सामना संवाददाता / मुंबई
पीएमसी बैंक के घोटाले में एक और बड़ा मामला सामने आया, जिसमें आवास डेवेलपर्स को ₹135 करोड़ तक के लोन मंजूर हुए, लेकिन उसे असल में मात्र ₹30 करोड़ मिले। इसके बावजूद बैंक ने ₹170 करोड़ की रिकवरी का दावा ठोका है, जिसे कंपनी ने गलत और गैरकानूनी बताया है।

चार्टर्ड अकाउंटेंट दीपक सिंघानिया एंड एसोसिएट्स की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार अगस्त 2012 के बाद कोई फंड ट्रांसफर नहीं हुआ. इसके बाद सिर्फ ब्याज की एंट्रियाँ जोड़ी जाती रहीं ताकि लोन फाइल एक्टिव दिखती रहे।
यह मामला पृथ्वी रियल्टर्स की ही तरह है, जिन्हें ₹87.5 करोड़ का लोन मंजूर हुआ, लेकिन ₹1 भी ट्रांसफर नहीं किया गया. फिर भी ब्याज जोड़कर ₹150 करोड़ से ज्यादा की देनदारी खड़ी कर दी गई। यह कंपनी अब एनसीएलटी में केस लड़ रही है, और पीएमसी के खिलाफ धोखाधड़ी का आरोप लगा चुकी है।

कंपनी ने बताया कि मुंबई, पालघर और ठाणे में संपत्तियाँ गिरवी रखीं, लेकिन पैसे कभी नहीं मिले। बाद में कई बार लोन लिमिट बढ़ाई गई पर सब कुछ केवल कागज़ों तक सीमित रहा।
आरबीआई की ऑडिट रिपोर्ट ने खुलासा किया कि पीएमसी ने 21 हजार से ज्यादा फर्जी लोन एंट्रियाँ दर्ज कर ₹5 हजार करोड़ का फर्जी बिज़नेस दिखाया। मामले की सुनवाई एनसीएलटी के समक्ष जारी है, जिसको लेकर अदालत जल्द ही अपना फैसला सुना सकती है।
