मुख्यपृष्ठस्तंभकुंवारा बाप महमूद की पोलियो पर पुकार!

कुंवारा बाप महमूद की पोलियो पर पुकार!

हनीफनामा : हनीफ जवेरी

फिल्में केवल मनोरंजन का साधन नहीं होतीं, बल्कि समाज को आईना दिखाने और लोगों तक महत्वपूर्ण संदेश पहुंचाने का एक प्रभावशाली माध्यम भी होती हैं। कई फिल्मों ने अपने विषय, कहानी और किरदारों के जरिए सामाजिक बुराइयों, मानवीय संवेदनाओं और जागरूकता से जुड़े मुद्दों को बड़े प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है।
६० के दशक में हास्य अभिनेता महमूद की जिंदगी में ऐसी घटना घटी, जिसकी कल्पना उन्होंने ख्वाब में भी नहीं की थी। दुनिया को हंसाने वाला महमूद खुद रोने पर मजबूर हो गया और अपनी लापरवाही पर अफसोस करता रह गया। जिंदगी के अनुभव ने उन्हें ऐसा सबक सिखाया कि उन्होंने दुनिया को सीख देने के लिए एक फिल्म ही बना डाली। हुआ यूं था कि उनके घर तीसरी संतान के रूप में पुत्र मकदूम अली का जन्म १३ जुलाई १९६० के रोज उस समय हुआ, जब उनकी गृहस्थी में काफी उतार-चढ़ाव चल रहा था। पत्नी मधु और उनके बीच आए दिन झगड़े होने लगे थे। तीसरी संतान के जन्म के समय उन्हें यह आशा थी कि इस बार पुत्री का जन्म होगा, लेकिन तीसरी संतान भी बेटा ही हुआ, जिसके कारण वे भीतर ही भीतर निराश हो गए। अत्यधिक व्यस्तता के चलते वे अपनी नवजात संतान को समय नहीं दे पा रहे थे। मकदूम अली उर्फ मैकी मात्र तीन महीने का था, तभी अचानक उसे तेज बुखार आ गया। वह आंखें तक नहीं खोल पा रहा था। महमूद अपने भाई उस्मान अली और ड्राइवर यूसुफ के साथ बच्चे को लेकर ब्रीच वैंâडी अस्पताल पहुंचे। वहां से उन्हें बॉम्बे हॉस्पिटल ले जाने के लिए कहा गया। उस दिन बच्चों के इन्क्यूबेटर में तकनीकी खराबी आ गई थी, इसलिए वे तीनों तुरंत बच्चे को लेकर सर जे.जे. हॉस्पिटल पहुंचे। डॉ. उदानी ने बच्चे की जांच करने के बाद बताया कि उसे पोलियो हो गया है। महमूद ने अपनी जीवनी महमूद:अ मैन ऑफ मेनी मूड्स में लिखा है, ‘मैंने पहली बार ‘पोलियो’ शब्द सुना था।’ जब महमूद ने डॉक्टर से पोलियो के बारे में जानना चाहा, तो डॉक्टर ने उन्हें डांटते हुए इस खतरनाक बीमारी के बारे में विस्तार से बताया। यह सुनकर महमूद के तो होश ही उड़ गए। महमूद ने इलाज में किसी तरह की कोई कसर नहीं छोड़ी। दवा के साथ-साथ वे दुआ भी करते रहे। वली करमली दरवेश की चौखट पर माथा टेककर वे रो-रोकर बस यही दुआ मांगते रहे कि मैकी पूरी तरह स्वस्थ हो जाए। लेकिन मैकी एक अपाहिज बनकर रह गया।
जब ११ साल के मैकी को महमूद ने बैसाखी के सहारे चलते देखा, तो उनके मन में खयाल आया कि क्यों न ऐसी फिल्म बनाई जाए, जिसके माध्यम से आम जनता को यह संदेश दिया जा सके कि पोलियो कितनी खतरनाक बीमारी है, और उससे बचने के लिए क्या-क्या सावधानियां जरूरी हैं। उन्होंने लेखक अजीज वैâसी को मैकी के जन्म से लेकर वह सारी घटनाएं बतार्इं, वैâसे डॉ.उदानी ने उन्हें डांटा, वैâसे मैकी का स्कूल में हंगामा करके दाखिला करवाया गया था और किस तरह वे दरगाह में जाकर बेटे के लिए दुआ मांगते थे?
इन्हीं घटनाओं के आधार पर लेखक ने कहानी लिखी, जिस पर मैकी को लेकर ही फिल्म कुंवारा बाप बनाई गई। दरगाह में जाकर दुआ मांगने वाले दृश्य को भोलेनाथ के मंदिर के रूप में दिखाया गया, क्योंकि फिल्म का विषय हिंदू बैकग्राउंड में स्थापित किया गया था। डॉ. उदानी का किरदार संजीव कुमार को दिया गया, जिन्होंने डॉ. उदानी के अंदाज में ही महमूद को फटकार लगाई। फिल्म के विषय की अहमियत को समझते हुए धर्मेंद्र, हेमा मालिनी, अमिताभ बच्चन, संजीव कुमार और योगिता बाली ने बिना किसी मेहनताने के फिल्म में अतिथि भूमिकाएं निभार्इं। लेकिन अफसोस कि भारत सरकार ने इस फिल्म को टैक्स प्रâी करने में काफी लंबा समय लगा दिया और महमूद को कोई पुरस्कार भी नहीं मिला।

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