-देश में दही-हंडी फूट रही, सत्ता रोज चढ़ रही एक नया पायदान
-सबसे ऊपर ‘भ्रष्टाचार की मटकी’,
-नीचे वादाखिलाफी, महंगाई,
-पेपर लीक, ईडी-सीबीआई और घोटालों की विराट मीनार
सामना संवाददाता / नई दिल्ली
देश जन्माष्टमी मना रहा है। गलियों में गोविंदा मटकी फोड़ने के लिए मानव पिरामिड बना रहे हैं। नीचे वाला ऊपर वाले को संभाल रहा है, ऊपर वाला मटकी तक पहुंचने के लिए जान लगा रहा है और पूरा मोहल्ला चिल्ला रहा है, ‘गोविंदा आला रे!’ लेकिन सत्ता की दही-हंडी का खेल कुछ उलटा दिखाई देता है। यहां पिरामिड भी तैयार है, मजबूत कंधे भी मौजूद हैं, मंत्री भी एक-दूसरे पर चढ़े हैं और सबसे ऊपर मटकी भी लटक रही है। फर्क केवल इतना है कि यह मटकी फोड़ने के लिए नहीं, बचाने के लिए है। मटकी पर लिखा है, भ्रष्टाचार। और ऊपर से जैसे आवाज आ रही हो, ‘भ्रष्टाचार की मटकी न फोड़ेंगे, न फोड़ने देंगे!
२०१४ में जनता को सपना दिखाया गया था, काला धन आएगा, भ्रष्टाचार जाएगा, हर साल करोड़ों नौकरियां आएंगी, महंगाई पर लगाम लगेगी, किसानों की आय दोगुनी होगी, रुपया मजबूत होगा और व्यवस्था साफ-सुथरी होगी। बारह साल बाद जनता का सवाल है, सपनों की मटकी किसने फोड़ी? नौकरी मांगो तो परीक्षा का पर्चा फूट जाता है। इलाज मांगों तो अस्पताल का बिल फूट जाता है। पेट्रोल भराओ तो जेब फूटती है। टोल पर जाओ तो बजट फूटता है। सवाल पूछो तो कभी ईडी का दरवाजा खुलता है, कभी सीबीआई की घंटी बजती है, लेकिन भ्रष्टाचार की मटकी? वह जस की तस!
पहला पायदान, वादा था भ्रष्टाचार मिटेगा, बॉन्ड ने पर्दा डाल दिया
इस मीनार का पहला मजबूत पत्थर बना इलेक्टोरल बॉन्ड। राजनीतिक चंदे की ऐसी व्यवस्था जिसमें जनता यह नहीं जान सकती थी कि किस कंपनी ने किस राजनीतिक दल को कितना पैसा दिया। आखिर सुप्रीम कोर्ट ने फरवरी २०२४ में योजना को असंवैधानिक घोषित कर दिया। अदालत ने राजनीतिक फंडिंग की जानकारी छिपाने को नागरिकों के सूचना के अधिकार के खिलाफ माना और कंपनियों को असीमित राजनीतिक चंदे की अनुमति देने वाले बदलाव को भी मनमाना करार दिया। इसके बाद दूसरा सवाल उठा, ‘चंदा दो, फायदा लो?’ कई कंपनियों के बॉन्ड खरीदने और उसके आसपास सरकारी ठेके, नीतिगत पैâसले या एजेंसियों की कार्रवाई की टाइमिंग पर सवाल उठे। सुप्रीम कोर्ट ने हालांकि स्पष्ट किया कि केवल तारीखों की नजदीकी अपने आप आपराधिक ‘क्विड प्रो क्वो’ सिद्ध नहीं करती। मगर व्यंग्यकार की कलम पूछती है, चंदा गुप्त क्यों था, अगर खेल बिल्कुल साफ था?
दूसरा पायदान, सड़क ` १८ करोड़ वाली थी या ` २५० करोड़ वाली?
