शीतल अवस्थी
गोवर्धन पूजा के दिन विविध व्यंजनों का पर्व मनाया जाता है। उसका मूल संदेश अन्न, प्रकृति और मानवीय श्रम के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना है।
दीपावली के बाद कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा और अन्नकूट का आयोजन होता है। मंदिरों में अनेक प्रकार के व्यंजन सजाकर भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं। ‘छप्पन भोग’ समृद्ध भक्ति का प्रतीक है, लेकिन घर में इसे व्यंजनों की संख्या अथवा मात्रा की प्रतियोगिता बनाना आवश्यक नहीं है।
अन्नकूट की तैयारी में स्थानीय और मौसमी अनाज, सब्जियों तथा घर में उपलब्ध सामग्री का उपयोग करें। भोजन स्वच्छता से बनाएं और उतना ही तैयार करें, जितना परिवार, अतिथियों तथा जरूरतमंदों में सम्मानपूर्वक वितरित किया जा सके।
श्रीकृष्ण की गोवर्धन लीला बताती है कि पर्वत, वन, जल, गाय और किसान समाज के पोषण का आधार हैं। इसलिए अन्नकूट में किसान, रसोइये, पशुपालक और प्रकृति के योगदान का स्मरण किया जाना चाहिए।
अन्न को कूड़ेदान में जाने से बचाना इस पूजा का सबसे व्यावहारिक व्रत है। भोजन बच जाए तो उसे सुरक्षित तरीके से रखें और यथाशीघ्र जरूरतमंदों में वितरित करें। अन्न का सम्मान ही माता अन्नपूर्णा और गोवर्धनधारी भगवान श्रीकृष्ण की वास्तविक आराधना है।
धार्मिक मान्यताएं आस्था का विषय हैं; स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी मामलों में विशेषज्ञ की सलाह को प्राथमिकता दें।
