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रोखठोक : कैलाश-मानसरोवर…बिगड़े हुए स्वर्ग के द्वार…

संजय राऊत

नेपाल-तिब्बत मार्ग से कैलाश-मानसरोवर के लिए निकले सैकड़ों श्रद्धालुओं का दुखद अंत हो गया है। भारत से कई हिंदुओं के जत्थे वहां गए थे, जो तिब्बत सीमा पर स्थित इमिग्रेशन सेंटर पर पानी के तेज बहाव में बह गए। मुंबई-ठाणे के यात्री भी उनमें शामिल हैं। इन सभी का अस्तित्व ही समाप्त हो गया है और भारत में उनके परिजन विलाप कर रहे हैं। वे अपने लापता परिजनों को खोजने की कोशिश कर रहे हैं। तिब्बत के रास्ते पानी का एक विशाल सैलाब उमड़कर आया और उसमें हजारों ‘जीव’ हमेशा के लिए बह गए। नेपाल पूरी तरह ‘तबाह’ हो गया है। कभी हिंदू राष्ट्र रहे इस देश के देवता, उनके मंदिर हजारों भक्तों के साथ बह गए। नेपाल की धरती पर स्थित धार्मिक शक्तिपीठ भी इस रौद्र रूप को रोक नहीं पाए। कैलाश पर भगवान शंकर का वास है, ऐसी मान्यता है। उन भगवान शंकर ने पानी का तांडव देखा, अपने भक्तों को डूबते हुए बहते देखा। भारत में मोदीछाप हिंदुत्व का बुखार बढ़ा हुआ है। जो बह गए उनमें कुछ अंधभक्त भी हो सकते हैं, क्योंकि कैलाश पर ईश्वर का वास है और वही स्वर्ग का द्वार है, ऐसा आज भी कई लोग मानते हैं। वे सभी लोग दुर्भाग्य से स्वर्ग के द्वार से ही गायब हो गए।
पृथ्वी का मूल
कैलाश-मानसरोवर का आकर्षण हिंदू हृदय में कई सदियों पुराना है। पुराणों और संस्कृत काव्यों में दोनों का सुंदर वर्णन किया गया है। कैलाश को पृथ्वी का मूल भी माना जाता है। राजहंस पक्षी जैसा स्वर्ग में है, वैसा ही वह मानसरोवर पर भी है। इस कारण इस स्थान का आकर्षण और भी बढ़ गया है। सैकड़ों वर्षों से श्रद्धालु हिंदू इन दोनों की यात्रा कर रहे हैं, लेकिन यह यात्रा आसान नहीं है। भारतीयों को जिस स्वर्ग शिखर पर पहुंचना है, उसका दरवाजा चीन की भूमि से होकर जाता है। नेपाल, तिब्बत, चीन और फिर वैâलाश-मानसरोवर, ऐसा यह कठिन सफर है और फिर स्वर्ग। चीन ने लंबे समय तक भारतीयों के लिए स्वर्ग के ये दरवाजे बंद ही रखे थे इसलिए कई वर्षों तक लोग स्वर्ग के सुख से वंचित रहे। १९६२ के भारत-चीन युद्ध के बाद यह रास्ता भारतीयों के लिए पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। अप्रैल १९८१ में डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने चीन के तत्कालीन सर्वोच्च नेता डेंग शियाओपिंग से मुलाकात की और उन्हें समझाया कि वैâलाश-मानसरोवर का मार्ग चीन को भारतीयों के लिए खोलना चाहिए। डेंग ने स्वामी की मांग मान ली और १९८१ से कैलाश-मानसरोवर यात्रा शुरू हुई। यह मार्ग खुलने के बाद यात्रियों के पहले जत्थे का नेतृत्व डॉ. स्वामी ने ही किया था। यह मार्ग कठिन है। इस मार्ग से ट्रेकिंग के लिए कुशल पर्वतारोहियों की जरूरत पड़ती है। जब डॉ. स्वामी पहले जत्थे का नेतृत्व करते हुए वैâलाश यात्रा पर निकले, तब उनके मित्रों और विरोधियों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उनकी पत्नी और दो छोटी बेटियों से कहा गया कि इस रास्ते से गया व्यक्ति वापस नहीं आता। ‘‘कैलाश मार्ग पर मरना पुण्य है’’ ऐसा एक भाजपा सांसद ने मजाक में डॉ. स्वामी से कहा, तो स्वामी हंसते हुए बोले, ‘‘वाह! अगर कैलाश मार्ग पर मरना पुण्य है तो मुझे आश्चर्य है कि भाजपा या आरएसएस का एक भी नेता आज तक कैलाश यात्रा पर क्यों नहीं गया? शायद वहां मुस्लिम नहीं हैं और गिराने के लिए मस्जिद भी नहीं है!’’ भाजपा मुस्लिम-विरोधी है, पर हिंदू नहीं। इसलिए उनके लिए कैलाश का राजनीतिक रूप से कोई महत्व नहीं है। शायद इसी कारण भाजपा के लोग उरी, पुलवामा, पहलगाम में हुए हमलों में मारे गए हिंदुओं के लिए आक्रोश जताते दिखे। वह राजनीतिक आक्रोश था, लेकिन वैâलाश-मानसरोवर के यात्री बह गए, तो उस पर वे सिर्फ नि:शब्द हैं। प्रधानमंत्री मोदी ताशकंद में हैं, सरसंघचालक भागवत अमेरिका में हैं, तो अमित शाह ‘गायब’ हैं।
यूरोपीय जिज्ञासा