इसके बाद पिरामिड में द्वारका एक्सप्रेसवे आ जाता है। सीएजी ने दर्ज किया कि द्वारका एक्सप्रेसवे की सिविल लागत `७,२८७.२९ करोड़ और प्रति किलोमीटर लागत `२५०.७७ करोड़ थी, जबकि जिस मानक लागत का उल्लेख ऑडिट ने किया वह `१८.२० करोड़ प्रति किलोमीटर थी। सीएजी ने परियोजना के मूल्यांकन और अनुमोदन प्रक्रिया पर भी सवाल उठाए। जनता पूछे, इतनी महंगी सड़क पर गड्ढा पड़े तो वह गड्ढा कहलाएगा या राष्ट्रीय संपत्ति? इसी के साथ भारतमाला के पैकेज, परियोजनाओं को टुकड़ों में मंजूरी, एनएचएआई टोल, फास्टैग और डबल टोल से जुड़े
ऑडिट सवाल मीनार में अपनी जगह बना लेते हैं। सिर्फ एक सड़क या एक्सप्रेसवे का नहीं है देशभर की तमाम सड़क योजनाओं में बड़े-बड़े घोटाले हुए हैं इतने बड़े कि सड़कों के गड्ढे चीख चीख कर उसकी गवाही दे रहे हैं।
‘गोिंवदा आला रे’!
लेकिन सत्ता की दही-हंडी का खेल उलटा!
तीसरा पायदान, इलाज से उड़ान तक सवाल ही सवाल
अब मीनार में चढ़ते जाइए। आयुष्मान भारत की ऑडिट आपत्तियां। उड़ान योजना की अधूरी उड़ानें। स्वदेश दर्शन परियोजनाओं का क्रियान्वयन। राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम की कमियां। जीएसटी की तकनीकी व्यवस्था। रेलवे की विभिन्न वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितताएं। बीएसएनएल के ग्रामीण वाई-फाई हॉटस्पॉट। बीएसएनएल की संपत्ति प्रबंधन व्यवस्था।
तेल कंपनियों की सप्लाई और लॉजिस्टिक्स। एक पायदान पर सीएजी की रिपोर्टों में सामने आए केंद्रीय मंत्रालयों से जुड़े करोड़ों रुपए के मामले, दूसरे पर बाद की अनुपालन रिपोर्टों की आपत्तियां। यानी मटकी तक पहुंचने के लिए सीढ़ी छोटी नहीं है। सीढ़ी लंबी है और हर पायदान पर एक फाइल रखी है।
चौथा पायदान, पीएम केयर्स की मटकी पर पारदर्शिता का ढक्कन
फिर आता है पीएम केयर्स। प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाला फंड, लेकिन उसकी सार्वजनिक जवाबदेही और सूचना के अधिकार के दायरे को लेकर वर्षों से विवाद। सवाल पैसे के गायब होने का आरोप भर नहीं है। बड़ा सवाल यह है कि जिस कोष के नाम में ‘पीएम’ हो, जिसका प्रचार सरकारी मशीनरी करे और जिसके ट्रस्टी शीर्ष संवैधानिक पदाधिकारी हों, उसकी पारदर्शिता का मानक कितना ऊंचा होना चाहिए? व्यंग्य में जनता पूछ सकती है, दान हमारा, नाम प्रधानमंत्री का, हिसाब पूछें तो सवाल हमारा क्यों?
पांचवां पायदान, राफेल और अडानी के सवाल
राफेल पर विपक्ष ने कीमत और ऑफसेट साझेदारी को लेकर भ्रष्टाचार के आरोप लगाए। इस पर राजनीतिक सवाल खत्म नहीं हुए। अडानी समूह को लेकर भी सरकार और बड़े कॉर्पोरेट घरानों की निकटता पर विपक्ष लगातार हमला करता रहा। हर व्यावसायिक सफलता भ्रष्टाचार नहीं होती, लेकिन जब सत्ता और पूंजी के रिश्ते पर बार-बार सार्वजनिक सवाल उठें तो लोकतंत्र में पारदर्शिता की मांग अस्वाभाविक नहीं मानी जा सकती। और यहीं कार्टून का पिरामिड कहता है, ‘ऊपर उद्योगपति, नीचे नीति, बीच में जनता खोजे पारदर्शिता!’
