-महंगाई, टैक्स और असफल कूटनीति के आर्थिक झटकों से परेशान है मुंबई
सामना संवाददाता / मुंबई
दिवाली पर घर रोशन करना परंपरा है, लेकिन जब घर का बजट ही अंधेरे में डूबने लगे तो दीपक की लौ भी सवाल पूछती दिखाई देती है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई में इस बार दिवाली की तैयारियों के बीच महंगाई, बढ़ते घरेलू खर्च, करों के बोझ और पश्चिम एशिया की युद्ध पार्श्वभूमि में असफल कूटनीति से पैदा हुए आर्थिक दबाव की चर्चा है। आम आदमी के सामने दोहरी चुनौती है; घर-परिवार की जरूरतें पूरी करने के लिए अपनी जेब बचाए या त्योहार की खुशियां मनाने के लिए खर्च करे? ऐसे में आम मुंबईकर व्यंग्य की भाषा में कह रहा है, इस दिवाली वोट और लंगोट, दोनों बचाना भारी पड़ रहा है! वोट ज्ञानेश बाबू से और लंगोट मोदी सरकार से।
मुंबईकरों को महंगाई का झटका
त्योहार का बजट अटका!
-पटाखे, मिठाई, कपड़े, रंग-रोगन और वाहन बाजार की मांग पर सवाल; सरकार के आर्थिक दावों के बीच आम आदमी की क्रयशक्ति तबाह
सामना संवाददता / मुंबई
महंगाई की मार ने मुंबईकरों के त्योहारों की रौनक फीकी कर दी है। पटाखे, मिठाई, कपड़े, रंग-रोगन से लेकर वाहनों तक के बाजार में मांग को लेकर चिंता है। सरकार के आर्थिक तरक्की के दावों के बीच आम आदमी की घटती क्रयशक्ति ने त्योहार का बजट बिगाड़ दिया है।
बता दें कि सितंबर २०२६ में देश की खुदरा महंगाई दर ५.५४ प्रतिशत और खाद्य महंगाई ७.७४ प्रतिशत दर्ज की गई। रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं पर बढ़ता खर्च सीमित आमदनी वाले परिवारों के लिए चिंता का विषय है। मुंबई में घर का किराया, बच्चों की फीस, चिकित्सा, बिजली, परिवहन और खाद्य सामग्री पर पहले ही बड़ी रकम खर्च होती है। ऐसे में त्योहार के लिए अलग से पैसा बचाना अनेक परिवारों के लिए चुनौती बन गया है। दिवाली पर मिठाई, पटाखे और नए कपड़े खरीदना महज उपभोग नहीं, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक परंपरा भी है। लेकिन जब जरूरी खर्च ही बढ़ जाएं तो ऐसी खरीदारी सीमित करना परिवारों की मजबूरी है।
पांच बाजारों के सामने पांच बड़े सवाल
पटाखा उद्योग: धनतेरस पर आतिशबाजी कम होने के स्थानीय अवलोकन के बीच कारोबारियों की वास्तविक बिक्री बेहद कम रही। महंगाई के कारण खरीदारी घटी और दुकानें खाली रहीं।
मिठाई उद्योग: दूध, घी, सूखे मेवे, मजदूरी और पैकेजिंग की लागत के बीच ग्राहक बेहद कम खर्च कर पा रहे हैं। महंगी मिठाइयों के कारण उपभोक्ता कम मात्रा में खरीदारी कर रहे हैं।
कपड़ा उद्योग: कई परिवारों ने नए कपड़े खरीदने के बजाय पुराने कपड़ों से ही त्योहार मनाने का पैâसला किया है। खुदरा तथा थोक कपड़ा बाजारों की बिक्री पिछले वर्ष से कम रही है।
रंग-रोगन कारोबार: घरेलू बजट के दबाव में मकानों की रंगाई-पुताई और मरम्मत टाली है। इसका छोटे ठेकेदारों, पेंटरों और भवन-सामग्री विक्रेताओं पर असर पड़ा है।
ऑटोमोबाइल उद्योग: अक्टूबर में देश की कुल वाहन खुदरा बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में २३.८० प्रतिशत घटी।
जीएसटी में राहत का लाभ आखिर कितना मिला?
सरकार ने सितंबर २०२५ में जीएसटी की दरों में बदलाव करके अनेक वस्तुओं पर कर घटाए थे। इसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को राहत देना था। लेकिन सवाल यह है कि उत्पादन और परिवहन लागत बढ़ने के बाद ग्राहकों को वास्तविक बचत कितनी हुई? तेल पर कर, घरेलू आवश्यकताओं का खर्च और विभिन्न सेवाओं की कीमतों को एक साथ देखा जाए तो आम परिवार पर पड़ने वाले कुल आर्थिक बोझ का अधिक सटीक आकलन किया जा सकता है।
दिवाली की रोशनी का सबसे महत्वपूर्ण अर्थ यही है कि खुशहाली केवल बाजारों की सजावट में नहीं, बल्कि आम नागरिक के घर और उसकी आर्थिक सुरक्षा में भी दिखाई दे।
ईरान-अमेरिका युद्ध ने बढ़ाई आर्थिक चुनौती
महंगे तेल का असर परिवहन, उद्योग और वस्तुओं की लागत तक पहुंचा है। सरकार ने युद्ध के कूटनीतिक समाधान की वकालत की है, लेकिन उसके आर्थिक परिणामों से निपटने के उपायों की समीक्षा भी जरूरी है।