वैâलाश पहुंचने के लिए तिब्बत के रास्ते जाना पड़ता है। तिब्बत में बौद्ध मंदिर, गुफाएं हैं। लामाओं ने यहां बौद्ध धर्म को एक अलग आध्यात्मिक रूप दिया है, फिर भी उनका धर्म बौद्ध ही है। इसलिए दुनियाभर के बौद्ध तिब्बत की यात्रा करते हैं। एवरेस्ट सबसे ऊंचा शिखर है, लेकिन कैलाश पर्वत को हिंदुओं ने हमेशा पवित्र माना है। कैलाश पर ‘महादेव’ हैं, ऐसी उनकी श्रद्धा है, लेकिन वैâलाश, मानसरोवर और तिब्बत का भूगोल की दृष्टि से अध्ययन कर वैज्ञानिक रूप से नक्शे तैयार करने और वहां पहुंचने का मार्ग खोजने का काम यूरोपियन लोगों ने किया। हिंदुओं और बौद्धों को धार्मिक आकर्षण था, तो पाश्चात्यों को वैज्ञानिक ज्ञान की जिज्ञासा थी। हालांकि, सबसे पहले जो यूरोपीयन तिब्बत गए, वे भी धार्मिक आकर्षण के कारण ही गए थे। उन्हें हिंदू या बौद्ध धर्म का आकर्षण नहीं था, बल्कि ईसाई धर्मपीठ की खोज करना, क्या ईसाई संस्कृति दुनिया की इस छत पर मौजूद है? यह उन्हें देखना था। संभव हो तो तिब्बत में भी ईसाई धर्म का प्रचार करना उनका उद्देश्य था, लेकिन रिकॉर्ड बताते हैं कि सबसे पहले जो लोग तिब्बत पहुंचे, वे अकबर के कारण पहुंचे। अकबर को धर्म के प्रति जिज्ञासा थी। तिब्बत के आगे-पीछे क्या छिपा है, यह वह समझना चाहता था। उसने कुछ साधुओं को दरबार में बुलाया और वैâलाश, मानसरोवर, हिमालय के तीर्थक्षेत्रों के बारे में जानकारी ली। अकबर में भी वैâलाश, मानसरोवर को लेकर जिज्ञासा पैदा हुई। उसने भी १६०३ में एक अध्ययन दल तिब्बत की ओर भेजा, लेकिन वह दल वहां पहुंचने में असफल रहा। इसका अर्थ है कि केवल हिंदू ही कैलाश पर पहुंचने की कोशिश नहीं कर रहे थे, बल्कि ईसाई, इस्लाम, बौद्ध भी अपना रास्ता खोज रहे थे। १७१५ में लद्दाख के रास्ते इप्पोलितो देसिदेरी नामक एक युवा इतालवी मिशनरी तिब्बत पहुंचा। उसकी यात्रा बेहद कठिन थी। उस यात्रा में उसे एक तार्तार रानी अपने लाव-लश्कर के साथ ल्हासा की ओर जाती हुई दिखी। उसने उदार हृदय से देसिदेरी को अपने काफिले में शामिल कर लिया। वह भयंकर ठंड से ठिठुर न जाए इसलिए उसे विशेष गर्म कपड़े भी दिलवाए। यह काफिला पड़ाव दर पड़ाव चलता हुआ मानसरोवर के पास पहुंचा। वहां पड़ाव डाला गया। इस पड़ाव के दौरान उसे सिंधु और सतलज नदियों के उद्गम का पता चला। कैलाश-मानसरोवर का रास्ता और शिखर तक पहुंचने के लिए तब भी धैर्य, मजबूती, दृढ़ता, कष्ट सहने और किसी भी संकट का सामना करने की तैयारी की जरूरत पड़ती थी। भुखमरी और बीमारियों का सामना करना पड़ता था। कई बार डवैâतों के हमले होते थे और उनमें यात्रियों की जान चली जाती थी। ऑक्सीजन की कमी तो थी ही। तब आज की तरह साथ ले जाने के लिए ऑक्सीजन के छोटे सिलेंडर नहीं थे। आज वैâलाश तक पहुंचने के लिए कई सुविधाएं बन गई हैं, लेकिन प्रकृति जब नाराज होती है तो सब कुछ तबाह हो जाता है। वैसा ही अब हुआ।
कठिन यात्रा
कैलाश-मानसरोवर यात्रा के बाद मनुष्य अमर हो जाता है, यह एक किंवदंती है। वहां जाने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है। कैलाश ही स्वर्ग का दरवाजा है। जो वहां पहुंचे, वे स्वर्ग की यात्रा पर निकल गए। ईशा फाउंडेशन नामक आध्यात्मिक संस्था की ओर से इस बार ८० लोग कैलाश-मानसरोवर यात्रा पर गए, उनमें से ७७ लोग वापस नहीं आए। मुंबई-ठाणे आदि क्षेत्रों के और ३०-३५ लोग स्वर्ग की खोज में वैâलाश गए थे। वे भी नहीं लौटे। कहा जाता है कि जग्गी वासुदेव ने अपने भक्तों से कहा था, ‘‘कैलाश-मानसरोवर यात्रा करो। मैं तुम्हें अमरत्व दिलाऊंगा। कभी मृत्यु नहीं आएगी, इसकी गारंटी देता हूं।’’
तिब्बत के रास्ते पानी का एक विशाल सैलाब आया और अमरत्व कीचड़ में तड़पता हुआ बह गया।
जो मर गए, उनके परिजन शवों की तलाश में विलाप कर रहे हैं।
अमरत्व क्या होता है, वह तिब्बत के द्वार पर दिखाई दिया।
कैलाश स्वर्ग का द्वार है…
उस द्वार से मोक्ष मिलता है।
स्वर्ग का द्वार मानो पूरी तरह बिगड़ गया हो!

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