ईडी की सीढ़ी विपक्ष में रहो तो छापा, सत्ता में आओ तो सवाल?
मोदी काल की राजनीति में ईडी और सीबीआई पर सबसे गंभीर राजनीतिक आरोप यही रहा कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्ष पर दबाव बनाने के लिए किया जा रहा है। विपक्ष लंबे समय से आरोप लगाता रहा है कि एजेंसियों की सक्रियता विपक्षी नेताओं के खिलाफ ज्यादा दिखाई देती है, जबकि भाजपा और केंद्र सरकार का कहना है कि एजेंसियां स्वतंत्र रूप से भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई करती हैं। व्यंग्य की भाषा में दृश्य कुछ यूं बनता है, विपक्षी नेता के दरवाजे पर घंटी बजती है, ‘कौन?’ ‘ईडी।’ नेता पार्टी बदलता है। दोबारा घंटी बजती है, ‘कौन?’ ‘फूलों का गुलदस्ता।’ यही विपक्ष का आरोप रहा है, और यही सत्ता की सबसे बड़ी राजनीतिक आलोचनाओं में एक बन चुका है।
सीबीआई, कभी ‘पिंजरे का तोता’, अब किसकी सीटी पर?
सीबीआई को लेकर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप कोई नए नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कभी इसे ‘पिंजरे का तोता’ कहा था। जब सरकार का आलोचक जांच के घेरे में आता है तो सवाल उठता है। और जब सत्ता समर्थक पर कार्रवाई धीमी दिखाई देती है तो सवाल और बड़ा हो जाता है।
चुनाव आयोग, रेफरी पर ही सवाल उठने लगें तो मैच कैसा?
लोकतंत्र का चुनाव उस क्रिकेट मैच जैसा है जिसमें सरकार और विपक्ष खिलाड़ी हैं और चुनाव आयोग रेफरी। खिलाड़ी पर आरोप लगे तो रेफरी पैâसला करता है। लेकिन यदि रेफरी की निष्पक्षता पर ही राजनीतिक सवाल उठने लगें तो मैच का विश्वास प्रभावित होता है। विपक्ष ने चुनाव कार्यक्रम, आचार संहिता के प्रवर्तन, नेताओं के भाषणों पर कार्रवाई और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति व्यवस्था को लेकर बार-बार सवाल उठाए हैं। इन आरोपों को तथ्य की तरह नहीं, लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठे गंभीर राजनीतिक प्रश्न की तरह देखना चाहिए।
बच्चों पर लाठी, पैलेट और डर
सबसे कठोर पायदान वहां दिखाई देता है जहां राज्य का सामना युवाओं और छात्रों से होता है। कश्मीर में पैलेट गन के इस्तेमाल से आंखों की गंभीर चोटों और अंधत्व के मामलों को मानवाधिकार संगठनों ने वर्षों से दर्ज किया है। २०२६ के सीजेपी प्रदर्शनों को लेकर भी बल प्रयोग के आरोप उठे। पुलिस और प्रशासन की अपनी स्थितियां हैं, लेकिन घायल युवा सरकार के हर दावे से बड़ा सवाल बनकर खड़े हैं। देश पूछता है, जो आंख डॉक्टर, वैज्ञानिक और इंजीनियर बनने का सपना देख रही थी, उसके सामने पैलेट क्यों?
