल्कि मन और बुद्धि को भी आध्यात्मिक खुराक देने का समय है। इस अवधि में गायत्री महाविज्ञान और उच्च स्तरीय आध्यात्मिक ग्रंथों का प्रतिदिन 4-5 घंटे नियमित अध्ययन करने की बात कही गई है। निर्धारित संख्या में गायत्री मंत्र का जप भी किया जाता है, जैसे सवा लाख मंत्रों का अनुष्ठान या प्रतिदिन 42 माला।
व्रत के त्रिविध परिणाम
इस कल्प साधना का प्रभाव स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर पर पड़ने की बात कही गई है।
1.स्थूल शरीर: शरीर के पुराने रोग, कब्ज और विषाक्त तत्वों के बाहर निकलने तथा शरीर के हल्का होने की बात कही गई है। इस प्रक्रिया में 10 से 18 किलोग्राम तक वजन कम होने का भी उल्लेख किया गया है। व्यक्ति कर्मयोगी के रूप में निखरता है।
2.सूक्ष्म शरीर: व्यक्ति के भीतर सद्ज्ञान की वृद्धि होती है और ज्ञान-पिपासा बढ़ती है। इससे वह ज्ञानयोगी के रूप में विकसित होता है।
3.कारण शरीर: दुर्भावनाएं मिटकर शुद्ध भावना और श्रद्धा जाग्रत होने की बात कही गई है। व्यक्ति गीता के सच्चे भक्तियोगी के स्तर तक पहुंचने का प्रयास करता है।
निष्कर्ष
मान्यता के अनुसार, शुरुआत के पांच दिनों में शरीर और मन साधना के प्रति प्रतिरोध कर सकते हैं। नींद आना या साधना छोड़ने का मन करना जैसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। धैर्य बनाए रखने पर यह व्रत साधक के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला माना गया है।
अंत में अर्जित ज्ञान और ऊर्जा को समाज कल्याण, ग्राम प्रदक्षिणा और युग निर्माण के कार्यों में लगाना इस साधना की वास्तविक पूर्णाहुति मानी गई है। चांद्रायण व्रत को जीवन में एक बार अवश्य करने की प्रेरणा दी गई है, ताकि मनुष्य मृत्यु से पूर्व अपने भीतर के शिवत्व और बुद्धत्व का अनुभव कर सके।
पंडित मेवालाल
सेंधवा गायत्री धाम, मध्यप्रदेश