स्वतंत्र भारद्वाज, सत्ता संरक्षण का दावा और फिर गिरफ्तारी
और अब इसी मीनार का ताजा विवाद स्वतंत्र भारद्वाज का है। जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े मारपीट मामले में सोशल मीडिया प्रभावक स्वतंत्र भारद्वाज ने वायरल पॉडकास्ट में कथित रूप से राजनीतिक संपर्क और संरक्षण का दावा किया। विपक्ष ने इसे सत्ता संरक्षण का उदाहरण बताया। दिल्ली पुलिस ने राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोपों को स्वीकार नहीं किया और मामला जांच के दायरे में रहा। बाद में भारद्वाज को हिरासत में लिया गया और गिरफ्तार किया गया। यानी इसे ‘मोदी सरकार ने गुंडे को संरक्षण दिया’ बताना अभी निष्कर्ष होगा। लेकिन उससे भी बड़ा राजनीतिक सवाल यह है, कोई आरोपी खुले वैâमरे पर राजनीतिक नेताओं का नाम लेकर संरक्षण का दावा करने की हिम्मत आखिर क्यों करता है? यही लोकतंत्र के लिए असहज करने वाला हिस्सा है।
प्राकृतिक संसाधन, जंगल, जमीन, खदान किसके?
एक और पायदान है प्राकृतिक संसाधनों का। कोयला, खनिज, जंगल, बंदरगाह, जमीन और सार्वजनिक परिसंपत्तियों के निजी उपयोग को लेकर केंद्र की नीतियों पर विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि विकास की परिभाषा बड़े कॉरपोरेट निवेश के पक्ष में झुकी हुई है। सरकार इसे निवेश, रोजगार और बुनियादी ढांचे के विस्तार की नीति बताती है। लेकिन गांव वाला पूछता है, जंगल गया, पहाड़ गया, खदान गई मेरे हिस्से विकास में क्या आया?
पीएसयू, बेचना है या सुधारना?
एयर इंडिया का निजीकरण हुआ। एलआईसी की हिस्सेदारी बाजार में उतरी। आईडीबीआई बैंक में सरकारी हिस्सेदारी बेचने की प्रक्रिया चली। सरकारी कंपनियों की हिस्सेदारी बिक्री और एसेट मोनेटाइजेशन मोदी सरकार की घोषित आर्थिक रणनीति का हिस्सा रहे हैं। सरकार कहती है, सरकार का काम व्यापार करना नहीं। जनता पूछती है, तो घाटे में सरकारी कंपनी जनता की और मुनाफे की संभावना दिखी तो निजी हाथों की क्यों? यही बहस है।
झूठ और वादाखिलाफी की अलग हंडी
काला धन? हर खाते में लाखों? दो करोड़ नौकरियां? किसानों की आय दोगुनी? सस्ती ऊर्जा? मजबूत रुपया? न्यूनतम सरकार, अधिकतम शासन? भ्रष्टाचार मुक्त भारत? हर चुनाव में पुराने वादों की जगह नया पोस्टर चिपकता गया। जनता पुराने पोस्टर के नीचे झांकती है तो उसे वहां अभी भी वही वादा दिखाई देता है। बस तारीख धुंधली हो चुकी होती है।
और मीनार के पहले बीस सरकारी पायदान
इस व्यंग्य की मटकी में ऊपर तक पहुंचने के लिए पूरे बीस चिह्नित पायदान हैं, इलेक्टोरल बॉन्ड; चंदा दो-फायदा लो विवाद; द्वारका एक्सप्रेसवे; भारतमाला; एनएचएआई टोल; फास्टैग और डबल टोल; आयुष्मान भारत की ऑडिट आपत्तियां; राफेल विवाद; अडानी निकटता का राजनीतिक विवाद; पीएम केयर्स की पारदर्शिता; उड़ान योजना; स्वदेश दर्शन; राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम; जीएसटी तकनीकी व्यवस्था; रेलवे अनियमितताएं; बीएसएनएल ग्रामीण वाई-फाई; बीएसएनएल संपत्ति प्रबंधन; केंद्रीय मंत्रालयों से जुड़े सीएजी के करोड़ों के अनुपालन मामले; २०२५ की सीएजी रिपोर्ट में दर्ज नए अनुपालन मामले और तेल कंपनियों की सप्लाई-लॉजिस्टिक्स। इनमें हर मामला भ्रष्टाचार सिद्ध नहीं करता। लेकिन मिलकर ये एक बड़ा सवाल जरूर बनाते हैं जिस सरकार ने भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस का दावा किया, उसके शासनकाल में इतने सारे पारदर्शिता और जवाबदेही के प्रश्न एक साथ क्यों जमा हुए?
महंगाई, मटकी ऊपर, रसोई नीचे
और इन तमाम मुद्दों के नीचे खड़ी है वह गृहिणी जिसकी रसोई किसी आर्थिक सर्वेक्षण की भाषा नहीं समझती। उसे बस इतना पता है, आटा कितना है, तेल कितना है, दूध कितना है, गैस कितने की है, स्कूल फीस कितनी है, दवा कितनी है, टोल कितना है, बिजली कितनी है। जब सरकार जीडीपी की तालियां बजाती है और आम आदमी जेब टटोलता है तो व्यंग्य वहीं जन्म लेता है।
फिर आया नीट, बच्चा पढ़ता रहा, पेपर पहले पहुंच गया!
सरकारें बच्चों को समझाती हैं मेहनत करो। बच्चा रात-रात भर पढ़ता है। मां अपने गहने बेचकर कोचिंग कराती है। पिता कर्ज लेकर फीस भरता है और फिर खबर आती है, पेपर लीक! २०२४ के नीट मामले में केंद्र सरकार ने स्वयं कथित अनियमितताओं, नकल, प्रतिरूपण और कदाचार की जांच सीबीआई को सौंपी थी और कहानी यहीं नहीं रुकी। मई २०२६ में सीबीआई ने नीट-यूजी २०२६ पेपर लीक मामले में कथित मुख्य आरोपी को गिरफ्तार करने की जानकारी दी। अब छात्र पूछता है, ‘मेरी उत्तर पुस्तिका जांचने से पहले परीक्षा व्यवस्था की उत्तर पुस्तिका कौन जांचेगा?’ यह केवल परीक्षा की गड़बड़ी नहीं। यह उस बच्चे के साथ अत्याचार है जिसने दो साल कमरे में बंद होकर पढ़ाई की और उसे पता चला कि प्रतियोगिता उसकी किताब और दूसरे के लीक हुए प्रश्नपत्र के बीच थी।
देश मटकी फोड़ रहा है, सत्ता मीनार ऊंची कर रही है
और इसीलिए इस जन्माष्टमी का सबसे तीखा राजनीतिक कार्टून यही है। एक तरफ देश भर में गोविंदा मानव पिरामिड बनाकर दही की मटकी फोड़ रहे हैं। दूसरी तरफ सत्ता का राजनीतिक पिरामिड है। नीचे महंगाई। उसके ऊपर बेरोजगारी। फिर पेपर लीक। फिर ईडी। फिर सीबीआई। फिर चुनाव आयोग पर उठते सवाल। फिर सार्वजनिक संपत्तियों की बिक्री। फिर प्राकृतिक संसाधनों पर कॉरपोरेट नियंत्रण की बहस। फिर राजनीतिक संरक्षण के आरोप। फिर इलेक्टोरल बॉन्ड। फिर सीएजी की रिपोर्टें। और सबसे ऊपर भ्रष्टाचार की मटकी। मगर यहां गोविंदा का लक्ष्य मटकी फोड़ना नहीं दिखाई देता। पूरी टोली जैसे उसे गिरने से बचाने में लगी हो। नीचे जनता गर्दन उठाकर देख रही है और पूछ रही है, ‘मोदी जी, मटकी कब फूटेगी?’ ऊपर से राजनीतिक व्यंग्य का जवाब आता है ‘मटकी मजबूत है, क्योंकि पायदान रोज बढ़ रहे हैं!’
